Monday, December 31, 2007

साल 2007 में भारतीय टेलिविजन

साल के आखिरी दिन सोचना जरूरी है कि क्या बीता। क्या देखा। क्या जाना और क्या सुना। बीते साल के आखिरी दिन यानि 31 दिसम्बर 2006 को दिल्ली में डीटीएच लागू करने का आखिरी दिन था। वो लागू न हो सका। लेकिन टीवी पर सबकुछ चालू रहा। जाते साल में टीवी पर गंभीर-अगंभीर सबकुछ दिखा। देखने लायक से बोर होने लायक तक।

वैसे आप इसे हादसों का साल कह सकते है। हैदराबाद से लेकर अजमेर तक बम फटे। मासूम लोगों की दर्दनाक तस्वीरें चैनलों पर कई दिन तक चलती रही। और हमारी चेतना को ये जगाने के लिए काफी था।

आंदोलनों का भी साल रहा। गुज्जरों ने उत्तर भारत को हिला और ठहरा सा दिया। नंदीग्राम का आग ने वाम दलों को हिलाया। पूरे देश में जमीन और अधिकार की बात को टीवी न कहते हुए भी दिखा रहा था।

उछाल के लिए किसी पोलवाल्ट प्लेयर की मिसाल को सेंसेक्स ने पीछे छोड़ दिया। अभी आप उठे नहीं कि टीवी पर सेंसेक्स ने एक हजार की छलांग लगा दी। लाखों करोंड़ो के वारे न्यारे। लेकिन एक डर के साथ। लेकिन टीवी पर इसे हमेशा सकारात्मक तरीके से पेश किया गया।

गर्मी भी छाई रही। साल भर ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा रही। और आर के पचौरी को साझा नोबेल मिलने से इसे गर्मी मिली। तापमान बढ़ रहा था। और इसका असर पूरे देश में गर्मी बढ़ने के साथ महसूस किया गया। देश की राजधानी को बरसात की झलक कम ही मिली। हालांकि देश के कई भाग डूबे से रहे।

जो उभरा वो सितारा। यानि साल भर एक ही सितारे ने हर टीवी चैनल पर अपनी मौजूदगी दिखाई। शाहरूख खान। यकायक लगा कि शाहरूख हर कहीं है। वे चक दे के कोच के साथ साथ अपने दोनों ओम किरदारों के साथ शांति का संदेश देते रहे। क्रिकेट हो या रियल्टी शो। शाहरूख का रूख हर जगह दिखा।

दिखी तो दो गुमनाम महिलाएं भी। एक भूली बिसरी मॉडल- गीतांजलि नागपाल और एक सताई गई महिला- पूजा चौहान। दोनों ने सड़क पर से टीवी के पर्दे पर कई दिनों तक जगह बनाई। एक ने इलाज पाया तो दूसरी को इलाज की जरूरत बताई गई। खैर ये नारी की ताकत ही कहा जाएगा। पूरे साल नारी की ताकत का ये सबसे सशक्त नजारा था, जो टीवी पर रहा।

माधुरी का आना, नचले का फसाना। रास न आया। विवाद भी जुड़ा। या जोड़ा गया। लेकिन किसी को उनका ढ़लता रूप रास न आया। आजा नचले को टीवी ने प्रमोशन कम दिया, खींचा ज्यादा।

वहीं ओम शांति ओम और सांवरियां के खाते में खड़े रहे टीवी चैनल। बेचते रहे। दिखाते रहे कि क्लास और मास में एक बड़ी दूरी है। और लोकतंत्र में जीतता तो क्लास ही है। सो ओम शांति ओम जीतती रही।

राजनीति का रूख तकरार वाला रहा। पहले एन-डील, फिर रामसेतु, फिर नंदीग्राम, फिर गुजरात- सभी जगह यूपीए कमजोर रही। विपक्षी इसका फायदा तो उठाते रहे, लेकिन देश के लिए किसी ने भी विजनरी का रूख नहीं दिखाया। टीवी ने नंदीग्राम, एन-डील, गुजरात को वेदी मानकर वाम, कांग्रेस और मोदी को चढ़ाया। नतीजा केवल अभी तक मोदी के पक्ष में ही रहा। वे करण थापर के इंटरव्यू में बीच में उठकर चले जाते है। उनका विखंडित समाज इसे उनका अपमान मानता है। वे बंपर जीतते है।

कभी अंदर तो कभी बाहर। संजय दत्त और सलमान खान तो साल भर यही करते रहे। हर बार मीडिया में अपील। मानो बिन गलती के सजा भुगत रहें हो। खैर टीवी ने इसे खूब दिखाया। शायद इसे ही वो सबकी खबर मान चुका है।

साल भर जिस खुमार को टीवी भुनाता रहा, वो क्रिकेट का रहा। खैर हम जीतते हारते रहे। 20-20 में धोनी की जीत तो खैर सचमुच मायने रखती है। इसके साथ ही हाकी में भी चक दे इंडिया की धुन पर टीवी हमारी जीत दिखाती रही। जीते तो विश्वनाथन आनंद भी। लेकिन एयरपोर्ट पर उनका स्वागत कैमरों ने कम ही किया।

आसमान में सैटेलाइटों के ऊपर एक महिला ने कई महीने बिताएं। वो भारतीय मील की थी। सुनीता विलियम्स भारत आई। टीवी पर एक हफ्ते वो खूब खबरों में रही।

शादियां आसमान में तय होती है। और अभिऐश की शादी में न्यौता मिलना भी आसमानी सौगात रही। टीवी चैनल बाहर रहे। अंदर शादी चलती रही। टीवी के लिए सबसे कमजोर वक्त था। निजी जिंदगी में उसकी दखल के बढ़ने के बाद उसे दरवाजे पर खड़ा रखना जरूरी था। हुआ वही। घरों के बाहर वो बिन बुलाए बाराती की तरह मौजूद रहा।

खरीदारी का साल रहा। लक्ष्मी निवास मित्तल ने आर्सेलर पर कब्जा जमाया, तो टाटा कोरस के अपने झोले में ले आई। ये
खबरें रही। खैर सोना मंहगा, कारों के नए नए मॉडल के साथ देश मजबूत होता दिखा।

मजबूत को मायावती भी हुई। टीवी ने इसे दिखाया। और इस मीडियायुग में उन्होने अपने तरीके से चुनाव जीता। टीवी उनके बढ़िया प्रदर्शन को राजनीति की नई पहल की पहल की तौर पर पेश करता रहा।

लेकिन साल के अंत में जिस घटना ने टीवी के पर्दे को हिला दिया, वो रहा बेनजीर की हत्या का मामला। टीवी ने हर ओर से इस घटना को दिखाया। और कोशिश की कि उसकी गंभीरता बनी रहे।


उम्मीद है इस साल टीवी पर आपको दिखेगा कुछ नया। नया यानि जो आपकी पसंद से जुड़ा हो। और जिसे आप सूचना के तौर पर तो कम से कम उपयोग किया जा सके।

सूचक
soochak@gmail.com

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Sunday, December 30, 2007

बेनजीर हत्याकांड और ब्लाग

विश्वसनीयता का मानक क्या है। किसी बड़े हादसे के बाद टीवी के सामने ये सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। पाकिस्तान की आला नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद टीवी पर खबरों का रूख पल पल बदलता नजर आ रहा है। पहले जिसे गोली से लगने वाली मौत माना जा रहा था, वो सरकारी बयान के बाद एक हादसा सा दिखाया गया। लेकिन इसे काटने के लिए भारतीय टेलीविजन चैनल एक से एक बढ़कर दावे पेश कर रहे है। आज एक प्रमुख समाचार चैनल ने एक ब्लाग पर से दिखाई गई तस्वीरों के बिना पर पाकिस्तान के सरकारी दावे की धज्जी उड़ाई। इन तस्वीरों को आप भी देखिए..




जाहिर है इस ब्लाग पर दी गई इन तस्वीरों में बहुत कुछ साफ नहीं है। लेकिन ये ब्लाग की ताकत को दिखाता है। चैनल ने लगातार कई घंटों तक ब्लाग के नाम और उसमें कहीं गई बातों को दिखाया। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब एक बड़ी राजनीतिक हत्या के बाद एक ऐसे सोर्स को पेश किया गया, जो पाकिस्तान में तो अभी नया ही कहा जा सकता है।
भारतीय चैनलों की इस हड़बड़ी को समझना जरूरी है। दरअसल कल दिन से ही एक अंग्रेजी चैनल ने पाकिस्तान में द हिंदू अखबार की संवाददाता के जरिए इस बात को बताया कि कैसे बेनजीर की हत्या के वक्त वे मौका ए वारदात पर थी। फिर हिंदी के समाचार चैनलों ने पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री जावेद चीमा के बयान को आधार मानकर थ्योरी को स्कल डैमेज से जोड़कर दिखाया गया। कहीं न कहीं सरकार के नजरिए को चैनल दिखा रहे थे। जबकि आज उनका रूख बीच वाला था। शाम से ही भारत में चैनल गोली की थ्योरी और स्कल डैमेज के बीच अंतर को दिखा रहे थे। पत्रकारीय सोच की एक झलक दिख रही थी। लेकिन पल पल बदलने वाले इस हादसे में जांच का रूख तय करता पाकिस्तान की सरकार ही दिख रहा था।

वैसे शाम तक ब्लाग पर दिखी तस्वीरों से एक बार फिर दिखा एक आम नजरिया। जो कहीं न कहीं सरकार के दावों की धज्जियां उड़ा रहा था। खैर सूचना के इस दौर में नए खुलासों के लिए इंटरनेट की इस नई दखल का स्वागत किया जाना चाहिए।

"सूचक"
soochak@gmail.com


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Saturday, December 29, 2007

Appeal to save a pro-people journalist...pls sign and circulate

Dear friends and comrades,

This is to inform you of the recent arrest of Prashant Rahi, a senior journalist of Uttarakhand, by the state police. Prashant was arrested on 15th of this month in Dehradun and was allegedly charged of being a Maoist commander. The police secretly confined him for five days after which he was shown arrested from the forests of Hanspur Khatta on 21st December. The police have charged him with various sections of IPC including 121, 121A, 124A, 153B, 120B. All the media carried the same version as stated by the police.

Just to give you a background, Prashant Rahi had been working in close association with the local people's struggles in Uttarakhand since last 17 years. He has been a journalist by profession. Started his career from Himachal Times, moved on to The Statesman and worked many years covering people's issues. He is a native of Maharashtra and pursued his education from Banaras Hindu University.

This incident is in continuance of the trend set by many innocent arrests in the last few months including that of Binayak Sen and some journalists in Kerala and Andhra Pradesh of targeting pro-people intellegentsia. The trend has become increasingly apparent in those parts of the country where people's movement is strong.

We firmly believe that this state action is a part of the efforts being carried out by the various state governments to secure hefty amount of funds from the central government in the name of combating naxalism. For this, it becomes imperative for them to prove that the state is inflicted with this insurgency.

We, the undersigned, strongly condemn the arrest of Prashant Rahi and call upon all the concerned individuals, civil society organisations, journalist unions, writers unions, people's movements and struggling groups to join hands in solidarity and support. Please send your consent at saveprashantrahi@gmail.com


Rajendra Dhasmana (President, PUCL, Uttarakhand)
Manglesh Dabral (Poet and Journalist)
Pankaj Bisht (Editor, Samayantar)
Anand Swaroop Verma (Journalist and Human Rights Activist)
P.C. Tiwari (National Secretary, Indian Federation of Working Journalists)
Suresh Nautiyal (General Secretary, Uttarakhand Patrakar Parishad)
Anil Chaudhary (President, INSAF)
Jagdish Yadav (Photo Editor, Pioneer)
Harsh Dobhal (Managing Editor, Combat Law)
Shekhar Pathak, Senior Fellow, Nehru Memorial Museum and Library
Gautam Navlakha (Consulting Editor, Economic and Political Weekly)
Ashish Gupta (Asamiya Pratidin)
Anil Chamadia (Journalist)
Jaspal Singh Siddhu (UNI)
A.K. Arun (Editor, Yuva Samwad)
Madan Kashyap (Poet)
Pankaj Singh (Poet and Journalist)
Karuna Madan (Journalist)
Piyush Pant (Editor, Lok Samwad)
Sarvesh (Photo Journalist)
Panini Anand (Journalist, BBC Hindi)
Avinash (Journalist, NDTV India)
Bhupen Singh (Journalist, STAR News)
Sukla Sen (CNDP India)
Aanchal Kapur (Kriti Team)
Vijayan MJ ( Delhi Forum)
Sanjay Mishra (Special Correspondent, Dainik Bhaskar)
Prem Piram (Director, Jagar Uttarakhand)
Ashok Pandey (Poet)
Arvind Gaur (Director, Asmita Theatre Group)
Pankaj Chaturvedi (Poet)
Satyam Verma (Rahul Foundation)
Ranjit Verma (Advocate)
Bishambhar (Secretary, Roji Roti Bachao Morcha)
Ajay Prakash (Journalist, The Public Agenda)
Swatantra Mishra (Journalist, IANS)
Vandana (Special Correspondent, Nai Dunia)
Shree Prakash (INSAF)
Abhishek Srivastava (Freelance Journalist)
Rajeshwar Ojha (Asha Pariwar)
Raju (Human Rights Law Network)
Rajesh Arya (Journalist)
Kamta Prasad (Linguist and Translator)
Abhishek Kashyap (Writer)
Thakur Prasad (Managing Editor, Samprati Path)
Rajiv Ranjan Jha (Writer)
Srikant Dube (Journalist)
Rishikant (Journalist)
Pankaj Narayan(Journalist)

