Monday, April 30, 2007

हिंदी ब्लोग की दुनिया

Why Hindi blog? Why the world of blogging is discussing HINDI? AND WHY WE NEED HINDI ON BLOGGING?

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The New Hindi Medium
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Friday, April 27, 2007

आपकी बीमारी, मेरी खबर है

देश की तबीतय कैसी है। इस सवाल के सीधे अर्थ राजनीतिक लिए जाते है। और अगर इसे हर भारतीय की तबीयत से जोड़ा जाए तो मायने अनोखे ही होते है। लेकिन व्यक्तिगत बोलचाल में तबीयत तो ठीक है न, का पूछा जाना जो बताता है, वो ही हमारा मतलब है। देश में हर मर्ज का इलाज है, लेकिन बीमार बढ़ते जा रहे है। किसी के पचास लाख है तो किसी के आठ लाख। एचआईवी से लेकर कैंसर ने मानो अब भारत का रूख किया है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल जिस गति से टीवी, रेडियो जैसे सरल जनसंचार माध्यमों ने प्रसार पाया है। उसी गति से इनसे सूचना को फैलाना भी सरल हो चला है। लेकिन यहीं सवाल खड़ा हो रहा है। इस सूचना जागरूकता के अभियान से किसका हित है। बीमार का या सरकार का। एनजीओ का या विदेशी दवाई कंपनियो का। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब टेढ़ा। पिछले चार पांच सालों में यकायक आपको लगा कि एचआईवी और एड्स आपके नजदीक खड़ी है। और अनजाने या गलती में एक कदम के बाद आप भी किसी प्रचार का हिस्सा बन जाएंगे। यकायक लगी कि कैंसर की भारतीय प्रजातियां बढ़ गई है। यकायक बर्ड फ्लू ने लाखों मुर्गियों को आहार बना लिया। और एक ओर मलेरिया, हेपेटाइटिस और डायरिया शांत शिकार बनाते रहे। ये मौजूद थे, और आंकड़ो में ज्यादा जिंदगिया लील रहे थे, लेकिन जागरूकता अभियानों में केवल वे बीमारियां शामिल है, जो विदेशी ज्यादा है।

टीवी को क्या दिखाना है सवाल इसका है। अभी जो स्थिति है उसमें उसके पास किसी भी बीमारी या नशे को प्रति जागरूकता फैलाने वाले विग्यापन तो खूब है, लेकिन खुद की पैदा की गई स्टोरीज का अभाव है। जिसकी वजह से एक गैप आ गया है। दर्शक को समझा पाना कि आप भी कई तरह की बीमारियों के पास खड़े है, केवल विग्यापनों से मुश्किल है। लेकिन टीवी समाचार के दायरे में हेल्थ स्टोरीज का संसार छोटा है, कहें कि अल्प है।

किसी बीमारी को आप तक पहुंचने और उसे शांति से आपकी जान लेने के बाद भी टीवी या सरकार नहीं चौंकती। जब पीड़ितों की संख्या इतनी हो जाए कि खबर बन सके तो आप पाते है कि हर दिन आंकड़ो में आप गिने जा रहे है। तीन दर्जन मरीज आज भर्ती हुए। ये तर्ज भेड़, बकरियों और मुर्गियों को गिनने जैसा है। अट्ठावन जानों का जाना और छह दर्जन बीमार में फर्क है। और टीवी इसे समझने से दूर होता जा रहा है।

बहरहाल बीमारी कोई भी हो, इलाज कैसा भी हो, जब तक हम और आप जानकारी नहीं रखेंगे, तब तक इलाज और मरीज का फासला बड़ा ही रहेगा। सूचना देने वाले की बांट जोहने से अच्छा है कि आप खुद एक कदम बढ़ाएं और सूचना तक पहुंच जाएं। अस्पताल जाना केवल बीमार के लिए नहीं, जानकारी के लिए भी शुरू कर दें। क्योंकि आपकी बीमारी किसी की खबर बनें, इससे ज्यादा पीड़ादायक कुछ नहीं होता।

सूचक
soochak@gmail.com

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Monday, April 23, 2007

ताकि हम सही रह सकें...

मीडियायुग को किसी भी तरह के व्यक्तिगत आक्छेपों से कोई सरोकार नहीं है। मीडियायुग केवल टीवी और जनसंचार माध्यमों में आई गिरावट के लिए चिंतित रहता है। और अपने लेखों में केवल उसे लेकर विषय वाचना करना चाहता है। पर चूंकि मीडिया व्यक्तियों से बना संसार है, इसलिए व्यक्तियों का सोच और निश्चयों से मीडिया के प्रवाह पर असर पड़ता है। सो कभी कभी हमें किसी विशेष के लिए कहे गए विचारों को रखना पड़ता है। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं कि हम किसी संस्था या व्यक्ति के खिलाफ खड़े है। संचार माध्यमों में आई गिरावट की चिंता हमें वो बल देती है कि हम आगे बढ़े। सो अगर किसी लेख से किसी को चोट पहुंचती है तो आप इसे उदात्तता के मानक पर रखकर फैसला करें। फिर भी अगर हम बहके से लगते है तो हमें तुरंत सूचित करें। आपकी चिंता हमें सही रख सकती है।

मीडियायुग
mediayug@gmail.com

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Sunday, April 22, 2007

Lifeless farmers of Vidarbha...covered by a videshi channel

What a reality! We are living in a dogmatic society. Yes, every day there are suicides and we become dumb! I appluad the indian news channels, whosoever done indepth stories on farmer's suicides. But how much they are constant. Why the lives of farmers are dying? Why the government and our prime minister is mum. We need answers and must stop this. A boy or girl suicide in a metro is more covered comapre to a farmers life!

