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Sunday, January 27, 2008

मैं पढ़ना चाहता हूं...

इस मेल को भेजने वाले की जो दरकार है, वो मायने रखती है। कांवेट स्कूल में अपने बच्चे के दाखिले की दरकार। पढ़ने की इच्छा की दरकार। हमें पता है कि पढ़ाई लिखाई का क्या बुनियादी रोल है। ईमेल भेजने वाले ने अपनी पूरी दास्तान लिखी है। ऐसा कोई भी लिख सकता है। हमें इसकी जांच पड़ताल की जरूरत इस वजह से महसूस नहीं हुई, क्योंकि इनकी भेजी गई अपील को हम केवल जगह दे रहें है। जिसे भी इससे संवेदना हो वो आगे जा सकता है। अपील तकरीबन पचास लोगों को भेजी गई है। जिनमें टीवी समाचार और प्रिंट मीडिया के कई नाम है।

मीडियायुग को भी भेजे गए इस ईमेल में हिंदी शायद भेजने वाले के पुत्र ने ही लिखी है, जो एक स्तरीय पढ़ाई लिखाई की आस रखता है। पिता के लिए अंग्रेजी में किसी ने लिखा लगता है।

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आज के युग में किसी बच्चे के मौलिक पढ़ाई लिखाई के अधिकार की अगुवाई कौन करेगा। क्या आप। क्या हम। या मीडिया।

मीडियायुग

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Appeal for education help for a minor child admission in good convent school

New Delhi

Mr. Parhalad Kumar Aggarwal, who was born in tribal area of Lang village of Ambika Pur region of Madhya Pradesh now residing in Delhi, has always faced tough times in his life right from his childhood. Firstly his mother has been a mentally retarded person because of whom his educated father also became homeless as he could not manage his business and property and also could not pay enough attention towards his children. Mr. Parhalad Kumar Aggarwal some how grew up facing such hardship in his life and he could not get that education as a child which he deserved like other children but he walked on the way of social work as it has been seen generally that such child either go for some criminal way or become victim of some anti-social habits. But Mr. Parhalad Kumar Aggarwal kept himself miles away from all these things, rather Mr. Parhalad Kumar Aggarwal made an objective as " I have faced the hardship in my life and no body came in front to hold my hand and help me, I will always help at my level-best whoever will come to seek my help". Mr. Parhalad Kumar Aggarwal was also getting success in his this objective but some mean people tried to divert him from his way for their own political benefits. Still Mr. Parhalad Kumar Aggarwal kept going on his way of honesty and helping others steadily. Mr. Parhalad Kumar Aggarwal has also been attacked several times. His wife who is a religious and God-faithing lady always help and supported him in his good deed. In spite of all this, as Mr. Parhalad Kumar Aggarwal is financially weak, is unable to give his children that education which they deserve. He wants to give his children international-level education so that as he has been deprived of quality education in his childhood, his children may not be deprived off. But Mr. Parhalad Kumar Aggarwal's son (Prankur, aging 5 years resident of Delhi, India) is not getting admission to any convent school, the biggest reason of which is his poorness. Will you not help such social worker who always believes in god, who has always faced bad times in his life and has always help those who has come to seek his help? If you will help Mr. Parhalad Kumar Aggarwal to seek admission for his son (Prankur) in a good convent school, then Mr. Aggarwal who though is unable to give you something in return but will definitely pray to God for your happiness.

Please give this appeal a suitable place in your news paper.


Parhalad Kumar Aggarwal
B-58/149, Guru Nanak Pura, Laxmi Nagar, Delhi-110092
Contact No.- 00919911099737
E-mail: parhlad_aggarwal@yahoo.co.in