Friday, December 21, 2007

नम्बर वन चैनल्स और दर्शक

तो क्या हम आप दिनभर टीवी देख देख कर इन चैनलों को ये चिल्लाने का मौका दे रहे हैं कि हम है नम्बर वन चैनल, जिसे देख रहा है पूरा हिंदुस्तान। हमारी टीआरपी रेटिंग है इतनी और हमारा बाजार शेयर है इतना। क्या किसी भी तरह के चैनल के लिए इतना कह देना काफी हो जाता है कि वो इस हफ्ते रहा नम्बर वन। बिना इसकी परवाह किए कि जो दिखाया जा रहा है, वो कितना मुफीद है। बात को कंटेंट मोरेलाइजेशन से आगे लाते है। हमने टीवी को कई दौर में देख लिया। एक, जब को मध्यमवर्गीय बुनियादों और समाज की दरारों को टटोल रहा था, घर घर में होने वाली चुहलबाजियों को परोस रहा था। ये दौर धार्मिक सीरियलों के उत्थान और उससे जुड़ रह नए दर्शकों की भावनाओं का था। इसमें फिल्मी गाने और पिक्चरों को परोस कर समाज को एक धारा में लाने की कोशिश थी। पिक्चरें भी समाज का सच दिखाती थी।

वक्त थोड़ा और बदला। निजी टेलिविजन में पेश किया गया ऐसा कंटेंट जो, धारा में विचलन के साथ मध्यमवर्गीय कुंठा और स्वपन लोक की उसकी दुनिया के नजदीक था। टीवी पर नकारात्मकता के ये शुरूआती दिन थे। दूरदर्शन के साथ इक्का दुक्का मनोरंजन चैनलों पर आ रहा था परिवार। एक गढ़ा परिवार, जहां दर्द से लेकर जुड़ाव अभिनय की पेशकश थे। फिर भी इससे दर्शक को सुख मिलता रहा। फिल्मों और गानों को तमाशे के साथ पेश करना शुरू हो गया था। पहले तबस्सुम और गंभीर आवाजें समाज के इस सश्क्त दर्पण को दिखा रही थी। गानों के बीच कामेडी ने वो जगह बनाई जो, पहले अपनी अलग मुकाम रखती थी। हंसी और हंसाने का अंतर घट रहा था।

एक दौर ऐसा भी था, जब समाचार का समय हुआ करता था, अनुशासन और गंभीरता के साथ। फिर चौबीस घण्टा के समाचार की आदत लगाने के लिए खोजी और बनाई गई खबरें। एक खबर की उम्र भी तय होने लगी। फालो अप की परंपरा दम तोड़ती रही। चौबीस घण्टे के चैनल की भाषा और पेशकश में एक रवानी बनाए रखना जरूरी था। रखी गई रवानी। शुरू के दो हिंदी के समाचार चैनलों ने अपने दर्शक वर्ग को गढ़ा और पोषित भी किया। लेकिन शाम को गंभीर खबरों की जगह बनी रही।

मनोरंजन में कामेडी, बनते बिगड़ते रिश्तों और डर की जगह, अब एक माहौल लेता जा रहा था। शाम को हर मनोरंजन चैनल का चेहरा एक सा लगने लगा। पुता लिपा और बेहद रंगीन। इसमें षड़यंत्र, खेल और रिश्तों की घालमेल पेश की जाने लगी। एक घर में एक ही नारी, एक सावित्री, एक कैकेयी। बढ़िया रहा। महिलाओं को अपनी सास, ननदों को देखने का नजरिया बदलने लगा। घरों में बच्चों के लिए कम, सीरियल के लिए ज्यादा वक्त मिलने लगा। दौर अभी तक जारी है। शाम को एक घर में अगर दो टेलिविजन है तो, एक पर महिला जारी है।

बच्चों के लिए टीवी खराब है। ये बात मां बाप, सर्वे, बौद्धिक सभी मान रहे थे। शाम को कार्टून देखने की एक घण्टे की आजादी उन्हे काफी नहीं लगती थी। पार्क और मैदान तो शहर में सिमट गए है। सो खेले कहां। सब खेल बच्चों के दिमाग में ही सिमटने लगा। दो साल से लेकर बारह साल का बच्चा एक ही कार्टून किरदार को देखकर खुश होने लगा। दिमाग एक सा होने लगा। बौद्धिक विकास से लेकर बर्थडे पार्टी में बच्चे गांधी या नेहरू को न जानकर कार्टून किरदारों की बांचने लगे। मां बाप टीवी देखने में व्यस्त रहे। बच्चों के चौबीस घण्टे के कार्टून चैनल पनपने लगे। बच्चे घर में गायब हो गए। मां बाप के बीच रहकर एक एनिमेटेड दुनिया में।

आज। घरों में संबंध है। पैसे है। गाड़ी है। लेकिन खाली दिन को क्या किया जाए। पता नहीं। टीवी पर एक सा देखने के आदी लोग मजबूर है। देखते है। रात होती है। सोते है। सुबह एक अखबार की सुर्खियां देखने से थोड़ा सुकून लगता है। लेकिन टीवी देखना आदत है। देखते है। समाचार चैनलों पर सब कुछ है, लेकिन रस नहीं मिलता। वहां नाच गाना भी है, अमेजिंग विजुअल्स भी है। लेकिन ये देखना किसी को बांधता है, तो किसी को तोड़ता। चैनल हर हफ्ते दावा करते है, कि उन्हे ही देखा जा रहा है। वे खुश है। लेकिन देखने वाले से किसी ने नहीं पूछा है कि वो क्या देखना चाहता है।

दरअसल दर्शक भी सेवा की कीमत चुकाने के बाद ज्यादा नहीं सोचता। जो दिखता है, देखता है। उसे अब कर्तव्य और अधिकार की लड़ाई लड़ने का मन नहीं करता। दुनिया के उससे जुड़े तनाव, उसे भारी लगते है। जो दिख रहा है, वहीं सत्य लगता है।

टीवी के अंदर और बाहर एक सा नजर आता है। बनाने वाले एक सा बनाते जा रहा है। देखने वाला एक सा देख रहा है। ट्रेंड सेटर कहते है वे नया पेश कर रहे है। लेकिन हर नए को पुराना बनने में केवल कुछ महीने लगते है। फिल्मों में जो दिखाया जा रहा है, उसे पहले ही टीवी इतना दिखा देता है कि उसे देखना बासी रोटी खाना होता है, घी के साथ।

तो क्या ऐसा ही चलेगा। जाहिर है अगर आप अधिकार नहीं चाहते तो जी हां। और अगर घर में परिवार है, दिमाग में विचार है और है आपको एक बदलते समाज का इल्म तो दो लाइन किसी को लिखकर ये जताना कि आप गलत कर रहे है, काफी होता है। वैसे गलत और सही का फासला मिट रहा है। जो दिख रहा है वहीं सही मानकर बिक रहा है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Monday, December 03, 2007

मनोरंजन जगत में रूका तूफान


कहीं दीप जले कहीं दिल। ये बात आज आपके सामने मौजूद सात हिंदी मनोरंजन चैनलों से समझी जा सकती है। सात कौन-कौन। स्टार प्लस, ज़ीटीवी, सोनी, सब, स्टार वन, सहारा वन और डीडी वन। कुछ ज्यादा ही ‘वन’ हो चले है। ये बात दीगर है कि जिसके नाम के साथ ‘वन’ जुड़ा है, वो अभी तक नम्बर ‘वन’ के पायदान से कोसों दूर है। पिछले कई सालों से कुछ चैनलों की बादशाहत से अब जाकर दर्शकों को कुछ निजात मिली है। क्या इसे नयापन भी कहा जा सकता है। शायद। बीते दिनों एक नए चैनल के एयर होने और अगले महीने एक के आने की खबर से बाजार में हलचल बढ़ी है। दरअसल स्टार प्लस की कई सालों की बादशाहत को चुनौती देने वाले भी इसी समूह से निकले दो लोग है। यानि नब्ज और समझ दोनों के स्तर से वाकिफ। 9 एक्स चैनल ने पहले दस्तक दी। 12 नवम्बर को ये चैनल नौ बजे से आने लगा। तीन बड़े कार्यक्रमों की फेहरिस्त के साथ। तीनों की कहानियों में किरदार मध्यम और उच्च वर्ग की आकांक्षाओं के चेहरे थे। यानि फार्मूला पुराना था। वैसे भी दर्शकों को जिस फंतासीपन की आदत लग गई हो, उसे ही परोसना सधा सौदा होगा। जिया जले, कहें न कहें, मेरे अपने जैसे सोप ओपेरा देखने की आदत अब हमारे संपन्न घरों को लग चुकी है। हां, चैनल का दावा बेहतर प्रोडक्शन वैल्यू देने का है। यानि ज्यादा लाइटिंग, ज्यादा कास्ट्यूम और ज्यादा मेकअप। गांव में रहकर शहर के सपने, शहर में रहकर संबंधों का षड़यंत्र और प्रेम की कई नायाब डेफेनिशन गढ़ना। हो सकता है प्रतिभाओं की तलाशनो की उनकी मुहिम ‘मिशन उस्ताद’ से दो चार लोग कुछ दिनों के लिए हर जुबान पर चढ़ जाए, लेकिन अंत सबको पता है। जीवन की सचाईयों के आगे सब फसाने कुछ पल के लिए ठहरते है। लेकिन सीरियल दर सीरियल एक अलग दुनिया गढ़ने की कारीगरी में लगे है।

टीवी मनोरंजन में डीडी के स्वाभिमान, जूनुन से जो प्रयोग किए गए वो आज क्योंकि सास भी...कहानी घर घर की.. से आगे आते हुए मेरी पचासवीं शादी में आइएगा जरूर तक जैसे कार्यक्रम प्रोमो तक आ चुकी है। खैर इस दौरान जिस फार्मेट ने टीवी मनोरंजन को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया है, वो रहा रिएल्टी शोज का। यानि मधुर आवाज की खोज वाले कार्यक्रम। इनकी कड़ी लंबी है। सारेगामापा से लेकर स्चार वायस आफ इंडिया तक। इससे ही जुड़ा है सेलिब्रिटी को गाने और नचाने के प्रोग्राम। इसे हिट फार्मूला मानते हुए आज भी आने वाले चैनल इसे आजमा रहे है। तो देखते रहिए 9x का धमाल एक्सप्रेस और इंतजार करिए मिशन उस्ताद का।

जिस आने वाले चैनल का बाजार को इंतजार है, वो एनडीटीवी समूह का शुद्ध मनोरंजन चैनल होगा। एनडीटीवी इमेजिन। यानि कल्पना। कल्पना करिए कि क्या क्या परोसा जाएगा इस चैनल पर। दोस्ती, दरार, कामेडी, इमोशन और ड्रामा। तो नया क्या होगा। हर चैनल पर तो यही दिखता है। चैनल का मानना है कि वो हर कुछ परोसेगा। लेकिन अलग अंदाज में। अलग अंदाज। चलिए मान लेते है। ये तो तभी तय होगा जब इसे पसंद या खारिज किया जाएगा।

लेकिन ये सारे संकेत क्या कहते है। क्या भारतीय टीवी का मनोरंजन अपने सीमित दायरों में फैल कर बढ़ने का इंतजार करेगा। या एक समय पर एक जैसे कंटेंट के जरिए लोगों में एक तरह की भावनाए तरंगे पैदा करेगा। या इसे अपनी रचनात्मकता के लिए हमेशा विदेशी कांसेप्ट्स को देसी रंग में बेचना भाता रहेगा। या ये शहर और गांव के बीच एक नई दुनिया बसाकर भुलावा पैदा करना जारी रखेगा। ये सवाल इस टीवी के मनोरंजन के कर्ता धर्ताओं से है। यानि से सवाल आम समझ रखने वाले दर्शकों के है। हमारे जैसे आम दर्शक।

टीवी चैनलों के प्रसार से दर्शक और उत्पाद दोनों को भारी फायदा हुआ। दोनों ने अपने अपने तरीके से इसे लिया। बाजार ने हर घर और दिमाग में सीधी पहंच बनाई, तो दर्शक को अपने खाली समय में मनोरंजर की एक ठीक ठाक खुराक मिली। ये अलग बात है कि उसके सपनों की बुनियाद को केन्द्र में रखकर ही ज्यादातक कार्यक्रमों ने टीआरपी, टीवीआर बटोरी। लेकिन इस दौरान उसे एक हकीकत से दूर ऱखा गया। टीवी मनोरंजन के फसाने में फंसने के बाद वो अपनी जिंदगी के ताने बाने से कट सा गया। बिल्कुल सिनेमाहाल में बैठे दर्शक की तरह। बाहर बरसात हो या धमाका। वो गुम है पर्दे की बनाई दुनिया में। पर्दे का सुख उसका, दुख उसका।

टीवी मनोरंजन से जो उम्मीदें है, वो अभी मरी नहीं है। वो वास्तविकता के करीब तो है, पर वास्तविक नहीं। सो आने वाले वक्त में बोरियत भरे सीक्वेंस से बेहतर वो देखना होगा, जो सच है। अमीरी और गरीबी के बीच का सच। ये किसी तरह की समाजवादी मांग नहीं है। ये वक्त के दायरे में दिखाए जाने वाले धुंधले आइने में सच दिखाने की गुजारिश है। आज भी इस देश में डिस्कवरी और एनजीसी जैसे चैनलों की व्यूवरशिप करोड़ों में है। तो क्या खुद के बनाए समाज को जानने में क्या दर्शक की रूचि नहीं होगी।

खैर। सपनों की दुनिया में आने वाले वक्त में कई दावेदार एक साथ एक ही केक में हिस्सा बांटने के लिए चिल्ल पौं मचाएंगे। और इसे देखना दर्शक की खुशी और गम दोनों होगा। जाहिर है हर चैनल अपने लिए एक नया दर्शक वर्ग खड़ा करने में कोई न कोई नया कदम उठाएगा। और तय जानिए इसके ठीक बाद दूसरा चैनल उसी वर्ग को वैसे ही कंटेंट के साथ काटेगा।
बहरहाल देखते रहिए इस मनोरंजन को। और मनोरंजन जगत में रूके इस तूफान को भी। दरअसल टीवी दुनिया को भी एक ऐसे तूफान का इंतजार है जो उसके दर्शकों की संख्या को यकायक बढ़ा दे। और सीधी बात है इस तूफान से जुड़ा है बाजार और प्रचार।

Soochak
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Sunday, November 25, 2007

A ticket to wait...