Come face the reality, And this is felt by a foreigh channel......

Now Sveriges Television svt Sweden reported last night indepth report on vidarbha cotton farmers suicide.

you can watch it by
accessing this link:

http://svt.se/svt/play/video.jsp?a=329798

Otherwise- got to : www.svt.se - find AKTUELLT 21- programme of Friday
April 19:th ( FREDAG) and watch the news, the story appear about half way
in.

Regards,

Vidarbha Jan Andolan Samiti

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Friday, April 20, 2007

अमिताभ ने तोड़ा मीडिया से संबंध


किसी की जिंदगी में शादी का महत्व जिंदगी भर के लिए होता है। टीवी के लिए ये बिन बुलाए मेहमान जैसा हो चला है। बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना। पर देश के महानायक के सपूत की शादी हो तो बात कुछ बदल जाती है। अमर सिंह कल रात एक अंग्रेजी चैनल को बता रहे थे कि ये नितांत निजी आयोजन है। है भी। दरवाजे बंद है। और कैमरे रोल पर। कभी भी कोई गाड़ी निकले, हू हा चालू। बड़ा गजब है किसी की शादी में बिन कार्ड के मेहमान होना। लेकिन सवाल ये होता है कि क्यों मीडिया मेहमान नहीं है। क्या ये घर बुलाकर अपमान करने जैसा है। क्या महानायक को डर है कि मीडिया के दखल से उनका कुछ चला जाएगा। जिस शादी में घर के नौकर तक कार्ड पाएं हो, वहां मीडिया को दरकिनार करना क्या बताता है। जरूरत। स्वार्थ। और समझदारी। जिस महानायक को टीवी ने जिंदा रहने को सांसे दी। वो आज मीडिया को दूर रखना चाहता है। आप सवाल उठा सकते है कि शादी में किसे बुलाना है किसे नहीं ये उनका फैसला है, लेकिन जिस देश ने उन्हे महानायक बनाया है, जिसने उनके लिए दुआएं की है, अगर वो उनके सुपुत्र की शादी के कुछ नजारे देखना चाहता है तो रोक क्यूं। ये भी समझता हूं कि मीडिया के तमाशे से उनका निजीपन खत्म हो चला था। कब, किससे, कहां के सवाल सैकड़ों बार उठा कर मीडिया ने शादी को ओपेन भेड़चाल में बदल डाला था। लेकिन ये मौका क्या मीडिया ने खुद दखल देकर लिया था या बार बार बच्चन परिवार की चाहत रही कि वे जो भी करें उसे देश जाने। बार बार मीडिया को कैसे पता रहता था कि वे और उनका परिवार कहां जा रहा है, क्या कर रहा है। कब कर रहा है। क्या मीडिया में उनके खास नहीं जानते कि वे क्या सोचते है। शादी की तैयारियों को लेकर जो झामताम फैलाया गया, उसमें मीडिया की बेवकूफियां गैर जरूरी थी, पर उनके परिवार ने जिस तरह से चीजों को करवटों में मीडिया के सामन रखा, वो काबिलेगौर है। जैसे गुरू में साथ काम करने के फैसले से लेकर टोरंटो में प्रिमीयर से लेकर और जोड़े के दक्छिण के मंदिरों के फेरों से लेकर बनारस, विंध्याचल और घोषणा तक। हर पल मीडिया को साथ रखा गया। मीडिया घुसा भी रहा। गैरजरूरी हस्तक्छेप। लेकिन जब इस आयोजन के अंत का दिन आया तो मीडिया लकड़ी के दरवाजे के पार खड़ा था। जलसा में शोर था, लेकिन बाहर शांति। मानो अमिताभ ने एक संबंध तोड़ दिया। एक करार से मुकर गए। और इससे दिल टूटा, हर भावुक फैन का। अमिताभ ने सिक्योरिटी पर लाखों खर्चे। मीडिया ने इंतजामों पर लाखों। मीडिया की आतुरता केवल एक चर्चित शादी को देश के सामने रखने की थी। पर अफसोस अमिताभ ऐसा नहीं चाहते थे। बीते सालों में मीडिया ने मुख्य धारा को छोड़कर जिस टैबलाएडेशन की ओर कदम बढ़ाए, उसका नतीजा है कि आज दर्शक देखना चाहता है तमाशा और निजीपन। सो उसे खलता है। ये अतिश्योक्ति नहीं है। गोरखपुर के एक रेलवे कर्मचारी की बीवी ने कभी अमिताभ को नहीं देखा, लेकिन वे कहती है कि सोचा था कि टीवी पर उनके बच्चे और घर को देख सकूंगी। पर टीवी वाले भी बाहर खड़े है। ये वकालत नहीं है। ये चाहत नहीं है। ये गुहार नही हैं। पर ये वो सचाई है जिसे टीवी वाले ने इस बार समझा है। और उम्मीद है कि वो आगे किसी को भगवान बनाकर प्रसाद भी न पाने वाला बनना चाहेगा।