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मोमबत्ती पकड़े प्राकुंर

देल्ही

मधय पर्देश के अम्बीकापुर के लंग्गाँव के आदीवासी छेत्र मी पैदा हुए परह्लाद कुमार का जीवन बचपन से ही मुसीबतों से घीरा रहा पहले तो ब्चापेन्न से ही माँ मानसिक रोगी थी जीसके वीयोग मे सीक्सित पीता भी बेघर हो गए ।
ओर अपने संपती और कारोबार को संभाल नही सके और न ही अपने ब्चों की देख भाल कर पाए दोनो ब्च्हे किसे तरह दर दर की ठोकर खा कर बडे हो गए । परह्लाद कुमार ने समाज सेवा का रास्ता अपनाया जबकि इसे मामलो मी ज्यदटर बच्चे गुनाह का रास्ता ही अपनाते है । या फिर गलत रस्ते पेर चल पड़ते है । पर परह्लाद इन सब बातो से कोसो दूर है । जबकि परह्लाद कुमार ने उदेसय बनाया है जिस तरह मैं दर दर की ठोकर खाता रहा ओर मेरा कीसी ने हाथ नही थमा पर मैं जरूरत मंद लोगो की मदद करुगा । ओर उस के लिए फाउंडेशन फॉर कमान मन की स्थापना भी की । मज्दुरु को गिर रही इमारत से बचाने मी अपने जन पेर खेल कर निकला जो की न्यूज़ पेपर ओर टीवी चॅनल ने भी देख्या था । रेल मी भीख मग रहे ब्च्हू को गुंडों के चुगल से निकल क्र आश्रम मे दाखिल करवाया । दलीत ब्ची jis का बलात्कर हो गया था जस्टिस दीलाने मे मदद की । लापता ब्च्हू को पता लगाने मी सरकार पेर जोर लगाने मे भोतज्यदा धरना पेर्दार्सन किया । मजदुर लोगो को मजदूरी दिलाने की लडाई लड़ी । पर कुछ लोगो ने अपने राजनीती चमकने के लिए उनके रासते मी उडचन भी डाली । हमले भी करवाए। फीर भी परह्लाद कुमार अपने रस्ते से टस से मस नही हुआ । समाज सेवा मी उसका साथ देने वाले उसके साथी ओर दर्म पत्नी ने इस्वर की रह पेर चलने वाले परह्लाद कुमार का पुरा सहयोग दिया । किन्तु इन सब के बाबजूद परह्लाद कुमार अर्थिक रूप से पेरेसान है । ओर अपने बच्चो को भ शिक्षा नही दे पा रहा है जो देने चाहिऐ । बह चाहता है की उसके बच्चे भी विस्ब्स्त्रीय सीख ले ओर जो शिक्षा की कमी उस मे रही है । उस की ब्चोचो मी न रहे । पर्न्तो परह्लाद के बेटे परंकुर को कान्वेंट श्कूल दाखिला नही मिल रह है । जिस की सब से बडी बजह है उस की गरीबी । कया आप इसे समाज सेवी प्रभु के रस्ते पेर चलने वाले दर दर की ठोकर खा कर भी गरीबो की सेवा करनी वाले परह्लाद की सहायता नही करेगे । यदी आप परह्लाद के बेटे परंकुर को किसी अच्छे स्चूल मी शिक्षा दिलाने मी सहयोग करते है तो परह्लाद कुमार परभू से परथाना करगा की आपका जीवन परभू खुसेयो से भर दे । कुर्प्या इसे अपने समाचार पत्र मी जगह देने की कुर्पा केरे.

parhlad kumar aggarwal
b58/149 guru nanak pura laxmi nagar delhi 110092
phone 00919911099737

"MediaYug"