Internet changes the social communication of urban society. We may face a virtual identity on net, but geeks enjoy anonymity. In the meantime, the media, aviation, retail, tele communication, finance, investments are become your second land on Internet. You use Internet to deal anyone, buy and purchase,make your life easy and save time.
But all merits have demerits. So, the ticket booking facility of Internet has some dark circles.

Read this email, this is ent by a buyer of internet ticket.

Media Yug got this mail on 17 November by k.i.s.sandhu@gmail.com.

And we only want to aware the internet community, that this is also a issue to concern. The mail was sent to some media news channels.


Media Yug
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from k.i.s.sandhu@gmail.com

to feedback@ndtv.com,

info@aajtak.com,
info@saharaone.com,
mediayug@gmail.com,
email@indianews.com,
editor@ibnlive.com,
web.moca@nic.in


date Nov 17, 2007 5:38 PM
subject An important issue....
mailed-by gmail.com

Hi,

I am Kanwar Inder Singh Sandhu. I am working at Bangalore.

I have a complaint regarding the airlines and the websites which book the tickets for the domestic airlines

I have purchased a ticket from ezeego1.com on 23rd October, 2007 . Ticket was scheduled for Delhi to Bangalore on 12th November, 2007 at 7:10 a.m. in morning. PNR number and reference number was issued for the ticket by ezeego1.com. Ticket was with JetLIte airways. The amount has been deducted from my ICICI Gold Credit Card.

When I reached the airport at 4.30 a.m. on the day of departure I asked the JetLite officials at the airport counter to confirm that ticket is ok. That guy, only having a look at the e-ticket print out, confirmed the ticket and asked me to enter into the terminal via gate number 1. I (as ticket was confirmed by airline official), asked my parents to leave for Patiala, Punjab.

After my parents left, I entered the terminal to get the boarding pass. I got through my luggage scanning and get into the queue for getting the boarding pass. But to my utmost surprise the JetLite official at the boarding counter, declined the air ticket saying that there is no booking for the specified PNR and reference number. I again checked with the reservation officials of JetLite. At this time officials were changed and after checking into the system they refused the ticket and told that they can't do anything about this. And I was not allowed to board the plane.

I tried calling ezeego1 customer center numbers but no one was picking up the phone. And the situation is same till today. No one picks the phone even after 30 minutes of call. So, I with no option left I started looking for another flight but due to diwali season no flight was available for 12th November, 2007. So, after 5 hours fight with JetLite and ezeego1 I left the airport and went for hotel in Delhi.

Then I got the flight for Wednesday i.e. 14 th November, 2007. I have to stay at a hotel at Delhi, lost three working days and an important meeting at office, and new flight cost me a lot. The mental and physical harassment that I went through was immense.

After reaching Bangalore I mailed ezeego1 and JetLite asking for explanation for the same and refund of ticket charges. JetLite responded back with the same answer that there was no booking for your PNR that's why you were not allowed to board the plane. But the frauds, ezeego1, have not replied till today. I have mailed them three times but of no use.

There are some other guys and gals which are facing the same problem with the tickets booked from ezeego1. You can check them out at

http://www.complaintsboard.com/complaints/ezeego1-travels-amp-tours-pvt-ltd-c33102.html

I know two guys personally who went through the same, these guys are:

Gaurav Banyal
Location: Bangalore .
Contact Number: +91-9986082635

Shailesh
Location: Bangalore .
Contact Number: +91-9886289201


I kindly request you to please help us out. And help us to bring this issue in front of Indian public and government, So that no other fellow Indian should face the same problem as we are facing right now. Indian government should take a strict action against these websites.

If you want I can give you e-ticket copy and the scanned copy of the written and duly stamped statement from JetLite.

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Kanwar Inder Singh Sandhu,

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छोटे शहरों में लोकल टीवी


इन तस्वीरों को देखने के बाद जो पहली राय बनती है, वो मायने रखती है। इन्हे कौन देखता होगा। जब आपके सामने आज तकीनीकी ने एक से एक बेहतरीन नजारों और प्रस्तुतियों वाले कार्यक्रम दे रखें है, तो हर मध्यम और बड़े शहर में दसियों की संख्या में चलने वाले इन लोकल चैनलों के ग्राहक कौन लोग हैं।

आज हर एक लाख से ऊपर की आबादी वाले नगर में कई लोकल चैनल चल रहे है। इनमे से ज्यादातर तो केबल कनेक्शन के संजाल का व्यापार करने वाले लोगों के है। ये धंधा भी इसी तरह पनपा है। लोकल टीवी का मतलब भी है कि पूरी तरह स्थानीय। मालिक से लेकर खबर तक। हम इस परिभाषा में अपवाद पा सकते है। सिटी चैनल या इन केबल जैसे चैनलों के तौर पर, जो बड़े शहरों में जीटीवी और हैथवे के लोकल चेहरे हैं।

खैर, बात को छोटे शहरों के लोकल प्रसारणों पर लाते है। तो क्या शहर के लोगों को सचमुच इन लोकल चैनलों पर दिखाए जाने वाले लोकल लेवल के प्रसारणों में रूचि है। अगर आप व्यापार की नजर से इसे देखेंगे तो ये कुछ लाखों का खेल है। प्रसराण के लिए केबुल वाले से सांठगांठ और दिखाने के लिए कुछ कैमरों और एडिटिंग मशीनों की पूंजी। और कमाई के लिए टीवी के हर कोने में कुछ हजार रूपयों में चलने वाला व्यापार।

दरअसल लोकल टीवी ने तकरीबन आज से पांच छह साल पहले अपनी पारी शुरू की। मानिए कि क्षेत्रीय चैनलों के शुरू होने के बाद से। आईडिया वहीं था, लेकिन दिखाना क्या था ये तय नहीं था। सो इस पारी की शुरूआत हुई दिन भर गानों की पेशकशों से। पहले बालीवुड, फिर क्षेत्रीय संगीत फिर पाइरेटेड नई फिल्में, कभी कभी कोई एडल्ट मूवी और फिर शाम को दूरदर्शन की तरह तय समय पर दिखाया जाना लगा समाचार।


समाचार का अपनी दायरा होता है। सो लोकल टीवी ने दायरा बनाया नगर और गांव को। सांसद, विधायक, उद्धाटन,अपराध, सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल आयोजन, और तमाम शहरी जानकारियां। इन खबरों में साफगोई के अलावा सबकुछ होता है। दृश्य टीवी पर चलते है। और राय बनाने से इनकी सरोकार कम होता है।
लोकल टीवी में जो आता जाता है, वो उस इलाके में तभी देखा जाता है, जब वहां की खबर या अपनी मौजूदगी उसमें दर्शक को दिखती है। समस्या उठाने से लोकल टीवी का नाता कम ही दिखता है। लोकमंचों में भी प्रस्तोताओं की लचर प्रस्तुतियों से मुद्दा कमजोर होता है। स्थानीय हितों के आगे सबकुछ कमजोर नजर आता है।

शायद तभी लोकल टीवी की छवि टीवी पर धुँधली नजर आती है। लेकिन इससे हमें ये संकेत भी मिलता है कि हर मोर्चे पर आपको दिखाने वालों की कमी नहीं है। लेकिन जिसे देखना है वो शायद अभी ध्यान नहीं दे रहा है।
आने वाले वक्त में बाजार और चेतना के बढ़ने पर इन लोकल चेहरों में कुछ पैनापन आएगा। इसकी वजह संचार माध्यमों से मिलने वाली धारदार सूचना और कम्पेरिजन होगा। उम्मीद है कि ये लोकतंत्र में आवाज को आगे लाने में मददगार होंगे।

सूचक
soochak@gmail.com


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Sunday, November 11, 2007

ओम शांति ओम बनाम सांवरिया


कला बनाम तमाशा। ओम शांति ओम बनाम सांवरिया। या कहें सांवरियां बनाम ओम शांति ओम। एक में बिखरा है नजारों का तमाशा तो दूसरी कला की नुमाइश पेश करती है। दोनों ही फिल्में पिछले दिनों एक दूसरे से टीवी पर जंग लड़ रही थी। अपने आप को हर घर, हर दिमाग और हर सोच में बुनने के लिए टीवी से बढ़िया हथियार कुछ नहीं हो सकता है। वार जारी रहे।
दोनों फिल्मों में समानताएं है। आप कहेंगे क्या गैरजरूरी बात है। पर है। ओम शांति ओम का स्ट्रगलिंग करता ओम बनना चाहता है सुपर स्टार। सांवरियां का राज भी अपनी पहली पेशकश, स्टेज पर, के बाद रानी मुखर्जी से पूछता है कि क्या वो स्टार बन सकता है। ओम की शांति से दोस्ती के बाद दूसरी मुलाकात में शांति उसे नजरअंदाज करती है। राज से दूसरी मुलाकात में सकीना भी यहीं करती है। एक माया को हकीकत बनाती फिल्मी दुनिया के फसाने को सपनों में बुनकर बदले की भावना के साथ पर्दे पर पेश करती है। तो दूसरी यानि सांवरिया भी एक फंतासी लोक में एक हीरो की हीरोइन से मुलाकात करवा फसाने बुनता है।

लड़ाई व्यक्तित्व की ज्यादा लगती है। पर्दे पर आप संजीदा अभिनय को हमेशा सराहते है। भावुक हुए तो आंसू आंख कि किनारों पर आ जाते है। ओम शांति ओम में ओम का दिल टूटना, आग में प्यार का खाक हो जाना, पुरानी बातों में खुद को तलाशना या सांवरिया में राज की चुभन, सकीना का जुनूनी प्यार, गुलाबजी की नापाक मोहब्बत सब छू जाती है। लड़ाई किरदारों ने लड़ी है और हर कोई इनाम का हकदार है।

पर्दे का हीरो लबरेज है एक नई ऊर्जा से। शाहरूख की चपलता, रणबीर की चंचलता, दीपिका की मदहोशी, सोनम की खामोशी सब कुछ खो जाने के लिए काफी। दीवाली पर बोनांजा है ये सब।

एक दर्शक को खींचने में ओम शांति ओम ज्यादा सफल बताई जा रही है। सांवरिया की स्टारटिंग धीमी रही। क्या इसे दोनों की पटकथाओं में दर्शक की रूचि का परिणाम माना जाए। खैर आम दर्शख पटकथा क्या जाने। उसे तो उसके आस पास के संचार माध्यमों ने बताया कि ओम शांति ओम फुल्ली टाइमपास एंटरटेनिंग मूवी है और सांवरिया एक गंभीर निर्देशक की नायाब प्रस्तुति। जाहिर है मनोरंजन प्रथम। सो ओम शांति ओम ने अभी मार रखी है बाजी।

सांवरिया के एक दृश्य में भारत का जिक्र है। राज की मकानमालकिन कहती है कि ऐसा तो भारत के इतिहास में पहली बार हुआ होगा। राज अपने कपड़े प्रेस कर रहा होता है। एक फंतासी दुनिया, नीले काले सेटों की यूटोपिया, और प्यार को तलाशते दो अनोखे किरदार। रूसी कहानी से प्रेरित फिल्म में भारत की जिक्र निर्देशक की चूक है या सोचा समझा छलावा।

ओम शांति ओम में इक्तीस सितारों वाले गाने के बाद हीरो जा पहुंचता है अपनी पिछली जन्म की मां के पास। कैसे उसे सबकुछ याद आ गया। आखिरी सीन में भूत बनकर शांतिप्रिया आ धमकती है। पुनर्जन्म और भूत। जबकि फिल्म में विलेन बने मेहरा खुद ओम कपूर से कहते है कि पुनर्जन्म की कहानी पर फिल्म बनाना बेवकूफी है। ओम शांति ओम अपने ही फार्मूले को फिल्म में कई बार काटती है। पर चलती है।

भारतीय सिनेमा में दो नए चेहरों की नुमाइश में इन दोनों फिल्मों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्मों को कला को सर्वश्रेष्ठ माध्यम माना गया है। और कला की नुमाईश में सचमुच कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है ओम शांति ओम और सांवरिया ने।

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Friday, November 02, 2007

खून में सने शब्‍दों का दौर


एनडीटीवी के पत्रकारों प्रकाश सिंह और अभय मोहन झा समेत अन्‍य चैनलों के पत्रकारों पर बिहार के दुर्दान्‍त विधायक अनंत सिंह द्वारा किए गए हमले की मीडियायुग घोर निंदा करता है। पिछले दिनों देहरादून समेत पूरे देश में जिस तरीके से पत्रकारिता पर हमले तीखे हुए हैं, वह दिखाते हैं कि किस तरीके से सत्‍ताएं अब निरंकुश होती जा रही हैं और सचाई को दबाने की साजि़शें तेज हो रही हैं। हालिया घटना के बहाने दुनिया भर में पत्रकारों पर हमलों का जायज़ा लेती अभिषेक श्रीवास्‍तव की एक रपट कॉम्‍बैट लॉ के अप्रैल-मई अंक से साभार...