सूचक
soochak@gmail.com

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Wednesday, April 18, 2007

टीवी की कमजोरी पर हमला

बड़ी चिक चिक मची हुई है। लोकतंत्र पर हमला करार दिया गया एक समाचार चैनल पर हालिया हमला। कुछ ने कहा ये फलां है, कुछ ने कहा कि चैनल की किस्मत थी। खैर तोड़ फोड़ हुई और इसे आप विरोध के तौर पर कतई उचित नहीं कह सकते। पर बड़े सवालों पर किसी का कोई ध्यान नहीं गया। क्या टीवी देखने वाला टीवी की ही तरह सीमित सोचने लगा है। शायद हां। कहा गया है कि डिफाइन इज़ द लिमिट। और टीवी ने खबरों को मनोरंजन के तौर पर डिफाइन करके आपको भी नकली हंसी औऱ नकली आंसू बहाने की स्थिति में ला दिया है। किसी भी जनसंचार माध्यम पर हमला या उससे जोर जबरदस्ती पहली नजर में दबिश ही मानी जाती है। खबर को दबाने या चलाने के बाद गुस्से की प्रतिक्रिया। प्रेस को स्वतंत्रता चाहिए, औऱ उस पर वार लोकतंत्र पर वार सरीखा होता है। यानि कि गलत कदम। लेकिन अगर ये प्रतिक्रिया किसी ऐसी घटना के बदले की जाए जिसका देश के आम आदमी के मौलिक अधिकार से ताल्लुकात हो तो। तो बात को विचारधारा की कट्टरता या एक झुंड की मूर्खता माना जा सकता है। और मानने की जरूरत ये है कि इस घटना से मीडिया की ताकत नहीं कमजोरी जाहिर की है। कमजोरी। एक ऐसी कमजोरी जिससे मीडिया का नाता खत्म होता जा रहा है। सामाजिक सुरक्छा की कमजोरी। बताइए। आप किसी जनसंचार माध्यम में कार्य करते है। और हमले में आप घायल होते है नुकसान झेलते है और एक खबर बन जाते है। तो क्या इससे आपकी भावना और मजबूत होती है। आगे ऐसा करते रहने के प्रति। खबर को उसी दृढ़ता से दिखाने के प्रति। या इसे आप केवल इस तौर पर देखने लगेंगे कि जब संस्थान ही सुरक्छित नहीं तो हम क्या होंगे। और इससे भी बड़ा सवाल, जो जोड़ा भागकर समाचार माध्यम के पास आया। इस आशा में कि उसे अधिकार मिलेगा, आजादी मिलेगी और एक मिसाल कायम होगी। उसका क्या। देश में कुंवारी उम्र में प्यार की पींगे बढ़ाने वाले लाखों जोड़ों को क्या अब रास्ता दिखा है। या डर बैठ गया है कि जब किसी पत्रकारिता संस्थान पर हमला हो सकता है, तो हमारा क्या होगा। हम कहां जाएंगे। पूरे देश में प्रचार पाने के बाद। कमजोरी। ये है टीवी की। उसने समाज को मजबूत नहीं किया। बदला नहीं। प्रवृत्तियां नहीं बदली। मानसिकता नहीं बदली। औऱ इसके बीच मीडिया हक को दिलाने की पैरवी करने लगा। पैरवी और जिरह। जिरह उस समाज से जो कई खांचों में बंटा। जाति, पाति, धर्म, कुनबा औऱ सोच में। तो कैसे माना जाए कि पत्रकारिता की जिस ताकत से आप समाज बदल सकते थे। उसी का बेफिजूल उपयोग आपने मजबूती पा ली है। कमजोर हो गया है हर वो आदर्श जिसके बदौलत आप मिसाल बनाते थे। रसूखों के गुमान तोड़ते थे। औऱ सामाजिक विकृतियों को बदलते थे। तो यानि हमला इसी कमजोरी पर हुआ है। और इस कमजोरी को टीवी ने खुद पैदा किया है। और कमजोरी को ताकत में बदलने के लिए जिस बदलाव का हिमायती होना चाहिए, उससे बहुत दूर हो चला है टीवी। तो प्रेम को अधिकार दिलाने की इस लड़ाई में न तो जोड़ा जीता, न ही टीवी।

सूचक
soochak@gmail.com
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Sunday, April 15, 2007

ब्लाग की जनसत्ता

ब्लाग की दुनिया। एक ऐसा संसार जो बढ़ रहा है। काफी हरा भरा है। तरह तरह के चिट्ठों पर तरह तरह की बातें दिखती है। ऐसे में जनसत्ता में छपा ये लेख हकीकतों से रूबरू कराता है। पढ़िए...