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Monday, May 07, 2007

टीवी के तीन चेहरे

दहेज हत्या, बच्चों की जान की चिंता और आज का दिन जानिए। बीते दिनों में टीवी पर ये तीनों ही छाए रहे। दिल्ली और आसपास के इलाकों में दहेज को लेकर एक अजब सा माहौल पनपता जा रहा है। कई कई सालों से शादीशुदा जोड़े अपनी शादी को तोड़ने पर आ गए है। क्यों। जीवन के तनावों को दूर करने का माध्यम अब शहर को लोग पैसे को मान चुके है। ज्यादा पैसा कम परेशानी। किसी के पास चार पहिया नहीं है, तो किसी को धंधे के लिए और पैसे चाहिए। सो जब उन्हे अपने आसपास से पैसा नहीं मिलता, तो वे समाज की एक ऐसी कुरीति का दामन थामते है, जिससे वे परिवार को दांव पर लगा रहे है। टीवी पर दहेज अत्याचार से जुड़ी खबरे आई, लेकिन किसी में भी गहनता से ये नहीं दिखाया गया कि असली वजह क्या है। पर जिस एक वजह को टीवी ने दिल से छुआ, वो रही देश भर में इलाज की वेदी पर सिसक रहे बच्चों की। कही किसी के दिल में छेद है, तो कही किसी को कैंसर। कही कोई अनाथ रेल के डिब्बे में पड़ा मिला, तो कही उसे अपनाने की ललक समाज में दिखी। कुल मिलाकर इस सारी पेशकश में एक चरित्र तो साफ हो गया कि भारत में भावनाए अभी भी बहती है। टीवी ने कम ही बार इसे समझा और दिखाया है। लेकिन इससे गाहे बगाहे भला उनका हो जाता है, जो सचमुच किसी की मदद करना चाहते है, या हैसियत में है, लेकिन शुरू कहां से करें, ये नहीं जानते। कुल मिलाजुलाकर इस सारे फसाने ने एक दर्द को हवा दी है, कि बिलखते बच्चों का कोई तो खैर करें। टीआरपी की चाह के बावजूद भी ये सराहनीय रहा। और भविष्यगामी भी। भविष्य बांचने वालों की तो चांदी हो चली है। हर चैनल पर वे बहस रहे है। आज आपका दिन रहेगा, ऐसा, वैसा, कैसा। लेकिन ज्योतिष और तमाम भविष्य बांचने वाली विधाओं को स्टूडियों की चांदनी में पेशकर टीवी चैनल देश को किस ओर ले जा रहे है, पता नहीं। क्या देश की आधुनिक पीढ़ी इसे देखना चाहती है, या एक प्रोफेशनल अपने काम को अब राशि और रत्नों से आंकने लगे। क्या देश की राजनीति अब ग्रह नक्छत्र औऱ कुंडली के हिसाब से अपनी जननीतियां तय करें। या किसी घर में क्या पके, ये भी अब राशिवक्ता बताएंगे। बुरा है। बहकाव है। आप किसी भी ग्यान पर भरोसा कर सकते है, अंधविश्वास नहीं। देश को आगे ले जाने वाली खबरों की जरूरत है। देश को ये देखना है कि सुबह सवेरे कैसे प्रकाश जीवन को बदल रहा है। कैसे ग्रह नक्छत्र नहीं। मैं अतिश्योक्ति नहीं बांच रहा हूं। आप आनलाइन या एसएमएस सर्वे करा लीजिए। नतीजे आ जाएंगे। वैसे हां ये जरूर सत्य है कि ऐसे तमाशे चलते रहे तो आने वाले दिनों में तमाम समाचार चैनल विरोधियों को पछाड़ने के लिए यग्य, मंत्रोच्चार आदि कराने लगे। ऊं आजतकाय नम, ऊं स्टार न्यूजाय नम आदि आदि। वैसे मजाक ही सही, पर क्या किसी चैनल से किसी खबर को दिखाने के लिए किसी ज्योतिषाचार्य से पूछा कभी। नहीं न। तो क्या जरूरत है, जनता को हर दिन सचेत करने की। ऐसे देश में जहां कर्मण्येवाधिकारस्ते जपा जाता हो, वहां रोजाना कर्म से ज्यादा भविष्य को बताना घातक ही होगा। वैसे टीवी को जरूर आ पड़ी है इसकी जरूरत। यानि जल्द ही आपको चैनल विशेषग्य पंडित मिलने लगेंगे।