यह सच है कि हमारे समय में सबसे बड़ा संकट यदि खड़ा हुआ है, तो वह सचाई का है। सही सूचना हमेशा सही दृष्टिकोण का निर्माण करती है और परिदृश्य को ठीक-ठीक समझने में हमारी मदद करती है। इस लिहाज से अगर अखबारों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर बात की जाए तो हम पाएंगे कि एक परिघटना की तरह जैसे-जैसे अखबारों के संस्करण क्षेत्रीय हुए हैं, घटनाओं के कोने-अंतरे में रिपोर्टर-स्ट्रिंगर फैले हैं तथा टीवी चैनल केबल से ग्लोबल हुए हैं, ठीक वैसे ही सही सूचना का संकट हमारे सामने गहरा होता गया है। चाहे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इराक, फलस्तीन और लेबनान जैसे संकटग्रस्त क्षेत्रों से रिपोर्टिंग का सवाल हो अथवा मऊ और गोरखपुर जैसे राजनीतिक और साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील पूर्वी भारत और बिहार के इलाके, माइक्रो से लेकर मैक्रो तक सही खबर लाने का न तो आग्रह दिखता है और न ही सूचना माध्यमों की दिलचस्पी कि वे बाजारू एजेंडे को छोड़ कर जनपक्षीय रिपोर्टिंग करें।

एक बार को हम सरसरी तौर पर कह कर निकल सकते हैं कि मीडिया में लगने वाली पूंजी की विशालता और बाजार के ये दबाव हैं, जिसमें जनता के सूचना के अधिकार का हनन होता है। लेकिन, यही एक पहलू होता तो भी बात बन सकती थी क्योंकि बाजार के दबावों से मुक्त होना व्यक्तिगत प्रतिबध्दता और साहस की मांग करता है। चूंकि, पत्रकारिता का मूल स्वभाव ही सत्ता विरोधी रहा है, लिहाजा साहसिक पत्रकारों की आज भी कमी नहीं दिखती। लेकिन, पूंजी दुधारी होती है। बाजार जिस सत्ता विमर्श से संचालित होता है, वह दोहरे तरीके अपनाता है। एक ओर पत्रकार को लिपिक में तब्दील करता है तो दूसरी ओर प्रतिबध्दता और साहस पर प्रत्यक्ष हमले करता है। ये हमले ग्लोबल होते हैं। रूस से ले कर देहरादून वाया इराक अभिव्यक्ति पर गोली दागी जाती है, तलवार चलाई जाती है और दूसरी ओर अभिव्यक्ति को सहमति में बदलने की कोशिशें जारी रहती हैं।

पिछले दिनों मीडिया संस्थानों, प्रेस की आजादी के लिए लड़ने वाले समूहों और कुछ मानवाधिकार संगठनों के एक गठजोड़ इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टिटयूट की एक रिपोर्ट आई है जो यह साबित करने के लिए काफी है कि न तो हमारे समय में जनपक्षीय पत्रकारों की कमी है और न ही सत्ताएं उन्हें बख्शती हैं। यह रिपोर्ट कहती है कि पिछले एक दशक में 1100 से ज्यादा पत्रकारों और उनके सहयोगियों की जानें रिपोर्टिंग के दौरान ले ली गईं हैं। इनमें से करीब आधों को गोली मार दी गई और अधिसंख्य, करीब 657 पत्रकारों को अपने ही देश में रिपोर्टिंग के वक्त मार डाला गया। 'किलिंग द मैसेंजर' नामक यह रिपोर्ट बताती है कि इराक युध्द शुरू होने के बाद पत्रकारों पर हमले बहुत तेज हुए हैं। यह संयोग नहीं है कि पिछले एक दशक में पत्रकारों के लिए सबसे खराब वर्ष 2006 रहा जिसमें मारे गए पत्रकारों की कथित संख्या पूरी दुनिया में 167 रही। यह संख्या 2005 में 149, 2004 में 131, 2003 में 94, 2002 में 70 और 2001 में 103 रही।

पिछले वर्ष की 167 की यह संख्या अगर कम जान पड़ती हो तो 31 दिसम्बर 2006 को जारी प्रेस की आजादी के लिए काम करने वाली संस्था 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के आंकड़े देख लें। इसमें मरने वालों की संख्या छोड़ दें तो पिछले वर्ष 871 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, 1472 पर शारीरिक हमला किया गया या उन्हें आतंकित किया गया, 56 का अपहरण किया गया और 912 मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित किया गया। ये आंकड़े पूरी दुनिया के हैं। सबसे खतरनाक स्थान इराक रहा जहां 2003 में युध्द शुरू होने के बाद से लेकर अब तक 139 पत्रकार मारे जा चुके हैं। इसके बाद सबसे खतरनाक स्थिति रूस और कोलंबिया की रही। रूस इस मायने में विशिष्ट रहा कि पुतिन के सत्ता में आने के बाद 21 पत्रकारों को मार दिया गया। पिछले अक्टूबर में नोवाया गजेटा की मशहूर पत्रकार अन्ना पोलित्कोव्सकाया की दिनदहाड़े गोली मार कर की गई हत्या ने यह साबित कर दिया कि बहुत लोकप्रिय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त बड़े पत्रकार भी सत्ता की हिंसा से नहीं बच पाते। याद करें कि कश्मीर टाइम्स के दिल्ली में ब्यूरो चीफ इफ्तिख़ार गिलानी जैसे लोकप्रिय पत्रकार को भी भारतीय सत्ता ने नहीं बख्शा था, जबकि उनका कसूर सिर्फ इतना भर था कि वे कश्मीर के एक अलगाववादी नेता के दामाद हैं।

एक नई परिघटना पिछले साल यह देखने में आई कि जैसे-जैसे मुख्यधारा के मीडिया में स्पेस घटने के कारण इंटरनेट की ब्लॉग जैसे विधा पर अभिव्यक्ति की बौछारें शुरू हुईं, ठीक उसी गति से इंटरनेट पर प्रतिबंध और हमले भी तारी किए जाने लगे। पिछले दिनों भारत में कुछ ब्लॉग्स पर जबरदस्त प्रतिबंध अकारण ही लगा दिया गया था जो संकेत है कि जितनी तेजी से पत्रकार अभिव्यक्ति के रास्ते खोज रहे हैं, सत्ताएं भी उसी गति से हमले जारी रखे हुए हैं। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने 13 देशों को पिछले वर्ष 'इंटरनेट का दुश्मन' घोषित किया था। इनमें बेलारूस, बर्मा, चीन, क्यूबा, मिस्र, ईरान, उत्तरी कोरिया, सउदी अरब, टयूनीशिया, तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान और वियतनाम हैं। इन देशों के ब्लॉगरों और ई-पत्रकारों को अक्सर जेलों में डाल दिया जाता रहा है। वेबसाइटों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं और सत्ता विरोधी संदेशों को मिटा दिया जाता रहा है। पिछले वर्ष 30 ब्लागरों को गिरफ्तार कर कई हफ्तों तक हिरासत में रखा गया था। इन देशों में सबसे आगे चीन, ईरान और मिस्र थे।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलों को कितनी गंभीरता से दुनिया भर के देशों में लिया जाता है, यह इसी से पता चलता है कि पिछले वर्ष हुई हत्याओं के दो-तिहाई मामलों में हत्यारों की पहचान नहीं की जा सकी तथा सिर्फ 27 मामलों में आरोप दाखिल किए गए हैं। चूंकि, हर साल मारे जाने वाले अधिकतर पत्रकार कमोबेश अचर्चित, छोटे संस्थानों के स्थानीय बीट कवर करने वाले होते हैं, इसलिए उन्हें लेकर बहुत दबाव नहीं बन पाता। और जहां तक बड़े पत्रकारों की हत्या का सवाल है, इनके हत्यारे ही बाद में हत्या की जांच के लिए कमेटी गठित कर साफ बच निकल जाते हैं, जैसा कि अन्ना पोलित्कोव्सकाया के मामले में हुआ है। 'समयांतर' के दिसम्बर 2006 अंक में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक इस बहुचर्चित विपक्षी पत्रकार पर रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी की बरसों से नजर थी और हमले भी उसने कई बार करवाए। आखिरकार, अन्ना को जाना ही पड़ा। ठीक ऐसे ही चीन में विदेशी मीडिया के दो बड़े पत्रकारों झाओ यान और चिंग चेयांग को क्रमश: तीन और पांच वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसका हल्ला होने के बावजूद उन्हें उनकी मौत की सजा के खिलाफ अपना बचाव करने का मौका नहीं दिया गया था।

आंकड़ों के मुताबिक अगर देखें तो प्रतिवर्ष पत्रकारों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं और धीरे-धीरे खबर लाने वाले जीव राजनीतिक भेड़ियों के सॉफ्ट टारगेट में तब्दील हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस मसले पर बोलने वाले समूह नहीं, बल्कि मुख्यधारा के मीडिया के भीतर जो विभाजन पूंजी के आधार पर पत्रकारों के बीच इधर के कुछ वर्षों में हुआ है- चाहे वह वेतन का हो, भाषाई कारणों से या प्रोफाइलगत- उसने खुद पत्रकार बिरादरी में ही एक ऐसा सत्ताधारी वर्ग खड़ा कर दिया है जिसे किसी स्ट्रिंगर के मारे जाने का दर्द छू तक नहीं जाता। ऐसे में, हम कह सकते हैं कि आने वाला समय जनपक्षीय पत्रकारिता के लिए न सिर्फ भूमंडलीकरण, वैश्वीकरण और उदारीकरण के जुमलों की वजह से खतरनाक होगा, बल्कि सीधे कहें तो खबरियों की हत्याएं और बढ़ेंगी।

चूंकि, सूचना हथियार है और राजा कभी नहीं चाहेगा कि यह हथियार प्रजा के पास आ जाए। और, सबसे दीगर बात यह हमेशा याद रखना है, कि पत्रकार चाहे अमेरिका का हो या गाजीपुर का, न्यूयॉर्क पोस्ट का हो या किसी जागरण का, वह आखिर में प्रजा का ही हिस्सा होता है।


घर की आग

चूंकि, भारत में निजी मीडिया को आए एक दशक से कुछ ज्यादा वक्त ही हुआ है, इसलिए यहां अब भी खासकर टीवी पत्रकारिता उतनी परिपक्व नहीं हो सकी है जितना पश्चिमी देशों में है। इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों में हर चैनल पर आई स्टिंग ऑपरेशनों की बाढ़ ने पत्रकारों पर हमलों की स्थितियों को पैना कर दिया है। इस तरह के मामलों में हालांकि अब तक कोई बहुत बड़े नुकसान की खबर तो नहीं रही है, लेकिन केन्द्र सरकार समेत राज्य सरकारें जिस किस्म के दमन चक्र की जमीन बना रही हैं, उसमें भविष्य बहुत खतरनाक दिखाई देता है।

छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पिछले दिनों लाया गया एक कानून इस मामले में गौर करने लायक है। चूंकि, राज्य नक्सली आंदोलन की चपेट में है इसलिए वहां किसी को भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करने पर तीन साल की सजा देने का प्रावधान बनाया गया है। यहां तक कि कोई गैर-पत्रकार भी यदि सरकार की नज़र में माओवादियों के संपर्क से जुड़ा हुआ है या सरकार को ऐसी शंका होती है, तो वह दंड का भागी होगा। गृह मंत्रालय की एक गुप्त रिपोर्ट के बारे में पता चला है कि पूरे देश में जहां कहीं जनवादी संघर्ष चल रहे हैं, सरकार को उन क्षेत्रों में सशस्त्र बल विशेष सुरक्षा कानून(आफ्सपा) लागू करने का प्रस्ताव दिया गया है। वैसे भी, सरकार यह मानती है कि देश के पंद्रह राज्य नक्सलवाद की चपेट में हैं। यदि ऐसा हुआ तो देश भर में स्थितियां कश्मीर और पूर्वोत्तर जैसी हो जाएंगी। फिर खबरें जैसी भी आ रही हैं, वे भी दबा दी जाएंगी। तब पत्रकारिता सिर्फ बिग बॉस जैसी चीजों तक सिमट कर रह जाएगी। भविष्य की यह तस्वीर हमें पिछले दिनों 'द ग्रेटर कश्मीर' के संपादक और आंध्र में एक द्विमासिक पत्रिका के संपादक वेणुगोपाल पर राजसत्ता द्वारा किए गए हमलों के रूप में दिखाई देती है। प्रकाश सिंह और उनके साथियों पर अनंत सिंह द्वारा किया गया हमला ताज़ा मिसाल है कि इस देश में अब पत्रकारिता करने का क्‍या नतीजा हो सकता है।

उपर्युक्त या तो प्रत्यक्ष तौर पर सत्ता के हमलों अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता के दुरुपयोग की कहानी कहते हैं। कम से कम समूचे दक्षिण एशिया के बारे में कहें तो नेपाल की संसद में माओवादियों के आने के बाद जो स्थिति बनी है, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसके दलालों द्वारा अभिव्यक्ति और लोकतंत्र के प्रति उनकी दमनकारी कार्रवाइयों को और ज्यादा सुनियोजित बना रही है। उस पर से कई मायनों में अपसंस्कृति के हमले की वजह से मीडिया और प्रेस का एक बड़ा सत्ताधारी तबका खुद अपने ही अधिकारों के प्रति संवेदनशील नहीं रह गया है। ऐसे में, खासकर भारत के संदर्भ में प्रेस की आजादी बहुत कुछ तब तक पत्रकारों के कंधों पर ही टिकी हुई है जब तक अभिव्यक्ति के दुश्मनों के दांत प्रच्छन्न हैं। जब ये सामने आएंगे, तब तक व्यक्तिगत साहस और प्रतिबध्दता के दायरे बदल चुके होंगे।


कुछ आंकड़े

मारे गए पत्रकार/सहायक गिरफ्तार शारीरिक हमला अपहरण मीडिया संस्थान प्रतिबंधित

2006 113 871 1472 56 912

2005 68 807 1308 - 1006

Thursday, November 01, 2007

रेडियो की दशा दिशा...