अतंर्जाल पर देसी चिट्ठे

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Friday, April 13, 2007

पत्रकारों, आओ अब गांवों की ओर लौटें

गाँवों के देश भारत में, जहाँ लगभग 80% आबादी ग्रामीण इलाक़ों में रहती है, बहुसंख्यक आम जनता को खुशहाल और शक्तिसंपन्न बनाने में पत्रकारिता की निर्णायक भूमिका हो सकती है। लेकिन विडंबना की बात यह है कि अभी तक पत्रकारिता का मुख्य फोकस सत्ता की उठापठक वाली राजनीति और कारोबार जगत की ऐसी हलचलों की ओर रहा है, जिसका आम जनता के जीवन-स्तर में बेहतरी लाने से कोई वास्तविक सरोकार नहीं होता। पत्रकारिता अभी तक मुख्य रूप से महानगरों और सत्ता के गलियारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की ख़बरें समाचार माध्यमों में तभी स्थान पाती हैं जब किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा या व्यापक हिंसा के कारण बहुत से लोगों की जानें चली जाती हैं। ऐसे में कुछ दिनों के लिए राष्ट्रीय कहे जाने वाले समाचार पत्रों और मीडिया जगत की मानो नींद खुलती है और उन्हें ग्रामीण जनता की सुध आती जान पड़ती है। खासकर बड़े राजनेताओं के दौरों की कवरेज के दौरान ही ग्रामीण क्षेत्रों की ख़बरों को प्रमुखता से स्थान मिल पाता है। फिर मामला पहले की तरह ठंडा पड़ जाता है और किसी को यह सुनिश्चित करने की जरूरत नहीं होती कि ग्रामीण जनता की समस्याओं को स्थायी रूप से दूर करने और उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए किए गए वायदों को कब, कैसे और कौन पूरा करेगा।

सूचना में शक्ति होती है। लंबे संघर्ष के बाद दो वर्ष पहले लागू हुए सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के जरिए नागरिकों को सूचना का अधिकार हासिल हुआ है। लेकिन बहुसंख्यक जनता इस अधिकार का व्यापक और वास्तविक लाभ अब भी नहीं उठा पा रही है, क्योंकि आम जनता अपने दैनिक जीवन के संघर्षों और रोजी-रोटी का जुगाड़ करने में ही इस क़दर उलझी रहती है कि उसे संविधान और कानून द्वारा प्रदत्त अधिकारों का लाभ उठा सकने के उपायों को अमल में लाने की चेष्टा करने का अवसर ही नहीं मिल पाता। उन्हें अब भी सूचना के लिए प्रेस और मीडिया का ही मुख्य सहारा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा, गरीबी और परिवहन व्यवस्था की बदहाली की वजह से समाचार पत्र-पत्रिकाओं का लाभ सुदूर गाँव-देहात की जनता नहीं उठा पाती। बिजली और केबल कनेक्शन के अभाव में टेलीविज़न भी ग्रामीण क्षेत्रों तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे में रेडियो ही एक ऐसा सशक्त माध्यम बचता है जो सुगमता से सुदूर गाँवों-देहातों में रहने वाले जन-जन तक बिना किसी बाधा के पहुँचता है। रेडियो आम जनता का माध्यम है और इसकी पहुँच हर जगह है, इसलिए ग्रामीण पत्रकारिता के ध्वजवाहक की भूमिका रेडियो को ही निभानी पड़ेगी। रेडियो के माध्यम से ग्रामीण पत्रकारिता को नई बुलंदियों तक पहुँचाया जा सकता है और पत्रकारिता के क्षेत्र में नए-नए आयाम खोले जा सकते हैं। इसके लिए रेडियो को अपना मिशन महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज्य के स्वप्न को साकार करने को बनाना पड़ेगा और उसको ध्यान में रखते हुए अपने कार्यक्रमों के स्वरूप और सामग्री में अनुकूल परिवर्तन करने होंगे। निश्चित रूप से इस अभियान में रेडियो की भूमिका केवल एक उत्प्रेरक की ही होगी। रेडियो एवं अन्य जनसंचार माध्यम सूचना, ज्ञान और मनोरंजन के माध्यम से जनचेतना को जगाने और सक्रिय करने का ही काम कर सकते हैं। लेकिन वास्तविक सक्रियता तो ग्राम पंचायतों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले पढ़े-लिखे नौजवानों और विद्यार्थियों को दिखानी होगी। इसके लिए रेडियो को अपने कार्यक्रमों में दोतरफा संवाद को अधिक से अधिक बढ़ाना होगा ताकि ग्रामीण इलाक़ों की जनता पत्रों और टेलीफोन के माध्यम से अपनी बात, अपनी समस्या, अपने सुझाव और अपनी शिकायतें विशेषज्ञों तथा सरकार एवं जन-प्रतिनिधियों तक पहुँचा सके। खासकर खेती-बाड़ी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से जुड़े बहुत-से सवाल, बहुत सारी परेशानियाँ ग्रामीण लोगों के पास होती हैं, जिनका संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ रेडियो के माध्यम से आसानी से समाधान कर सकते हैं। रेडियो को “इंटरेक्टिव” बनाकर ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में वे मुकाम हासिल किए जा सकते हैं जिसे दिल्ली और मुम्बई से संचालित होने वाले टी.वी. चैनल और राजधानियों तथा महानगरों से निकलने वाले मुख्यधारा के अख़बार और नामी समाचार पत्रिकाएँ अभी तक हासिल नहीं कर पायी हैं।

