Friday, December 21, 2007

नम्बर वन चैनल्स और दर्शक

तो क्या हम आप दिनभर टीवी देख देख कर इन चैनलों को ये चिल्लाने का मौका दे रहे हैं कि हम है नम्बर वन चैनल, जिसे देख रहा है पूरा हिंदुस्तान। हमारी टीआरपी रेटिंग है इतनी और हमारा बाजार शेयर है इतना। क्या किसी भी तरह के चैनल के लिए इतना कह देना काफी हो जाता है कि वो इस हफ्ते रहा नम्बर वन। बिना इसकी परवाह किए कि जो दिखाया जा रहा है, वो कितना मुफीद है। बात को कंटेंट मोरेलाइजेशन से आगे लाते है। हमने टीवी को कई दौर में देख लिया। एक, जब को मध्यमवर्गीय बुनियादों और समाज की दरारों को टटोल रहा था, घर घर में होने वाली चुहलबाजियों को परोस रहा था। ये दौर धार्मिक सीरियलों के उत्थान और उससे जुड़ रह नए दर्शकों की भावनाओं का था। इसमें फिल्मी गाने और पिक्चरों को परोस कर समाज को एक धारा में लाने की कोशिश थी। पिक्चरें भी समाज का सच दिखाती थी।

वक्त थोड़ा और बदला। निजी टेलिविजन में पेश किया गया ऐसा कंटेंट जो, धारा में विचलन के साथ मध्यमवर्गीय कुंठा और स्वपन लोक की उसकी दुनिया के नजदीक था। टीवी पर नकारात्मकता के ये शुरूआती दिन थे। दूरदर्शन के साथ इक्का दुक्का मनोरंजन चैनलों पर आ रहा था परिवार। एक गढ़ा परिवार, जहां दर्द से लेकर जुड़ाव अभिनय की पेशकश थे। फिर भी इससे दर्शक को सुख मिलता रहा। फिल्मों और गानों को तमाशे के साथ पेश करना शुरू हो गया था। पहले तबस्सुम और गंभीर आवाजें समाज के इस सश्क्त दर्पण को दिखा रही थी। गानों के बीच कामेडी ने वो जगह बनाई जो, पहले अपनी अलग मुकाम रखती थी। हंसी और हंसाने का अंतर घट रहा था।

एक दौर ऐसा भी था, जब समाचार का समय हुआ करता था, अनुशासन और गंभीरता के साथ। फिर चौबीस घण्टा के समाचार की आदत लगाने के लिए खोजी और बनाई गई खबरें। एक खबर की उम्र भी तय होने लगी। फालो अप की परंपरा दम तोड़ती रही। चौबीस घण्टे के चैनल की भाषा और पेशकश में एक रवानी बनाए रखना जरूरी था। रखी गई रवानी। शुरू के दो हिंदी के समाचार चैनलों ने अपने दर्शक वर्ग को गढ़ा और पोषित भी किया। लेकिन शाम को गंभीर खबरों की जगह बनी रही।

मनोरंजन में कामेडी, बनते बिगड़ते रिश्तों और डर की जगह, अब एक माहौल लेता जा रहा था। शाम को हर मनोरंजन चैनल का चेहरा एक सा लगने लगा। पुता लिपा और बेहद रंगीन। इसमें षड़यंत्र, खेल और रिश्तों की घालमेल पेश की जाने लगी। एक घर में एक ही नारी, एक सावित्री, एक कैकेयी। बढ़िया रहा। महिलाओं को अपनी सास, ननदों को देखने का नजरिया बदलने लगा। घरों में बच्चों के लिए कम, सीरियल के लिए ज्यादा वक्त मिलने लगा। दौर अभी तक जारी है। शाम को एक घर में अगर दो टेलिविजन है तो, एक पर महिला जारी है।