रेडियो को लेकर एक चर्चा जारी है। रेडियो के हालिया बरसों में विस्तार के बाद उसके बदलते स्वरूप पर विचार किया जा रहा है। एक वेबमैगजीन ने इसे अपने इस बार के त्रैमासिक अंक में जगह दी है। रेडियो से जुड़े बहुत सारे पहलुओं पर यहां अपने विचार लिखे गए है।

आप भी इन विचारों से अवगत हो।

http://mediavimarsh.com/

Media Yug

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Media and Poverty: Not so newsy

Media is no poor. It has the market, the ruler and the news of upwardly developing India. International Day for the Eradication of Poverty passed on 17 October. The media is silent. We somehow get the facts that there is acute poverty in our country. Sometimes a story evoke our conscience. And we feel little embarrased. But is like a sneez.

We got a good analytical story on a website, read and open your eyes...

Is the media watching poverty enough?

Courtesy: www.indiatogether.org

Media Yug

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Friday, October 12, 2007

A greed to pay.....

Communication tools give you the liberty to enjoy. With the boom of Communication in India some offers cost you deadly. They claim that they give you something free and at the end you got that you are cheated.

Media Yug got a mail, the mail was forwarded to news channels also, which show how much coslty the greed affair is.

Read and spread a caution word. We are not a party or any benefit from it, but we are conecrn about the tendency, the offers generate. And afterall this mail was sent to many newschannels. Every viewer of television has the right to know about his weaknesses and ofcourse his RIGHTS.


to: laxmi@mobile2win.com
cc: trai@del2.vsnl.net.in,
himani.bhatnagar@airtel.in,
sanjay.dakwale@airtel.in,
raghunath.mandava@airtel.in,
ruchi.bhutani@airtel.in,
nodalofficer.raj@airtel.in,
appellate.raj@airtel.in,
info@aajtak.com,
info@saharaone.com,
feedback@ndtv.com,
mediayug@gmail.com,
email@indianews.com


subject cheating to a airtel subscriber by mobile2win.com

dear miss laxmi,

i have complaint against u and ur company, being a loyal custmor of airtel since last 6 years, as u know and aware that by playing a game named"naam inaam" on airtelworld.com which was runned by ur company "mobile2win.com".i was declered a proud owner of a samsung lcd tv LA20S51as written in email sent by u on 14th june 2007 to confirm and accept the prize and deposit the TDS amount of Rs 9058. it was also told u telephonically to me on same day. i have sent u TDS cheque no.742523 Citi bank of Rs.9058 on 17/06/2007 which was cleared from my account on 28/06/2007. as u have said tha i will receive my prize within 7-15 days after clearance of tds. i talked to u then after 15 daysof waiting on ur mobile 9323931634 and then u said that due to some technical problems i have to wait for more 10-15 days. after 15 days again i talked to u and then u said that u have sent the request to ur vender Mr. rahim of futurebazar.com and gave me a order no.1000263524 and told me to communicate this person only in future for the gift. then repeatedly i have talked to rahim and u about my gift but both of u did nothing. at last on around 20th of august 2007 rahim told me to send me a form no. 18A for taxation purpose (VAT) which is available only to traders and shopkeepers and impossible for me to arrnge that. then in last of august he told me that samsung tv is out of stock so he can give me LG tv model C2R. i have talked to u have conviced me to accept thatone. i have accepted but next day Mr. rahim told me that he cant give me this one but now he can give LG LZ50. again after talking to u i accepted. ultimately after a long period of 2 and 1/2 month i got the tv on 6 september 2007 which was neither samsung nor LG C2R/LZ 50 it was LG C1R as written on invoice of futurebazar.com.here in jaipur i enquired about these two model C1R and LZ50 and got the information that both these models was obsolete now. again italked to u and u said that dont open the parcel and u will talk to ur senior officials and give 7 days. after that u gave me assurance to take back that parcel and will send me a darft of Rs.26650/ of my gift amount. on monday 17 sept.2007 Mr. rahim phoned me that he will not return the tv and whatever i could do i am free to do. i then talked to u and i am sorry to say that ur response to a customer was not good u told me that we have sent u atv of about same prize either it was samsung or LG i have to accept that u now cant do nothig. remember that playing that game on airtelworld.com and mobile2win.com i have spent about Rs.8000 which was paid by my monthly airtel bills.
now after spending a lot of money and 3 month of my valuable time also my extra money to STD calls to u and rahim i didnt get the thing which i have won. i am complaining to AIRTEL and TRAI about all this matter. also i will go to consumer court.

Dr. Santosh Ailani
D-175, nirman nagar, kings road, ajmer road, jaipur 302019
santoovinita2005@yahoo.co.in
+919829065666

:> This mail was sent on Oct 1, 2007.

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Sunday, October 07, 2007

सूचना के खरीदार आप

किस तरह की पत्रकारिता के खरीदार है आप। सुबह से लेकर शाम तक आपके सामने से कई तरह के संचार साधन गुजरते है। हर की कीमत तय है। अखबार, टीवी, रेडियो और इंटरनेट। सबने बीड़ा उठा रखा है कि वो आपको सूचना देगी। एक ऐसी सूचना, जिसका उपयोग आप अपनी किसी जरूरत को पूरा करने में कर पाएंगे।
अखबार में पहले पन्ने की खबर में से पाई गई एक सूचना से दिनभर की बासी बहसों को नया आयाम मिला करता था। लेकिन आज तमाम और निजी जरूरतों ने इनपर कब्जा कर लिया। किसी से पहली मुलाकात में देश, विदेश और समाज नहीं अब फाइनेंस, गाड़ी, मोबाइल और बेहद ऊपरी बातें होती है। ये हाल तो शहर का है। लेकिन ग्रामीण अंचलों में लोग अब सरकार से ज्यादा लोकल स्कीम्स, व्यवसाय की खबरों, मंडी भाव और मनोरंजन की खबरों को तव्वजों देने लगे है।
टीवी ने जिस ऊबाउपन को दूर किया था, आज वो बीच बीच में आने वाले ब्रेक्स से बढ़ गया। तकरीबन एक सी प्रस्तुतियों से लोगबाग अपनी सामान्य समझ को किनारे रखकर टीवी देखने लगे है। मनोरंजन की विविधता के दर्शन के नाम पर गाना बजाना, फूहड़ हंसी और रोमांच के नाम पर पैसों का खेल। लेकिन इसके भी दो चेहरे है। सरकारी चैनल अभी भी कुछ जमीनी है। वैसे भी दूरदर्शन के दर्शक कम से कम अपने घरों में नैतिकता की शिकायत नहीं कर सकते। निजी टीवी चैनलों की रचनात्मकता केवल बनावटी और नकल को अपने ढांचे में पेश करने में ज्यादा दिखती है। वैसे अपने कांसेप्ट पर हमने जो भी ऊंचाईयां पाई है, वो आज के दौर में इतिहास है। आगे आने वाले दिनों में बेकार समय गुजारने का माध्यम टीवी अगर नहीं बन पाया तो इसके पीछे केवल देशकाल की समझ रखने वाले कंटेट को ही अपनाना वाला होगा। जो हमें अपनी पहचान के पास रखेगा, और टीवी को उसकी।
रेडियो की आवाज बदल गई है। वहां आवाजें तो बहुत है। लेकिन प्रभाव घट गया है। हालांकि रेडियो को इस धमाल का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिसके गाने बजाने से आज रेडियो जिंदा है। एफएम एक पहल थी। जो बीते कुछ सालों में लूप में बजने वाले गाने सी होकर रह गई है। सरकारी रेडियो ने भले ही अपनी मौजूदगी बनाए रखी हो, लेकिन उसका पुरकशिश अंदाज अब पुराना सुर सा लगता है। खबरों के लिए रेडियो सुनने वालों की कमी हो गई है। सुबह शाम बीबीसी सुनने वाले अब कम हो चले है। रेडियो को नई पहचान तो मिली, लेकिन उसकी अतीत अब ज्यादा प्रभावी लगता है।
इंटरनेट पर खबर पढ़ने वालों को माध्यमों की बहुलता से जूझना पड़ता है। आप गूगल पर खोजकर सूचना को ज्यादा उपयोगी नहीं बना सकते। सूचना को सींचना कैसे ये इंटरनेट पर तय करना मुश्किल है। सबसे बड़ी दिक्कत तो स्क्रीन की चंचलता ही है। प्रचार, सामग्री का ऐसा घलमेल होता है कि आप कि एक गलत क्लिंकिग आपका समय ही बर्बाद करती है। और अगर आप किसी ग्रुप के सब्सक्राइबर है तो सूचना के साथ आफर इतने कि आप का जी आजिज। शोध की गहरी संभावना को शायद इंटरनेट ने खत्म सा कर दिया है। इसे पत्रकारिता अच्छे से समझ सकता है।

तो क्या आने वाले वक्त मे हमें एक नए संचार माध्यम की जरूरत होगी। या हम वाहियात सी लगने वाली सूचनाओं से अपने आप को आगे बढ़ाएंगे। बहरहाल जो भी हो आप खरीदार बनें रहेंगे। और जो भी उत्पाद आप खरीदेंगे उसी से तय होगा कि आपकी सूचना क्या है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Friday, September 28, 2007

एफएम रेडियो के नए वार

“नेपाली को इंडियन आईडल बना दिया, अब हमारा घर, महल्ला का चौकीदारी कौन करेगा जी”


ये शब्द रेड एफएम के एक रेडियो जॉकी नितिन के थे। जिसकी तपिश अब सिक्किम में देखी जा रही है। ये शब्द उस मानसिकता से निकले है, जो सालों से एक वीर कौम को देश की सेवा में निरंतर देखे जाने के बाद भी कायम है। बहादुर, नाम से ही हम सारे नेपालियों को समझते है। माने बहादुरी गुण नहीं, पेशा हो गया।

रेडियो पर दिनभर बकवास को पेश करने वाले जबान को पेशा बनाने वाले प्रस्तोताओं को अपने शब्दों का कीमत ये वाक्या ही समझा सकता है। देश भर में तीन सौ एफएम रेडियो चैनल है और दिन भर में अगर शब्दों की बरसात का अंदाजा लगाया जाए तो ये देश की जनसंख्या के आधे पर तो बैठेगी।

इस खास वाक्ये में क्योंकि इण्डियन आईडल का विजेता प्रशांत तमांग जुड़ा था, तो ये मुद्दा बन गया, लेकिन भाषाई तबको में नए खुले रेडियो चैनल क्या दिन भर में ऐसी तमाम गलतियां नहीं दोहराते होंगे। सवाल ये है कि क्या रेडियो को प्रचार के बीत गाना सुनाने का यंत्र मान लिया गया है। क्या रेडियो की रचनात्मकता और भूमिका केवल समय गुजारने के लिए पेश किए जाने वाले कार्यक्रमों में समा गई है।

आज रेडियो की बेहतरीन पेशकश करने वाले भी जानते है कि बाजार को साथ लेकर चलना कितना जरूरी है। और यहीं से शुरू हो जाता है सांस्कृतिक हल्के पन का एक तमाशा।

सितम्बर 24 की रात को नितिन ने विजेता के लिए जो शब्द कहे, वो केवल शब्द नहीं मानसिकता की सही तस्वीर दिखाता है। रेडियो जॉकी पूरी तैयारी के साथ ही स्टूडियो आते है। लेकिन काम का दबाव इन्हे अलग जुमले गढ़ने से रोकता है। सो निकलता वो है जो कहीं से काम का न हो या फिर किसी न किसी को कमजोर करता है।

रेडियो की नई भूमिका के लिए कोई मानदण्ड है कि नहीं ये पता करना आसान नहीं है। दिल्ली, लखनऊ, मुंबई या और महानगरों में कई नामों से जारी एफएम एक कपड़े में अलग अलग चेहरे से लगते है।

आने वाले दिनों में रेडियों की पहुंच छोटे शहरों से जुड़े गांवों तक होगी। और तब क्या किसान खेतों में गाना सुनकर खेती करेगा। या बेरोजगार अपना दिन इसी बकवास के बीच गुजार देगा।

बीते दिनों सरकार ने कहा कि उसे निजी रेडियो पर समाचार प्रस्तुत करने देने में कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते उस पर कोई नजर रखे। आज तो किसी की नजर है नहीं, आगे क्या होगा भगवान जाने।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या रोडियो को टाइमपास बनाने में इन रेडियो जॉकियो की सबसे बड़ी भूमिका है। और अगर है तो क्या लगता है कि रेडियो का भविष्य केवल दाम और नाम के बीच गाना बजाने की बची है।

http://sikkimnews.blogspot.com/2007/09/idol-ridiculed-protests-in-darjeeling.html
http://sikkimnews.blogspot.com/2007/09/24-hours-kalimpong-bandh-over-rj-nitin.html

Soochak
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Thursday, September 27, 2007

अखबार और उसकी खबर

पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता

भूमिका
प्रक्रिया
खबरों का विषय
कहाँ से आयी है खबरें
प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय)
प्रस्तुति
स्रोत
चित्रों का प्रयोग
प्राथमिकताओं में तुलना
पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता: प्रमुख निष्कर्ष

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तालिकाएं

तालिका 1: खबरों का विषय

तालिका 2 : कहाँ से आयी है खबरें

तालिका 3 : प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय) :

तालिका 4 : प्रस्तुति

तालिका 5 : स्रोत

तालिका 6 : चित्रों का प्रयोग


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भूमिका


अखबार लंबे समय से प्रामाणिक सूचना का स्रोत रहे हैं. आज संचार के नए नए माध्यमों के आ जाने के बाद भी हालत यह है कि बहुत से लोग टीवी पर खबर देखने के बाद अगले दिन के अखबार से उसे ' कन्फर्म' करते हैं.