टी.वी. चैनलों और बड़े अख़बारों की सीमा यह है कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संवाददाताओं और छायाकारों को स्थायी रूप से तैनात नहीं कर पाते। कैरियर की दृष्टि से कोई सुप्रशिक्षित पत्रकार ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए ग्रामीण इलाक़ों में लंबे समय तक कार्य करने के लिए तैयार नहीं होता। कुल मिलाकर, ग्रामीण पत्रकारिता की जो भी झलक विभिन्न समाचार माध्यमों में आज मिल पाती है, उसका श्रेय अधिकांशत: जिला मुख्यालयों में रहकर अंशकालिक रूप से काम करने वाले अप्रशिक्षित पत्रकारों को जाता है, जिन्हें स्ट्रिंगर कहा जाता है, जिन्हें अपनी मेहनत के बदले में समुचित पारिश्रमिक तक नहीं मिल पाता। इसलिए कई बार वे ऐसे अनैतिक उपायों द्वारा भी पैसा कमाने की कोशिश करते हैं जो पत्रकारों के लिए कतई शोभनीय नहीं। इसलिए आवश्यक यह है कि नई ऊर्जा से लैस प्रतिभावान युवा पत्रकार अच्छे संस्थानों से प्रशिक्षण हासिल करने के बाद ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र बनाने के लिए उत्साह से आगे आएँ। इस क्षेत्र में काम करने और कैरियर बनाने की दृष्टि से भी अपार संभावनाएँ हैं। यह उनका नैतिक दायित्व भी बनता है।

आखिर देश की 80 प्रतिशत जनता, जिनके बलबूते पर हमारे यहाँ सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान करते हैं, उन्हें पत्रकारिता के मुख्य फोकस में लाया ही जाना चाहिए। मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े खिलाड़ियों के पीछे भागने की बजाय उस आम जनता की तरफ रुख़ करना चाहिए, जो गाँवों में रहती है, जिनके दम पर यह देश और उसकी सारी व्यवस्था चलती है।

पत्रकारिता जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गाँव और शहर के बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है। यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है। सरकार जनता के हितों के लिए तमाम कार्यक्रम बनाती है; नीतियाँ तैयार करती है; कानून बनाती है; योजनाएँ शुरू करती है; सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन आदि जैसी मूलभूत अवसंरचनाओं के विकास के लिए फंड उपलब्ध कराती है, लेकिन उनका लाभ कैसे उठाना है, उसकी जानकारी ग्रामीण जनता को नहीं होती। इसलिए प्रशासन को लापरवाही और भ्रष्टाचार में लिप्त होने का मौका मिल जाता है। जन-प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद जनता के प्रति बेखबर हो जाते हैं और अपने किए हुए वायदे जान-बूझकर भूल जाते हैं।

ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नई-नई ख़ोजें होती रहती हैं; शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में नए-नए द्वार खुलते रहते हैं; स्वास्थ्य, कृषि और ग्रामीण उद्योग के क्षेत्र की समस्याओं का समाधान निकलता है, जीवन में प्रगति करने की नई संभावनाओं का पता चलता है। इन नई जानकारियों को ग्रामीण जनता तक पहुँचाने के लिए तथा सरकार पर जनता के लिए लगातार काम करने हेतु दबाव बढ़ाने, प्रशासन के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार को उजागर करने, जनता की सामूहिक चेतना को जगाने, उन्हें उनके अधिकारों और कर्त्तव्यों का बोध कराने के लिए पत्रकारिता को ही मुस्तैदी और निर्भीकता से आगे आना होगा। किसी प्राकृतिक आपदा की आशंका के प्रति समय रहते जनता को सावधान करने, उन्हें बचाव के उपायों की जानकारी देने और आपदा एवं महामारी से निपटने के लिए आवश्यक सूचना और जानकारी पहुँचाने में जनसंचार माध्यमों, खासकर रेडियो की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

पत्रकारिता आम तौर पर नकारात्मक विधा मानी जाती है, जिसकी नज़र हमेशा नकारात्मक पहलुओं पर रहती है, लेकिन ग्रामीण पत्रकारिता सकारात्मक और स्वस्थ पत्रकारिता का क्षेत्र है। भूमण्डलीकरण और सूचना-क्रांति ने जहाँ पूरे विश्व को एक गाँव के रूप में तबदील कर दिया है, वहीं ग्रामीण पत्रकारिता गाँवों को वैश्विक परिदृश्य पर स्थापित कर सकती है। गाँवों में हमारी प्राचीन संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान की विरासत, कला और शिल्प की निपुण कारीगरी आज भी जीवित है, उसे ग्रामीण पत्रकारिता राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर ला सकती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ यदि मीडिया के माध्यम से धीरे-धीरे ग्रामीण उपभोक्ताओं में अपनी पैठ जमाने का प्रयास कर रही हैं तो ग्रामीण पत्रकारिता के माध्यम से गाँवों की हस्तकला के लिए बाजार और रोजगार भी जुटाया जा सकता है। ग्रामीण किसानों, घरेलू महिलाओं और छात्रों के लिए बहुत-से उपयोगी कार्यक्रम भी शुरू किए जा सकते हैं जो उनकी शिक्षा और रोजगार को आगे बढ़ाने का माध्यम बन सकते हैं।

इसके लिए ग्रामीण पत्रकारिता को अपनी सृजनकारी भूमिका को पहचानने की जरूरत है। अपनी अनन्त संभावनाओं का विकास करने एवं नए-नए आयामों को खोलने के लिए ग्रामीण पत्रकारिता को इस समय प्रयोगों और चुनौतियों के दौर से गुजरना होगा।



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Wednesday, April 11, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा(टेलीविजन)