बच्चों के लिए टीवी खराब है। ये बात मां बाप, सर्वे, बौद्धिक सभी मान रहे थे। शाम को कार्टून देखने की एक घण्टे की आजादी उन्हे काफी नहीं लगती थी। पार्क और मैदान तो शहर में सिमट गए है। सो खेले कहां। सब खेल बच्चों के दिमाग में ही सिमटने लगा। दो साल से लेकर बारह साल का बच्चा एक ही कार्टून किरदार को देखकर खुश होने लगा। दिमाग एक सा होने लगा। बौद्धिक विकास से लेकर बर्थडे पार्टी में बच्चे गांधी या नेहरू को न जानकर कार्टून किरदारों की बांचने लगे। मां बाप टीवी देखने में व्यस्त रहे। बच्चों के चौबीस घण्टे के कार्टून चैनल पनपने लगे। बच्चे घर में गायब हो गए। मां बाप के बीच रहकर एक एनिमेटेड दुनिया में।

आज। घरों में संबंध है। पैसे है। गाड़ी है। लेकिन खाली दिन को क्या किया जाए। पता नहीं। टीवी पर एक सा देखने के आदी लोग मजबूर है। देखते है। रात होती है। सोते है। सुबह एक अखबार की सुर्खियां देखने से थोड़ा सुकून लगता है। लेकिन टीवी देखना आदत है। देखते है। समाचार चैनलों पर सब कुछ है, लेकिन रस नहीं मिलता। वहां नाच गाना भी है, अमेजिंग विजुअल्स भी है। लेकिन ये देखना किसी को बांधता है, तो किसी को तोड़ता। चैनल हर हफ्ते दावा करते है, कि उन्हे ही देखा जा रहा है। वे खुश है। लेकिन देखने वाले से किसी ने नहीं पूछा है कि वो क्या देखना चाहता है।

दरअसल दर्शक भी सेवा की कीमत चुकाने के बाद ज्यादा नहीं सोचता। जो दिखता है, देखता है। उसे अब कर्तव्य और अधिकार की लड़ाई लड़ने का मन नहीं करता। दुनिया के उससे जुड़े तनाव, उसे भारी लगते है। जो दिख रहा है, वहीं सत्य लगता है।

टीवी के अंदर और बाहर एक सा नजर आता है। बनाने वाले एक सा बनाते जा रहा है। देखने वाला एक सा देख रहा है। ट्रेंड सेटर कहते है वे नया पेश कर रहे है। लेकिन हर नए को पुराना बनने में केवल कुछ महीने लगते है। फिल्मों में जो दिखाया जा रहा है, उसे पहले ही टीवी इतना दिखा देता है कि उसे देखना बासी रोटी खाना होता है, घी के साथ।

तो क्या ऐसा ही चलेगा। जाहिर है अगर आप अधिकार नहीं चाहते तो जी हां। और अगर घर में परिवार है, दिमाग में विचार है और है आपको एक बदलते समाज का इल्म तो दो लाइन किसी को लिखकर ये जताना कि आप गलत कर रहे है, काफी होता है। वैसे गलत और सही का फासला मिट रहा है। जो दिख रहा है वहीं सही मानकर बिक रहा है।

सूचक
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1 comment:

vimal verma said...

बिल्कुल आपने सही लिखा है,चैनल का लोगो हटा दें तो वाकी आपको समझ नही आयेगा कि आप कौन सा चैनल देख रहे है,अब इन चैनलों की टी आर पी भी औरतों की मक्कारी ,बदचलनी,अनैतिक सम्बन्ध,ज़्यादातर औरतों का चरित्र बुरा ज़्याद है, और मर्द तो बेचारा है अपनी कमज़ोर रीड़ को सीधी ही करने मे लगा रहता है,पर मज़ेदार बात ये हैजहां तक मनोरंजन चैनल कि बात करें तो स्टार प्लस और ज़ी के अलावा जनता किसी दूसरे चैनल को देखने में अभी भी हिचक रही है क्योकि इन दोनो चैनल के अलावा बाकी चैनल हाशिये पर ही है, और न्यूज़ चैनल भी इन्ही चैनलों कामाल दिखा कर अपनी टि आर पी बढ़ाने पर लगे है, अब रोज़ रोज़ स्टिंग ऑपरेशन तो हो नही पाता समाचार चैनल भी अभी वाकई ब्रेकिंग न्यूज़ की सही सही परिभाषा भी तो नही ही ढूंढ पये हैं, अच्छा लिखा है आपने अच्छी पोस्ट के लिये शुक्रिया