पहले पन्ने को अखबार का आईना माना जाता है. इस पर छपी खबरों का आम जनता पर व्यापक प्रभाव पडता है. इन विषयो के प्रति लोगों में जागरुकता भी बढती है. कई बार पहले पन्ने की खबरें उस दिन की अन्य घटनाओं की महत्ता को मापने का पैमाना भी बनती है. एक वरिष्ठ पत्रकार के शब्दों में "अखबार के पहले पन्ने पर छपी खबरें उस दिन का इतिहास तय करती हैं."

इसलिए अखबारों की जिम्मेदारी बनाती है की वह पहले पन्ने पर ऐसी खबरों को छापें जिनका आमजन से व्यापक सरोकार हो, जिनके बारे में जानना देश व समाज के विकास के लिए जरुरी हो और जो लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले हों.

अखबार किन मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, यह पहले पन्ने पर छपी खबरों से स्पष्ट हो जाता है. इसलिए पहले पन्ने पर छपी खबरों के प्रति उनकी प्राथमिकता के बारे में जानना महत्वपूर्ण है. इस समय देश में हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के अखबार बड़ी संख्या में पढे जाते हैं. दोनों ही भाषाओं के अखबारों का अपना ख़ास पाठक वर्ग है. इसलिए दोनों की प्राथमिकताओं का अलग- अलग विश्लेषण भी जरुरी है.

दोनों भाषाओ के अखबारों की प्राथमिकताओं को जानने के लिए सीएमएस मीडिया लैब द्वारा अगस्त 2007 में प्रकाशित प्रमुख हिन्दी और अंग्रेजी दैनिकों के पहले पन्ने का अध्ययन किया गया.

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प्रक्रिया

1-31 अगस्त के बीच प्रकाशित हिन्दी दैनिकों हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा व अंग्रेजी दैनिकों द हिन्दू, द इंडियन एक्स्प्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने पर का अध्ययन किया गया.

इनमें छपी खबरों का निम्नलिखित आधारों पर विश्लेषण किया गया.

खबरों का विषय
कहां से आयी हैं
प्रभाव क्षेत्र (अंतर्राष्ट्रीय/राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय),
प्रारूप,
स्रोत,
चित्रों का प्रयोग और
हिन्दी व अंग्रेजी अखबारों की प्राथमिकताओं में तुलना.


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खबरों का विषय

दोनों ही भाषाओं के अखबारों में राजनीति की खबरों को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी गयी है. इसके बाद अपराध को प्राथमिकता दी गयी है. वहीं कला- संस्कृति, पर्यावरण, वन्य जीवन, फैशन, जीवन-शैली, मौसम, कृषि और मीडिया जैसे महत्वपूर्ण विषयों को दोनों ही भाषाओं के अखबारों ने नजरअंदाज किया. अखबारों के पहले पन्ने पर इन विषयों से न के बराबर खबरें छपी.

राजनीति व अपराध पर की खबरों की संख्या आर्थिक मामलों के खबरों के दोगुना से ज्यादा है. वहीं विकास संबंधी अन्य विषयों से कई गुना ज्यादा संख्या में राजनीति व अपराध की खबरें छपी.

अलग अलग विषयों की खबरों को मिली प्राथमिकता का विश्लेषण आगे किया जा रहा है.

राजनीति : दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर राजनीति की खबरें सबसे ज्यादा छपी. हालांकि अंग्रेजी अखबारों ने इस विषय को ज्यादा (हिन्दी के मुकाबले 3% ज्यादा) कवरेज दी. उनमें पहले पन्ने पर छपी 23% खबरें इस विषय से थीं. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय की 20% खबरें छपीं.

अपराध : दोनों ही भाषा के पत्रों की दूसरी प्राथमिकता अपराध विषय है. दोनों ने अपराध की खबरों को बराबर प्राथमिकता दी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने की 13% खबरें इस विषय पर हैं. वहीं अंग्रेजी अखबारों मे इस विषय के अखबारों की संख्या 12% है.

अंतर्राष्ट्रीय : अंतर्राष्ट्रीय मामलों की खबरों को भी अखबारों पहले पन्ने पर प्रमुखता दी. इस विषय पर हिन्दी अखबारों में अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा खबरें छपी. हिन्दी अखबारों मे पहले पन्ने पर 12% खबरें इस विषय से हैं. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 9% खबरें इस विषय से हैं.

न्याय-व्यवस्था : दोनों भाषाओं के पत्रों ने न्याय- व्यवस्था को बराबर प्राथमिकता दी. दोनों भाषाओं के अखबारों मे पहले पन्ने पर इस विषय के खबरों की संख्या 9-9% है.

आर्थिक मामले : हिन्दी अखबारों में व्यापार/ आर्थिक मामलों की खबरें अंग्रेजी से ज्यादा छपी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर औसतन 7% खबरें आर्थिक मामलों से थी वहीं अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर 5% खबरें इस विषय से थीं.

मानवीय रुचि: मानवीय रुचि की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर इस विषय से 6% खबरें थी.

खेल : खेल की खबरों को दोनों अखबारों पहले पन्ने पर लगभग बराबर प्रमुखता दी. हालांकि हिन्दी अखबारों में इनकी संख्या अंग्रेजी के मुकाबले थोडी ज्यादा है. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर खेल की खबरों की संख्या कुल खबरों का 7% थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल समाचारों का 6% खेल समाचार थे.

सुरक्षा : राष्ट्रीय सुरक्षा की खबरों को हिन्दी से ज्यादा प्राथमिकता अंग्रेजी अखबारों ने दी. इनके पहले पन्ने पर 5% खबरें राष्ट्रीय सुरक्षा विषय से थी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इन खबरों की संख्या कुल खबरों का 3% थी.

फ़िल्म : फिल्म, मनोरंजन व सेलिब्रेटी से जुडी खबरों को हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों भाषाओं के अखबारों के पहले पन्ने पर इन विषयों से 4-4% खबरें छपी.

जननीति/शासन :
जननीतियों और शासन की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 4-4% इस विषय थीं.

दुर्घटना/प्राकृतिक आपदा :
दुर्घटनाओं व प्राकृतिक आपदाओं की खबरों को भी दोनों भाषा के पत्रों ने समान प्रमुखता दी. दोनों ही भाषाओं के पत्रों के पहले पन्नों पर इस विषय की लगभग 3% खबरें छपी.


कानून-व्यवस्था :
हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर कानून व्यवस्था की खबरों को ज्यादा संख्या में (अंग्रेजी के मुकाबले) प्रकाशित किया. हिन्दी पत्रों के पहले पन्ने पर कुल खबरों की 3% संख्या इस विषय से थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में इस पन्ने पर 2% खबरें इस विषय से थी.

भ्रष्टाचार:
भ्रष्टाचार की खबरों की कवरेज में दोनों भाषाओं के अखबारों में बडा अंतर है. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के दोगुने से ज्यादा संख्या में भ्रष्टाचार की खबरों को पहले पन्ने पर छापा. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय के खबरों की संख्या कुल खबरों का लगभग 5% थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर मात्र 2% खबरें इस विषय से थीं.

शिक्षा : शिक्षा की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बराबर महत्व दिया. दोनों के पहले पन्ने पर छपी 2% खबरें शिक्षा से थीं.

नागरिक मामले: नागरिक मामलों से जुडी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अपेक्षाकृत ज्यादा प्राथमिकता दी. इनके पहले पन्ने पर 4% खबरें नागरिक मामलों की थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर इस विषय की 3% खबरें छपी.

स्वास्थ्य : स्वास्थ्य की खबरों को दोनों भाषाओं के अखबारों ने बहुत कम प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 1% इस विषय से थीं.

विज्ञान और प्रौद्योगिकी :

विज्ञान और प्रौद्योगिकी की खबरों को हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर अंग्रेजी के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी. हालांकि इनकी संख्या हिन्दी अखबारों में छपी अन्य खबरों की तुलना में बहुत कम है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों की महज 1% संख्या इस विषय से थी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में इस पन्ने पर विज्ञान व प्रौद्योगिकी से न के बराबर खबरें छपीं.

अन्य विषय : दोनों भाषाओं के अखबारों ने अन्य विषयों की खबरों को बराबर प्राथमिकता दी. दोनों के पहले पन्ने पर 2-2% खबरें अन्य विषयों की थी.

*** धार्मिक विषय की खबरें सिर्फ हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर छपी. इनकी संख्या इस पन्ने पर छपी कुल खबरों की संख्या का 1% थी. वहीं मौसम की खबर सिर्फ अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर छपी. इनकी भी संख्या अंग्रेजी पत्रों के पहले पन्ने पर छपी खबरों का 1% थी.

राजनीति व भ्रष्टाचार को छोडकर शेष विषयों के प्रति दोनों अखबारों की प्राथमिकताओं में खास अंतर नहीं है. राजनीति की खबरों को अंग्रेजी अखबारों में प्राथमिकता मिली वहीं भ्रष्टाचार की खबरों को हिन्दी अखबारों में ज्यादा प्राथमिकता दी गयी.

तालिका 1: खबरों का विषय

विषय अंग्रेजी
अखबार
हिन्दी
अखबार

खबरों की संख्या (%)
अंतर्राष्ट्रीय 9 6
राजनीति 23 20
सुरक्षा 5 4
आर्थिक मामले 5 5
खेल 6 7
कला/संस्कृति 0 0
अपराध 12 12
न्याय-व्यवस्था 9 10
पर्यावरण व वन्य जीवन 0 0
मानवीय रुचि 6 6
स्वास्थ्य 2 1
दुर्घटना/प्राकृतिक आपदा 3 3
कानून-व्यवस्था 2 4
विज्ञान और प्रौद्योगिकी 0 1
फ़िल्म 4 4
धार्मिक 0 1
शिक्षा 2 2
नागरिक मामले 3 4
फैशन व जीवन शैली 0 0
मौसम 1 0
जननिति/शासन 4 3
भ्रष्टाचार 2 5
कृषि 0 0
मीडिया 0 0
अन्य 2 2
कुल 100 100


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कहाँ से आयी है खबरें
दोनों ही भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर अधिकतर दिल्ली से आयी खबरें थी. ग्रामीण क्षेत्रों, चेन्नै और कोलकाता से आयी खबरों को न के बराबर जगह दी गयी हैं. इस पन्ने पर दिल्ली आयी खबरों की संख्या लगभग 61.5% है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों, चेन्नै और कोलकाता तीनों वर्गों की खबरों की कुल संख्या लगभग 1% है.

अलग अलग जगहों से आयी खबरों को मिली प्राथमिकता का विश्लेषण आगे किया जा रहा है.

दिल्ली : दिल्ली से आयी खबरें लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी. यहां से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले ज्यादा तरजीह दी. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर 66 फीसदी खबरें दिल्ली से आयी जबकि अंग्रेजी अखबारों मे इस पन्ने पर दिल्ली से आयी खबरें (57%) थी.

अंतर्राष्ट्रीय :दूसरे देशों से आयी खबरों को अखबारों दोनों भाषाओं के अखबारों ने लगभग बराबर प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया. अंग्रेजी अखबारों मे पहले पन्ने पर विदेश से आयी खबरों की संख्या 11% थी. वहीं हिन्दी अखबारों में इन खबरों की संख्या 10% थी.

अन्य शहर (राजधानियों को छोडकर) :अन्य शहरों से आयी खबरें भी लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपी. इन शहरों से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों ने अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया. इनके पहले पन्ने पर अन्य शहरों से आयी 12% खबरें छपी जबकि अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर इन शहरों से आयी 10% खबरें छपी.

राजधानी (महानगरों को छोडकर): राज्यों की राजधानियों को अंग्रेजी अखबार ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. अंग्रेजी अखबारों ने पहले पन्ने पर राज्यों की राजधानियों से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों के दुगुने से भी ज्यादा संख्या में प्रकाशित किया. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर राजधानियो से आयी 12% खबरें थी वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर इनकी संख्या महज 5% रही.

ग्रामीण क्षेत्र : ग्रामीण इलाकों के प्रति दोनों भाषाओं के अखबार उदासीन हैं. लगभग सभी अखबारों के पहले पन्ने पर ग्रामीण क्षेत्रों से आयी खबरों की संख्या नगण्य है.

चेन्नै /कोलकाता : महानगर होने के बावजूद चेन्नै और कोलकाता से आयी खबरों को अखबारों के पहले पन्ने पर न के बराबर जगह मिली है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर इन दोनों जगहों से आयी खबरें न के बराबर छपी. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कोलकाता से आयी 1% खबरें छपी.

मुम्बई : अंग्रेजी अखबारों ने मुंबई से आयी खबरों को हिन्दी अखबारों के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी. इनके पहले पन्ने पर मुंबई से आयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 10% थी. वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर मुंबई से आयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 8% थी.

इस तरह स्प्ष्ट हो जाता है कि सभी अखबारों की पहली प्राथमिकता दिल्ली है और सुदूर के इलाकों में इनकी दिलचस्पी कम है.