रूकावट के लिए खेद है। रूकना तो दूर अब टीवी ने इतनी तेज गति पकड़ ली है कि सफर कठिन होता जा रहा है। स्वागत है आपका एक ऐसे समाज में जहां ये कहना कि टीवी आईना है, धुंधलका फैलाना जैसा होगा। टीवी ने देश में पचास साल से ज्यादा समय बिता लिया है। और निजी चैनलों ने तकरीबन बीस साल। बीस साल बाद क्या होगा। कल्पना करिए। आपकी टीवी आपके हाथ में होगी। आप केवल वो देखना पसंद करेंगे, जो समयखपाऊ न हो और कंटेंट पर आपकी मर्जी चलेगी। कंटेंट। देश में जब टीवी ने शुरूआत की, तब माहौल देश में जागरूकता लाने का था। उसने ये भूमिका निभाई भी। निजी चैनलों ने अपनी शुरूआत ही मनोरंजन से की। हालांकि सोप ओपेरा का पूरा तमाशा फैलाने में सरकारी चैनल ने ही प्रथम की भूमिका निभाई। शांति और स्वाभिमान के जरिए। लेकिन ये खाली वक्त में घरेलू महिलाओं को किसी तरह के मोहपाश में बांधने की कोशिश नहीं बन पाया। पर निजी चैनलों ने वो कर दिखाया जो आज नशा है, जरूरत है और है भरपूर तमाशा।

समाचार क्या है, खबर क्या है। ये कोई भी हाईस्कूल का लड़का नहीं जानना चाहता है। पर आज वो समाचार चैनल देखना चाहता है। क्यों। मल्लिका है, शाहरूख है, फिल्म है, गाना बजाना है, रेप है, गैंगवार है और है भरपूर क्राइम। जो दिखता है, वो बिकता है। यानि असली भारत दिखना बंद हो गया है। सो बिकना भी। टीवी ने इस जुमले को जिस करीनेपन से भुनाया है, उतना फिल्म वाले भी न भजा पाए। आज का टीवी विविध है, मनोरंजक है, उथला है, पर मौजूद है। वो आम आदमी को खबर बनाने की ताकत रखता है, पर समुदाय के सामने झुक जता है। वो कड़ी जबान में सत्ता का सामना करता है, पर सत्तासीन व्यक्ति को लुभाता रहता है। वो बाजार के उत्पाद पर खबर करता है, नकारात्मक भी, पर प्रचार पाने को कम खबरें दिखाता है। वो आम आदमी को अपनी एक्सक्लूजिविटी का अहसास कराता है। और उसके दरवाजे पर घुसने की हिम्मत नहीं पैदा होने देता है। एक खबर की मौत क्या होता है, ये आप किसी भी पेश होने वाली खबर के तौर तरीके से समझ सकते है। टीवी की मौत क्या होती है, इसे जानने के लिए आप दिन भर टीवी देखकर समझ सकते है।

आज देश में तीन सौ के करीब चैनल है। हिंदी के पचास के करीब। औऱ रीजनल भाषाओं के सौ के करीब। यानि पलड़ा भारी है भाषाओं का। और पलड़ा भारी है उन खबरों का, जो मौका और दस्तूर तो निभाते है, पर सूचना नहीं, ग्यान नहीं। तो बदलते वक्त की नब्ज भांप कर भी टीवी ने भले ही चोला बदला हो, लेकिन ये रंगबिरंगा ताना बाना क्या बना रहा है, ये समझना भी मुश्किल नहीं है। नई पीढ़ी को देखिए। वो टीवी कब देखता है। रात को। आधी रात को। तेज स्वर में। हर सेंकेंड में उसके लिए छह बार फ्रेम बदल जाते है। वो चार सेंकेड़ों की जिंदगी जीता है। वो चैनलों को गियर जैसा बदलता है। वो कैमरे के फ्लैश सा चमकता है। वो टीवी इतना ही देखता है।

टीवी ने जो बदलाव लाए है, वो इतिहास का हिस्सा नहीं हो सकते है। टीवी ने जो दिया है, वो याद करने लायक नहीं है। टीवी ने जो रचा है, वो कपोलकल्पित संसार सच से बहुत दूर है। करीब है तो आपके दर्द में उनके बेतुके, असंवेदनशील सवाल। मौके पर खड़े होकर अ अ करके देते जवाब। और आपको बता दे कि....का राग। आप जान चुके है। और जागरूक हुए आपको तकरीबन बीस साल हो चुके है। तो अगले बीस साल बाद आप क्या देखना चाहते है, ये तय कर लीजिए। क्योंकि टीवी एक मशीन है, और सोचना आपका काम है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Tuesday, April 10, 2007

