Sunday, October 08, 2006

हफ्ता गुजरा टीवी पर( 1 - 8 अक्टूबर)

मौत चाहिए। मौत सस्ती हो चली है। एक परिवार को इच्छामृत्यु चाहिए। राष्ट्रपति से गुहार लगी। टीवी ने कम ही तव्वजो दी। तव्वजो दी, अफजल की फांसी टालने की अर्जी को। वो भी राष्ट्रपति के पास पहुंची। खबर थी। सो खूब चर्चा उठी। सप्ताहांत में एक चैनल ने अच्छी बहस नुमायां की। मौत टीवी पर जारी थी। कही डेंगू से कही चिकनगुनिया से। मरने वालों को अब संख्या में गिना जाने लगा है। पैंतालीस मरे, तीन हजार प्रभावित है। देखिए सबके पास आंकड़ों का मायाजाल है। दर्शक ये सोच ही नहीं पाता कि वो भी इकतालीसवां हो सकता है। बचाव कैसे हो ये जानकारी टीवी कम ही देता है। एक मौत, हत्या थी, के मामले में मारने वाले ने कुबुला कि उसने हत्या की। एक विश्वसनीय चैनल ने वो सीडी चलाई, कि लीजिए ये है सबूत, पर कानून नहीं मानता इसे। वहां को मजिस्ट्रेट के सामने बयान ही धुरी है। सो हत्या करने करने वाला निश्चिंत है, पर इसके पिताजी को मीडिया प्रभाव मे नैतिकता का जामा ओढना पड़ा। सो पद गया। देखिए क्या क्या बिक रहा है। एक दिन टीवी ने फिर दिखाया कि बच्ची बिक रही है। पांच सौ रूपए में। खरीदार भी समाज में है, बिकवाल भी। टीवी भी खरीदता है औऱ मंहगे में बेचता है। खबरें खास भी थी, आम भी। डेंगू से प्रधानमंत्री के दामाद, नाती सब बीमार हो गए। पीएम को देखने जाना पड़ा। पर डेंगू को रोक पाना संभव नहीं दिखा। सावधानी और जानकारी ही बचाव है। पर कश्मीर में सारी सावधानी धरी रह जाती है जब हमला होता है। लालचौक पर हमला हुआ। लोग मरे। हिंसा बढती जा रही है। असम में उल्फा से शांति वार्ता के टूटने के बाद इसके आसार साफ दिख रहे है। टीवी कहता है गांधीगीरी सफल हो रहा है। जरूर। पाकिस्तान एक झापड़ मारकर कहता है कि सबूत दो कि उसका मुंबई बम हादसों में हाथ है। हम दूसरा गाल आगे करते है। आतंकवाद जो खत्म करना है। खत्म हिंसा को भी करना है, जो रह रहकर भड़क उठती है। मैंगलोंर में हिंसा भड़क उठी। वहीं पुरानी बात। वहीं धार्मिक उन्माद। हिंसा जारी है। देखिए धार्मिक भावनाए भी कितती नाजुक होती है। एक शराब कंपनी के एड में हरभजन ने केश खोले तो माफी मांगनी पड़ी। लोकतंत्र भले हो, पर टीवी इसे पहला अधिकार नहीं मानता। वो तो समुदाय की भावनाएं देखता है। और कही न कही विचार सीमित करता है। कहां कद्र है लोकतंत्र में गरीब की। पर लालूजी गरीब रथ चलाए जा रहे है। गरीबी है। दल है। मुद्दे है। पर राजनीति भी है। शिवसेना भाजपा में ठन गई। मामला एक सीट का था। खैर टीवी चैनलों को लगा कि मामला दहकेगा। पर जल्द सिमट गया। खैर इन सबके बीच हम एक सालगिरह धूमधाम से मनी। भारतीय वासुसेना ने पिचहत्तर साल पूरे किए। टीवी पर अच्छे दृश्य दिखेष। गर्व हुआ। लोकतंत्र पर।

'सूचक'
soochak@gmail.com'

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2 comments:

Punit Pandey said...

भाई, सनसनी का जमाना है। टीवी से उतनी ही अपेक्षा रखें तो बेहतर है।

पुनीत
HindiBlogs.com

संजय बेंगाणी said...

कम से कम इतना तो पता चल रहा हैं की कितने लोग मरे हैं.वरना तो सरकारे आंकड़े दबा देती हैं.