तालिका 2 : कहाँ से आयी है खबरें

विषय - अंग्रेजी
अखबार
हिन्दी
अखबार


खबरों की संख्या (% में)
दिल्ली 51 65
मुम्बई 10 8
चेन्नै 0 0
कोलकाता 1 0
राजधानी 15 5
ग्रामीण क्षेत्र 0 0
अंतर्राष्ट्रीय 10 10
अन्य शहर 13 12
कुल 100 100



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प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय)

राष्ट्रीय : राष्ट्रीय प्रभाव की खबरों को अखबारों ने पहले पन्ने की लिए सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी है. पहले पन्ने पर छपी दस में से चार खबरें राष्ट्रीय प्रभाव की रहती हैं. दोनों भाषाओं के अखबारों को अलग अलग देखें तो राष्ट्रीय प्रभाव वाली खबरों को दी गयी प्राथमिकता में ज्यादा अंतर नहीं है.

हिन्दी अखबारों के प्रथम पृष्ठ के 41% समाचार इस विषय से हैं, वहीं अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर भी इस विषय की खबरों की संख्या 38% है.

प्रादेशिक : इसके बाद प्रादेशिक स्तर पर प्रभाव रखने वाले खबरों को अंग्रेजी अखबारों ने हिन्दी के मुकाबले ज्यादा प्रमुखता दी. इनके पहले पन्ने पर 36% खबरें प्रादेशिक प्रभाव वाली थी. वहीं हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर इन खबरों की संख्या 30% थी.

अंतर्राष्ट्रीय : दोनों भाषा के अखबारों में अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाले समाचारों को पहले पन्ने पर स्थान दिया गया है. हालांकि इनकी संख्या राष्ट्रीय और प्रादेशिक प्रभाव वाली खबरों की तुलना में बहुत कम है.

अंग्रेजी अखबारों ने अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाले समाचारों को हिन्दी अखबारों के मुकाबले ज्यादा प्राथमिकता दी. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर इनकी संख्या कुल खबरों का 18% थी जबकि हिन्दी अखबारों मे कुल खबरों का 15% अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाली खबरें थी.

स्थानीय :
पहले पन्ने पर स्थानीय महत्त्व के समाचारों को सबसे कम प्रमुखता मिली है. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले लगभग दुगुनी संख्या में स्थानीय महत्व के समाचारों को पहले पन्ने पर जगह दी.

हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर स्थानीय महत्व की 15% खबरें छपी. वहीं अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर 8% खबरें स्थानीय प्रभाव की थी.

तालिका 3 : प्रभाव क्षेत्र (राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय/प्रादेशिक/स्थानीय) :

प्रभाव क्षेत्र अंग्रेजी अखबार हिन्दी अखबार
खबरों की संख्या (% में)
स्थानीय 8 15
राष्ट्रीय 38 41
प्रादेशिक 36 30
अंतर्राष्ट्रीय 18 15
कुल 100 100


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प्रस्तुति
खबरों की प्रस्तुति से भी उनको दी गई महत्ता का पता चलता है. इस खण्ड मे देखा गया है की कितनी खबरों को सामान्य समाचार, विश्लेषण, फीचर या अन्य रूपों में प्रस्तुत किया गया है.

प्रस्तुति को लेकर दोनों भाषाओं के पत्रों में खास अंतर नहीं है. दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर सामान्य समाचारों की प्रधानता है. विश्लेषण कम संख्या मे हैं, फीचर और अन्य रूप तो बहुत ही कम हैं.

दोनों ही भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर छपी दस में नौ खबरें सामान्य समाचार के रूप में होती है. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने सामान्य समाचारों की संख्या पर 93% है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 91% सामान्य समाचार के रूप में छपे.

अंग्रेजी अखबारों में विश्लेषणों की संख्या हिन्दी के मुकाबले 1.5 गुना है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर कुल खबरों का 6% विश्लेषण के रूप में छपे. जबकि हिन्दी अखबारों में इनकी संख्या 4% है.

फीचरों और अन्य प्रस्तुतियों की संख्या दोनों भाषाओं के अखबारों में बराबर है. दोनो भाषाओं के पत्रों में फीचरों की संख्या 1-1% और अन्य प्रस्तुतियों की संख्या 2-2% है.

तालिका 4 : प्रस्तुति

प्रस्तुति अंग्रेजी अखबार हिन्दी अखबार
खबरों की संख्या (% में)
समाचार 91 93
विश्लेषण 6 4
फीचर 1 1
अन्य 2 2
कुल 100 100

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स्रोत
खबरों के लिए प्रयोग किये जा रहे स्रोत यह स्पष्ट करते हैं कि उन खबरों के प्रति अखबार कितने गंभीर हैं. स्रोत के विश्लेषण से हम पाते हैं महत्वपूर्ण मुद्दों को कवर करने के लिए अखबार अपने संवाददाताओं को रखते हैं. अधिकतर अखबारों ने पहले पन्ने पर अपने पत्रकारों की खबरों को प्राथमिकता दी.

इस पन्ने की खबरों के लिए कम ही अखबार समाचार समितियों पर निर्भर हैं. जहां अखबारों के संवाददाता नहीं हैं वहां की खबरें संवाद समितियों से ली गयी. कई बार संवाददाताओं और समाचार समितियों का प्रयोग संयुक्त रूप से किया गया.

अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर उनके संवाददातओं द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 76% थी वहीं हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने के 70% ऐसी खबरें थी.

समाचार समितियों को हिन्दी अखबारों ने ज्यादा प्राथमिकता दी. हिन्दी अखबारों ने पहले पन्ने पर अंग्रेजी के मुकाबले चार गुना संख्या में समाचार समितियों की खबरों को प्रकाशित किया. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर समितियों की खबरों की संख्या कुल खबरों का 24% है. अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर मात्र 6% खबरें समाचार समितियों की हैं.

अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 14% खबरें ऐसी थी जिनके लिए संवाददाता और समितियों दोनों स्रोतों का प्रयोग किया गया. हिन्दी के तीन अखबारों ने सिर्फ एक एक बार ऐसा किया है.

कुछ मामलों में अखबारों ने खबरों के स्रोत का उल्लेख नहीं किया. दोनों भाषाओं के अखबारों में पहले पन्ने पर 4% खबरें ऐसी हैं जिनके स्रोत का जिक्र नहीं किया गया.

तालिका 5 : स्रोत

स्रोत अंग्रेजी अखबार हिन्दी अखबार
खबरों की संख्या (% में)
संवाद समिति 6 26
संवाददाता 76 70
दोनों 14 0
अज्ञात 4 4
कुल 100 100


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चित्रों का प्रयोग
कहा गया है कि "एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है". अखबारों इस कथन की पुष्ट किया है. दोनों भाषाओ के अखबारों में पहले पन्ने के लगभग आधे समाचारों के साथ चित्रों का प्रयोग किया गया है. कई बार तो सिर्फ़ चित्र ही छापे गए हैं.

चित्रों के मामले में दोनों भाषाओं के अखबारों की प्राथमिकताएं भिन्न हैं. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले 15% ज्यादा खबरों के साथ चित्र छापा. हिन्दी अखबारों में पहले पन्ने पर 62% खबरों के साथ चित्र छपे जबकि अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 47% के खबरों साथ चित्र प्रकाशित किये गये.

हिन्दी अखबारों में ऐसी खबरों की संख्या कम (अंग्रेजी से 11% कम) है जिनके साथ चित्र नहीं छपे. अंग्रेजी में अखबारों के पहले पन्ने पर 43% ख़बरें बिना चित्र के छपी. वहीं हिन्दी अखबारों मे पहले पन्ने पर 32% खबरों के साथ कोई चित्र प्रकाशित नहीं हुआ.

खबर के रूप में सिर्फ चित्र को अंग्रेजी अखबारों ने अधिक प्रमुखता दी है. अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 10% समाचार ऐसे थे जिनमें सिर्फ चित्र था. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर ऐसे समाचारों की संख्या 6% थी.

तालिका 6 : चित्रों का प्रयोग :

चित्र अंग्रेजी अखबार हिन्दी अखबार
खबरों की संख्या (% में)
खबरों के साथ चित्र 47 62
बिना चित्र की खबरें 43 32
सिर्फ चित्र 10 6
कुल 100 100


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प्राथमिकताओं में तुलना
हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओ के अखबारों की प्राथामिकताओ में कोई बड़ा अन्तर नही है. खबरों के स्थान, प्रभाव क्षेत्र, प्रस्तुति और चित्र आदि के मामलो में तो स्थिति लगभग एक जैसी ही है. विषयो और स्रोत के संदर्भ में मामूली सा अन्तर है.
हिन्दी अखबार खबरों के लिए समाचार समितियों पर अंग्रेजी अखबारों के मुकाबले ज्यादा निर्भर हैं. लगभग सभी पत्रों की पहली प्राथमिकता उनके पत्रकार है.

विभिन्न विषयो की खबरों की संख्या तो लगभग बराबर है. अंतर्राष्ट्रीय मामले, राष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा जैसे विषयों की संख्या अंग्रेजी अखबारों में ज्यादा है. शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, व्यापार, अर्थ-व्यवस्था व नागरिक मामलो जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे सभी अखबारों में हाशिए पर हैं. राजनीति व अपराध की खबरें ही पहले पन्ने पर छायी हुई हैं.

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पहले पन्ने के लिए अखबारों की प्राथमिकता: प्रमुख निष्कर्ष
चार प्रमुख हिन्दी दैनिकों हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा व नवभारत टाइम्स और चार प्रमुख अंग्रेजी दैनिकों हिन्दुस्तान टाइम्स, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और द इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने के समाचारों के अध्ययन से निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त हुए.

राजनीति की खबरें अखबारों की पहली प्राथमिकता है. इस पन्ने पर औसतन 16.5% खबरें राजनीति से रहती हैं. अंग्रेजी अखबार राजनीति की खबरों को ज्यादा (हिन्दी के मुकाबले 3% ज्यादा) प्राथमिकता देते हैं.
दोनों भाषाओं के अखबारों में राजनीति के बाद अपराध की खबरों को प्रमुखता दी जाती है. पहले पन्ने पर औसतन 12.5% समाचार इस विषय से हैं.

शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थ-व्यवस्था, कृषि-व्यापर व बुनियादी सुविधाएं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को पहले पन्ने पर बहुत कम जगह दी जा रही है. पहले पन्ने पर छपी इन विषयों की खबरों को मिला दें तो वह कुल खबरों की संख्या का दस फीसदी हैं.
राष्ट्रीय महत्व की खबरें पहले पन्ने पर प्रमुखता से छपती हैं. इस पन्ने पर 10 में से 4 खबरें राष्ट्रीय महत्व की रहती हैं. दोनों भाषाओं के अखबारों ने इन खबरों को लगभग बराबर प्राथमिकता दी.

पहले पन्ने पर दिल्ली से आयी खबरें सबसे ज्यादा संख्या में रहती हैं. दस में छः खबरें दिल्ली से होती हैं. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर 41% खबरें राष्ट्रीय प्रभाव वाली थी जबकि अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर ऐसी खबरों की संख्या 38% है.

ग्रामीण इलाकों की खबरों को पहले पन्ने पर नही के बराबर जगह दी जाती है. हिन्दी के तीन और और अंग्रेजी के एक अखबार ने पहले पन्ने पर सिर्फ एक एक खबर को जगह दी.

विश्लेषण और फीचर के रूप में बहुत कम खबरें छपती हैं. दोनों रूपों को मिलाकर औसतन 6% खबरें रहती हैं.

पहले पन्ने पर संस्थान के पत्रकारों द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या ज्यादा रहती है. इसके बाद समाचार समितियों से आयी खबरों की संख्या रहती है.

अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर उनके संवाददातओं द्वारा भेजी गयी खबरों की संख्या कुल खबरों का 76% थी वहीं हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने के 70% ऐसी खबरें थी.

अंग्रेजी अखबार स्रोत के रूप में कई बार समाचार समितियों और अपने पत्रकारों दोनों का प्रयोग संयुक्त रूप से करते हैं. हिन्दी के तीन अखबारों ने सिर्फ एक एक बार ऐसा किया है. जबकि अंग्रेजी अखबारों के पहले पन्ने पर 14% खबरें ऐसी थी.

पहले पन्ने पर चित्रों का प्रयोग प्रमुखता से होता है. कई बार समाचार के रूप में केवल चित्र भी प्रकाशित किए जाते हैं.
औसतन 8% चित्र ऐसे हैं जिनके साथ टेक्स्ट नहीं छापा गया है.

कुछ मामलों को छोड कर हिन्दी और अंग्रेजी अखबारों की प्राथमिकताएं एक जैसी हैं. मुख्य अंतर खबरों के स्रोत में है. अंतर्राष्ट्रीय मामले, राजनीति और सुरक्षा विषयों की खबरों की संख्या में दोनों भाषाई अखबारों में थोडा- बहुत अंतर है.


* स्रोत : सीएमएस मीडिया लैब
अध्ययन अवधि : अगस्त 2007
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# जिन अखबारों का अध्ययन किया गया :


* अंग्रेजी अखबार

हिन्दुस्तान टाइम्स
द टाइम्स ऑफ इंडिया
द हिन्दू
द इंडियन एक्सप्रेस

* हिन्दी अखबार

राष्ट्रीय सहारा
हिन्दुस्तान
दैनिक जागरण
नवभारत टाइम्स
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Tuesday, September 25, 2007

WOMEN JOURNALISTS CALL FOR PUBLIC DEBATE








Press Release

WOMEN JOURNALISTS CALL FOR PUBLIC DEBATE

ON BROADCAST BILL AND CONTENT CODE

The Network of Women in Media, India registers its concern about the Broadcast Bill (Broadcasting Services Regulation Bill, 2007 and Content Code (Self-Regulation Guidelines for the Broadcasting Sector). As media professionals aware of the important role of media in society, we welcome the long-delayed effort towards media regulation, which is a feature of all mature democracies that respect the fundamental human right to freedom of expression, of which freedom of the press/media is a crucial part. The Supreme Court of India has also clearly stated that the airwaves belong to the public and that their use is to be regulated by a public authority in the interests of the public.