तेरह मिनट में सिमटे विकासशील देश


तो क्यो देंखे टीवी। ये सवाल बार बार दस्तक देता है। हाल ही में टीवी देखा। दिखा। मनोरंजन के बाहुपाश में सिसकता समाचार। और तो और हर पल इधर उधर से अपनी मौजदूगी दिखाने वाला बाजार। खैर। हमने जब ये जानना चाहा कि तीन दिनों तक आठ देशों के बीच चलने वाले सार्क सम्मेलन का क्या हुआ। तो नतीजा कुछ मिनटों में निकला। तेरह मिनट। सारे निजी समाचार प्रदाताओं ने मिलकर इस भूराजनौतिक सम्मेलन को मात्र तेरह मिनट में सिमटा दिया। तेरह मिनट में सारी विकासशील दुनिया। अच्छा है। कौन जानना चाहता है। अब आईएएस की तैयारी करने वाला तो टीवी देखता नहीं है। और तमन्नाई लोगों को क्या मतलब है आप पड़ोस के मुल्कों से। वे तो अमेरिका और पश्चिमी देशों की सुध बुध जानना चाहाते है। क्या यही सच है। जो हमें टीवी पर दिख रहा है। जिस सरकारी चैनल को भारत में कई करोड़ लोग बिना असुविधा के देखते है, उसने तकरीबन तीन घण्टे दिखाया कि क्या हो सकता है इस बैठक और मिलने जुलने का नतीजा। वैसे अखबार की मौजूदगी औऱ साप्ताहिक पत्रिकाओं के लेखों से आप जान सकते है कि क्या हुआ। पर क्या इस वजह से टीवी की जिम्मेदारी घट जाती है। क्या इस वजह से आप प्राइम टाइम में मजाक बनने को तैयार रहते है। हंसने हंसाने को हर चैनल ने हंसोड़ियों को गांठ लिया है। उन्हे केवल देश के गिरती चीजों की खस्ताहाली की चिंता है। क्रिकेट और फिल्म की। वैसे शायद यही बिकता है। मुद्दे पर लौटते है। तो तीन दिन चले इस चौदहवें शिखर सम्मेलन में नया सदस्य देश अफ्गानिस्तान भी था। और साथ में पश्चिमी पर्यवेक्छक। पाकिस्तान ने कश्मीर का राग अलापा। नौ देशों के सौ से ज्यादा लेखकों ने अपनी अपनी बांची। साउथ एशिया फूड बैंक और यूनिवर्सिटी बनाने औऱ आतंकवाद पर साझा सोच बांटी गई। इसके अलावा भारत ने पड़ोसी देशों के लिए एकतरफा रियायतों की भी पहल की। कुल मिलाकर बिना किसी विवादित विषयों के ये सम्मेलन बीत गया। पर इसमें जो भी हुआ उसे टीवी पर जानना संभव नही रहा। दुख की बात है। और सोचने की भी।

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http://outlookindia.com/full.asp?fodname=20070416&fname=Saarc+%28F%29&sid=1
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070403_saarc_delhi.shtml

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Thursday, April 05, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा (रेडियो)

तो बात पढ़ने पढ़ाने पर खत्म हुई थी। इसे अब आवाज़ से शुरू करते है। रेडियो की आवाज़। आकाशवाणी। याद होगा आपको। सिलोन रेडियो से गूंजती गंभीर दिल को छू लेने वाली आवाजें। जमाना बदल गया है। ग्रीन पार्क के ढींगरा साहब की मर्सिडीज में रेडियो आज भी बजता है। उनका ड्राइवर उनकी नामौजूदगी में एफएम सुनता रहता है। रेडियो बजता रहता है। आज महानगरों में रेडियो का संजाल है। रेडियो सिटी, रेड एफएम, रेडियो मिर्ची, बिग एफएम, रेडियो वन, फीवर १०४ और साथ में खड़ा है आकाशवाणी का एफएम। निजी रेडियो कंपनियों ने हर शहर को गानों की गूंज से गुजांयमान कर दिया है। ये अलग बात है कि एक पर सुना गाना ज्यादातर दूसरे पर कुछ घण्टों में बजता है। रेडियो ने पहचान ढूंढ ली है। उसका पुनर्जागरण हो चुका है। ये अलग बात है कि पहचान में समरूपता हावी है। दरअसल जिस रेडियो को पहले आप दिन भर अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानते थे, वो अब मनोरंजन भर बन गया है। घर में काम के साथ धुन बज रही है तो गाड़ी में चलने के साथ। खैर ये वो समय है जब हर यंत्र संगीत देने में जुटा है। मोबाइल से लेकर एमपी थ्री प्लेयर तक। वैसे आकाशवाणी से गानावाणी तक पहुंचने के बीच रेडियो ने एक दौर ऐसा भी देखा है जब ये गांव देहात तक सीमित हो चुका था। या क्रिकेट की कमेंट्री सुनने का सस्ता और फीजिबिल माध्यम। रेडियो को अपनाना बीच के दौर में गरीबी और निम्न वर्ग का प्रतीक सा था। जैसे बंबई से कमाकर हाथ में रेडियो लेकर लौटता एक गांव का छोरा। रेडियो ने भारत के प्रसव काल को देखा, जन्म काल को सुनाया और विकासकाल में गुम सा गया। अब दोबारा ये पुनर्जन्म ले चुका है। एक नए कलेवर में। बाजार में इसका सुनना सुनाना अब शौक है। और इसे अपनाना फैशन। मोबाइल वाला रेडियो बिकता है। और कार में विदेशी प्लेयरों में देशी आवाज राग अलापती है। ये अलग बात है कि इस नए जन्म ने रेडियो के इतिहास में खास योगदान नहीं दिया है। क्योंकि बाजार में पैठ बनाने और एकरसता के शिकार रेडियो चैनल क्या परोस रहे है, ये समझ के परे है। रात को नौ बजे लड़के लड़को की सेटिंग या दिल की बात बताते लवुगुरू। ऐसे में आप केवल गानों को सुनना ही पसंद करते है। पर एक बात है कि नए अवसर और नए नाम बन रहे है। पर ये नाम इतिहास में दर्ज होने वाले नहीं है। ये बरसाती मेढ़क जैसे नाम है। रेडियो चैनलो की बरसात और तकनीकी सम्पन्न चैनलो में माइक पर चिक चिक करते रेडियो जॉकी।