We are disturbed about the non-transparent and non-inclusive process of drafting the legislation, and the absence of public consultation and informed debate.


We question the claim of Minister for Information and Broadcasting Priya Ranjan Dasmunsi that only "the broadcast media" are opposed to the establishment of a broadcasting regulatory authority. Several independent and informed commentators have expressed their reservations about the Bill as well as the nature of the authority outlined in it. Many have also argued against the draft Code and for professional, ethics-based self-regulation. We urge the Ministry to place on its website the written responses it has received to the draft documents, some of which contain serious and detailed comments and recommendations.

We also question Mr Dasmunsi's assertion that, besides cable operators, "consumer groups, NGOs and women's groups," support the Ministry's efforts to regulate the media. It is incumbent upon him to make public the identity of those who participated in the discussions, ostensibly on behalf of the public. Such transparency will create a more conducive environment for the necessary open debate on media regulation in India.

Twelve years ago, the Supreme Court directed the central government to take steps to establish an independent public regulatory authority -- representative of all classes and interests in society. Unfortunately, the Broadcasting Authority of India (BRAI), as described in the Bill, cannot be seen as autonomous, considering the overarching influence of the government. We firmly believe that only a genuinely autonomous institution will have any credibility.

The NWMI holds that:

1.. The first step towards media regulation that respects and protects freedom of expression is the setting up of a properly constituted, competent and independent public authority empowered with a clear mandate and guaranteed autonomy.

2.. While we share the evidently widespread public concern about the functioning of sections of the media in recent times, we believe knee-jerk reactions to media malpractices do not bode well for media regulation in a democracy. The regulation of mass media in the public interest must maintain the necessary complex and delicate balance between the market and the state so that neither can interfere with freedom of expression and thereby prevent the media from serving the public.

3.. The draft Broadcast Bill and Content Code do not meet the standards expected of the world's most populous democracy with a long tradition of a vigorous and vibrant media playing a critical but constructive role in the polity.


We therefore call upon the I&B Ministry to issue a series of consultation papers on different aspects of media regulation and to initiate a participatory and informed public debate involving media professionals and journalists' associations, among other sections of civil society. We believe media regulation is too critical an issue to be decided upon without broad consultation.

Sincerely,

Rajashri Dasgupta (Kolkata)

Vasanthi Hariprakash (Bangalore)

Manipadma Jena (Bhubaneswar)

Ammu Joseph (Bangalore)

Anjali Mathur (Mumbai)

Meena Menon (Mumbai)

Laxmi Murthy (Delhi/Kathmandu)

Jyoti Punwani (Mumbai)

Kalpana Sharma (Mumbai)

Charumathi Supraja (Hyderabad)

Shree Venkatram (Delhi)

On behalf of The Network of Women in Media, India

Courtesy:
www.nwmindia.org







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Monday, September 24, 2007

टीवी पत्रकारिता के लिए खुद को बदलने का वक्त

एक दिन में क्या क्या बदल सकता है। ये सवाल आप तीन वजहों से पूछिए। पहला, एक निजी समाचार चैनल को एक महीने की बंदी का फरमान जारी हुआ। दूसरा, एक लड़की ने अपने आप को काम के बोझ, या किसी तनाव में खत्म कर डाला, लड़की टीवी पत्रकार थी। एक दिन में होने वाली इन दो घटनाओं के रिश्ते टीवी पत्रकारिता से इतने गहरे है कि इस दाग को अपने दामन से वो हटा नहीं पाएगा।

टीवी के लिए ये एक ठहराव है। जहां से अब जब वो आगे बढ़ेगा, तो उसे सोचना, समझना और फूंक फूंक कर कदम बढ़ाना होगा। ये झटके उसकी निजी और सामाजिक गलतियों से पनपे है। एक दिन एक खबर में अपनी सफलता के परचम को देखते हुए किन्ही मासूमों को फ्रेम करने वाले एक पत्रकार को एक दिन की सफलता ने ले डूबा, तो टीवी के मायाजाल में उलझी एक लड़की को जिंदगी में मनचाहा न मिलने पर जिंदगी के नाता तोड़ लेना ही रास्ता दिखा।

एक खबर से लोकतंत्र में मिले अधिकार को हाशिए पर लाया जा सकता है। इसकी मिसाल बनी टीवी की एक खबर ने टीवी पत्रकारिता के चरम को हिला कर रख दिया है। लेकिन इसके पीछे एक सच, जो अब एक मौत के बाद चुभने वाला बन चुका है। एक पत्रकार को क्या मार डालता है। उसका काम। उसका नाम या उसके प्रति जिम्मेदारों का असंवेदनशील चेहरा।

कई पहलू उभरे एक महिला पत्रकार की मौत से। छोटे बड़े शहरों, हर तरह के सामाजिक वर्गो, हर तरह की पारिवारिक ढांचों से आने वाले युवक-युवती। सबमें टीवी को लेकर चाहत है, दिखने की चाहत। टीवी की मांग के अनुरूप, इन सुंदर चेहरों को इस्तेमाल भी किया जाता है। उन्हे तव्वजो मिलती है। लेकिन इसी से बढ़ जाती है उनकी अपेक्षाएं। टीवी पत्रकारिता में बहुमुखी होने के अपने लाभ है। लेकिन इनके साथ आब्जेक्टिव होना चुनौती है।

एक पत्रकार की मौत और चैनल को लगे कोमा के बीच जो सबसे कमजोर कड़ी है वो है एक लड़की। स्टिंग में भी एक लड़की को गलत दिलासे के जरिए इस्तेमाल किया गया। और मौत के पीछे भी लड़की की लिखा वजह, उसको दी जा रही प्रताड़ना रही। ऐसे में सवाल है कि गलती किसकी ओर से हो रही है। कौन ज्यादा अपेक्षा कर रहा है। काम करवाने वाला या काम करने वाली।

टीवी को जो भी दिखना है, वो उसकी बुनियादी सोच से ही बनता है। अगर टीवी चैनल एक नारी को किसी भी तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही मीडिया में भी काम कर रही महिलाओं की स्थिति उम्दा नहीं होगी। फिल्मी पर्दे पर नंगई और कास्टिंग काउच के रिश्ते को समाज समझता है। टीवी में उसके स्वरूप को वो अब धीरे धीरे करके देख रहा है।

क्या समाज को ऐसी घटनाओं, बंदी और मौत, से कोई फर्क पड़ता है। क्या इससे इस पेशे की गरिमा पर कोई आंच आने वाली है। क्या मर रही टीवी पत्रकारिता को आने वाले समय में नई सांस और फांस के लिए तैयार रहना चाहिए। सवाल कई है लेकिन जवाब देने के लिए कोई आगे नहीं आता दिखता।

खुद की गरिमा से खेलकर टीवी पत्रकारिता ने एक तरह से खुद के खोखलेपन को दर्शाया है। आदर्शी बुनियादी उसूलों से परे होकर वो एक ऐसा कल्पना लोक गढ़ चुका है जहां सोच की सीमितता ही सत्य है।

हमें इसे लेकर गंभीर चिंतन करना चाहिए। क्योंकि खबरों से आप ही नहीं आपका परिवार भी प्रभावित होता है। और ये परिवार एक समाज का हिस्सा है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Sunday, September 23, 2007

What is the Broadcasting Bill?




Posted online: Saturday, September 22, 2007 at 0000 hrs IST

While the need for a Broadcasting Bill has been talked about since
1997, it was only in 2006 that the UPA Government with Priya Ranjan
Dasmunsi as the Union Information & Broadcasting Minister brought out
the draft for the Broadcasting Services Regulation Bill. The Bill,
said the I&B Ministry, will regulate the broadcast services with
several private TV channels around now. The draft bill, which calls
for the setting up of a separate Broadcast Regulatory Authority of
India (BRAI), has covered four major areas in its ambit, which would
call for major corporate restructuring by media companies—foreign and
domestic—operating in India. These include content, cross media
ownership, subscriptions and live sports feeds. Anubhuti Vishnoi
explains

• What regulations govern TV services as of now?
Cable Television Networks Regulation Act, 1995 is the basic governing
system for all TV channels related issues. However, the Ministry has
been of the view for years now that the increase in the number of TV
channels requires a special set of laws in keeping with the times and
with provision for a regulatory mechanism.

• What is Content Code?
Along with the draft broadcasting Bill, the Ministry has also
formulated a content code to regulate the programme "quality" being
aired by broadcasters and to "protect the consumers interests",
national interests and right to privacy.

• Why is the broadcasting industry against the Bill and the Content Code?
The big issue is the Government's "intention" to control or regulate
programme content. The industry feels that the Government plans to
infringe on their rights as a free media through the two proposed
regulations and says that "draconian" laws will be applied, especially
against news channels, under the ambit of the Bill if it is allowed to
go through. A stringent Content Code and clauses like "national
interest" and right to privacy of a citizen may spell the death knell
for investigative journalism and sting operations for broadcasters.
The other problem with the Bill is that in an age when citizens are
bombarded with news/views through various media (newspapers, cable and
satellite TV, Internet, radio and mobile phones), it seeks to enforce
outdated concepts of the media and dominance as per broadcasters. The
draft Bill, they point out, says that no broadcasting service provider
can own more than 20 per cent of another broadcasting network service
provider. BRAI is also liable to government control, say broadcasters.

• Status of the proposed Bill and Content Code
While the I&B Ministry planned to take the Bill to Parliament this
monsoon session, vehement opposition from the broadcasters has forced
a re-think. So while the Ministry still maintains that it will
definitely get in a regulation, it is consulting stakeholders. The
ministry Content Code may make way for a "self-regulating content
code" being chalked out by the National Broadcasters' Association
(NBA). The draft bill on which various states are also being consulted
still has the ministry and the broadcasters on opposite ends.

Courtesy:




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Saturday, September 22, 2007

चिट्ठों में मीडिया जगत

बीते हफ्तों में काफी कुछ ऐसा गुजरा है जो आने वाले वक्त में हर किस्म के मीडिया का चेहरा बदल सकता है। ये खुद की गलतियों से सीखने का समय है। अगर एक चैनल को एक महीने के लिए बंद करना सही है तो एक लड़की की मौत से भी कई सच्चाईयां सामने आई हैं। देखना है कि आने वाले समय में कितना सीखता है मीडिया। बहरहाल बीते हफ्तों में कई ब्लागरों ने मीडिया पर काफी कुछ लिखा। कुछ चिट्ठे।
मीडिया से जुड़े लोगों से विन्रम निवेदन

मिडडे पत्रकारों को 4 माह की सजा: देखिए उन्होंने लिखा क्या था?

जरा ध्यान दें

क्या मीडिया में महिला होना गुनाह है

बुद्धू-बक्से की पत्रकारिता और राष्ट्रीय शर्म

सितारों को मिला सही सबक

ब्‍लॉग का फैलता महाजाल

करात का रहस्य : इंडिया टुडे

नहीं

औकात में रहे मीडिया और उनके नुमाइन्‍दे

हल्की होती राजनीतिक रिपोर्टिंग...

हंसी क्यों इतनी मंहगी

हम बातें कम, प्रवचन ज्यादा करते हैं

रेडियो समाचार: अखबार व आम आदमी के प्राण

और खबर फैल गयी

मीडियायुग

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Sunday, September 16, 2007

A mail to DEVELOPMENT

To: chairman@nhai.org, ksramasubban@nhai.org, nirmaljitsingh@nhai.org, avsinha@nhai.org,kandaswamy@nhai.org,didar@nhai.org

CC: info@aajtak.com, info@sahara-one.com,feedback@ndtv.com,mediayug@gmail.com, feedback@in.startv.com,info@saharasamay.com


This is a mail regarding the apathy of Roads! India is a booming economy and tranportation plays a big role in higher results. We always discuss about bad condition of roads and other economic barriers. The mailer sent this mail to all he can judge, to address this problem. Though its seems a very remote problem to some of us, but it persist in all India. And by this mail intiative, we can create a uproar, about the apathy. Media has the responsibilities to play a important role in the development of Democracy. Economy, Society and Political Consciousness is vital to any country.

Mail was sent to all national channels, and some of the groups have regional channels. This is surely a news item for them, in terms of development of economy.But, till date we are never seen a National Highway Story. Hope we can judge the mail as a starter, and take responsibilty to aware the authorities about the big issues of country.


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REMINDER NO1.

Dear Sir,

I am resident of Thane city, Maharashtra state and I regularly commute through National highway no 8. The condition of this road is really pathetic. [From Dahisar to Virar] Accidents take place on a regular basis because of pot holes and horrible condition of the road. I sincerely request you to kindly look into the matter or direct this mail to the concerned. I really feel that if this point is addressed immediately can save many valuable lives.

Regards
Rajesh Kulkarni
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REMINDER NO 2.

Dear Sir, I presume my earlier complaints about bad roads [ national highway no 8] has not been dealt with. I understand that this problem of mine and everybody holds no real importance to you. What are you waiting for? a few more lives to be taken on account of this ruthless roads, a few more accidents to shake you in the real sense. I hope your wait does nor bear any fruits because I am more concerned about the innumerable commuters driving on this road and innumerable people going along the road than the irresponsible attitude of national highway authorities. I hope the photographs I am enclosing herewith will be an eyeopener for you.

regards
Rajesh Kulkarni.
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PHOTOS Media Yug Got from the mailer:



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