नए रेडियो चैनलो ने गंभीर प्रयास के तौर पर नामी समाचार माध्यमों से करार किए। पर वहां भी नामी गिरामी लोगों के इंटरव्यू में पूछा गया फिल्म कौन सी अच्छी लगती है, गाना कौन सा। खैर ये नया कदम कब गांव देहात की सुनाएगा, इसका इंतजार है।

देखा जाए तो भविष्य मोबाइल के कालर ट्यून जैसा लगता है। तब नया गाना आए को ट्यून बदल लीजिए। लोगों ने फ्रीक्वेंसियों पर रेडियों ट्यून करना अब सीख लिया है। लोग सुन रहे है। जो बज रहा है। लेकिन एक हल्की याद्दाश्त के साथ

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Monday, April 02, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा (अखबार)

अखबार, रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट। चार जनसंचार माध्यम। चार जरिए, जिससे आप जहां को जानते है। समझते है। पर क्या सचमुच। सवेरे सवेरे अखबार बांचने वालों में क्या पढ़ा जाता है, और क्या नहीं। ये सोचने वाला विषय हो चला है। खासकर जब सवेरे सवेरे मध्यम आकार के चटपटे अखबार बड़ी संख्या में बिकने लगे। मुंबई में मिड-डे है तो, दिल्ली में मेट्रो नाउ। जायका बदल रहा है। हार्डकोर न्यूज के सामने रसभरी खबरों को तरजीह दी जा रही है। ध्यान रखें कि ये आकलन शहरों का है। अखबारों की बड़ी कतार सड़क किनारे दुकानों पर दिखती है। अंग्रेजी में टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, पाएनियर, द हिंदु, स्टे्टसमैन, इकानामिक टाइम्स, मिंट आदि लुभावने अखबार है। समय के साथ चलते रहने और बदले में, आप इसे तारीफ न समझे, टीओआई ने बढ़त ली है। पहले जिस अखबार का संपादक प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताकतवर शख्स होता था, आज उसी टीओआई में संपादक का पद खाली है। जरूरत नहीं है। उन्नीस सौ नब्बे में उदारीकरण के बाद ये अखबार बदलता ही रहा। कभी शहर दर शहर तस्वीरों से पटे पेज थ्री के जरिए, तो कभी संपादकीय को गैर जरूरी समझकऱ। वैसे जिस बयार में आपको भी न समझने लायक छोड़ा है, उसे फांसने में टाइम्स आफ इंडिया सबसे आगे रहा। नहीं है सहमत, तो मेट्रो नाउ देखिए। संवाददाता आपको अंतरंग वस्त्रों की दुकान पर सेल्स गर्ल बनकर अनुभव लिखती दिख जाएगी। खैर बयार में मौजूद रहने वालो अंग्रेजी अखबारों में एचटी ने भी अपने सप्लीमेटों के जरिए दखल बनाई हुई है। रही बात हिंदु, पायनियर, स्टेट्समैन की तो, वे बदस्तूर जारी है। अपनी भूली बिसरी पहचान और नोस्टालजिया के साथ। शायद वक्त बदले और दिन बहुरे।

गुलाबी अखबारों की क्या कहें। अलग पाठक, अलग खबर और टीवी पर इंसान को कुत्ता बनाने वाले विग्यापन। इक़ॉनामिक टाइम्स की रचनात्मकता आपको पिकासो की लगती है, तो मिंट का आकार ईटी के आगे छोटा लगता है। बहरहाल असरदार दोनों है। पर सीमित वर्ग के लिए।

हिंदी का अखबार बाजार अनोखा है। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, दौनिक जागरण, वीर अर्जुन और तमाम फुटपाथ पर सजे अलग अलग नामों के अखबार। नभाटा की साख थी। आज प्रचार ज्यादा है। जान और अब्राहम के नाम को मिलाइए औऱ इनाम पाइए। यही नभाटा बचा है। हिंदुस्तान में लेख है, पर व्याकरणीय गलती पांच क्लास का बच्चा पकड़ ले। औऱ रविवार का संपादकीय लेख साहित्याकार भी पढ़कर झल्ला जाए। यानि वक्त के साथ वो बदलाव नहीं है। रही बात पंजाब केसरी की तो अखबार पढना कहां से शुरू करें, ये तय करना मुश्किल है। पहले सिनेमा है या समाज, इस अखबार को देखकर समझा जा सकता है। रही बात दैनिक जागरण की तो राजधानी की छन्नी में उसकी विचारधारा छन जाती है। निकलकर आती है तो रंगरोगन भरे पन्ने। वीर अर्जुन, महामेघा और अन्य अखबार जारी है। वजूद की लड़ाई के साथ।

जाहिर है आप रोजाना दो से ज्यादा अखबार नहीं पढ़ सकते। भले ही आप पत्रकार हो। तो जो भी पढ़े, दिन भर के लिए क्या पढना है, ये तय करना जरूरी हो गया है। और तय करने के लिए आप जो भी पढ़े, उसका आपकी रूचि का होना। और जनाब आपकी रूचियां बदल चुकी है। यकीन नहीं होता। तो टीवी चलाकर देखिए। जो दिख रहा है, वो ही आपकी रूचि मानी जा रही है। खैर...बाकी जनसंचार माध्यमों पर जल्द ही...

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