सूचक
soochak@gmail.com

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Wednesday, April 18, 2007

टीवी की कमजोरी पर हमला

बड़ी चिक चिक मची हुई है। लोकतंत्र पर हमला करार दिया गया एक समाचार चैनल पर हालिया हमला। कुछ ने कहा ये फलां है, कुछ ने कहा कि चैनल की किस्मत थी। खैर तोड़ फोड़ हुई और इसे आप विरोध के तौर पर कतई उचित नहीं कह सकते। पर बड़े सवालों पर किसी का कोई ध्यान नहीं गया। क्या टीवी देखने वाला टीवी की ही तरह सीमित सोचने लगा है। शायद हां। कहा गया है कि डिफाइन इज़ द लिमिट। और टीवी ने खबरों को मनोरंजन के तौर पर डिफाइन करके आपको भी नकली हंसी औऱ नकली आंसू बहाने की स्थिति में ला दिया है। किसी भी जनसंचार माध्यम पर हमला या उससे जोर जबरदस्ती पहली नजर में दबिश ही मानी जाती है। खबर को दबाने या चलाने के बाद गुस्से की प्रतिक्रिया। प्रेस को स्वतंत्रता चाहिए, औऱ उस पर वार लोकतंत्र पर वार सरीखा होता है। यानि कि गलत कदम। लेकिन अगर ये प्रतिक्रिया किसी ऐसी घटना के बदले की जाए जिसका देश के आम आदमी के मौलिक अधिकार से ताल्लुकात हो तो। तो बात को विचारधारा की कट्टरता या एक झुंड की मूर्खता माना जा सकता है। और मानने की जरूरत ये है कि इस घटना से मीडिया की ताकत नहीं कमजोरी जाहिर की है। कमजोरी। एक ऐसी कमजोरी जिससे मीडिया का नाता खत्म होता जा रहा है। सामाजिक सुरक्छा की कमजोरी। बताइए। आप किसी जनसंचार माध्यम में कार्य करते है। और हमले में आप घायल होते है नुकसान झेलते है और एक खबर बन जाते है। तो क्या इससे आपकी भावना और मजबूत होती है। आगे ऐसा करते रहने के प्रति। खबर को उसी दृढ़ता से दिखाने के प्रति। या इसे आप केवल इस तौर पर देखने लगेंगे कि जब संस्थान ही सुरक्छित नहीं तो हम क्या होंगे। और इससे भी बड़ा सवाल, जो जोड़ा भागकर समाचार माध्यम के पास आया। इस आशा में कि उसे अधिकार मिलेगा, आजादी मिलेगी और एक मिसाल कायम होगी। उसका क्या। देश में कुंवारी उम्र में प्यार की पींगे बढ़ाने वाले लाखों जोड़ों को क्या अब रास्ता दिखा है। या डर बैठ गया है कि जब किसी पत्रकारिता संस्थान पर हमला हो सकता है, तो हमारा क्या होगा। हम कहां जाएंगे। पूरे देश में प्रचार पाने के बाद। कमजोरी। ये है टीवी की। उसने समाज को मजबूत नहीं किया। बदला नहीं। प्रवृत्तियां नहीं बदली। मानसिकता नहीं बदली। औऱ इसके बीच मीडिया हक को दिलाने की पैरवी करने लगा। पैरवी और जिरह। जिरह उस समाज से जो कई खांचों में बंटा। जाति, पाति, धर्म, कुनबा औऱ सोच में। तो कैसे माना जाए कि पत्रकारिता की जिस ताकत से आप समाज बदल सकते थे। उसी का बेफिजूल उपयोग आपने मजबूती पा ली है। कमजोर हो गया है हर वो आदर्श जिसके बदौलत आप मिसाल बनाते थे। रसूखों के गुमान तोड़ते थे। औऱ सामाजिक विकृतियों को बदलते थे। तो यानि हमला इसी कमजोरी पर हुआ है। और इस कमजोरी को टीवी ने खुद पैदा किया है। और कमजोरी को ताकत में बदलने के लिए जिस बदलाव का हिमायती होना चाहिए, उससे बहुत दूर हो चला है टीवी। तो प्रेम को अधिकार दिलाने की इस लड़ाई में न तो जोड़ा जीता, न ही टीवी।

सूचक
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Wednesday, April 11, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा(टेलीविजन)

रूकावट के लिए खेद है। रूकना तो दूर अब टीवी ने इतनी तेज गति पकड़ ली है कि सफर कठिन होता जा रहा है। स्वागत है आपका एक ऐसे समाज में जहां ये कहना कि टीवी आईना है, धुंधलका फैलाना जैसा होगा। टीवी ने देश में पचास साल से ज्यादा समय बिता लिया है। और निजी चैनलों ने तकरीबन बीस साल। बीस साल बाद क्या होगा। कल्पना करिए। आपकी टीवी आपके हाथ में होगी। आप केवल वो देखना पसंद करेंगे, जो समयखपाऊ न हो और कंटेंट पर आपकी मर्जी चलेगी। कंटेंट। देश में जब टीवी ने शुरूआत की, तब माहौल देश में जागरूकता लाने का था। उसने ये भूमिका निभाई भी। निजी चैनलों ने अपनी शुरूआत ही मनोरंजन से की। हालांकि सोप ओपेरा का पूरा तमाशा फैलाने में सरकारी चैनल ने ही प्रथम की भूमिका निभाई। शांति और स्वाभिमान के जरिए। लेकिन ये खाली वक्त में घरेलू महिलाओं को किसी तरह के मोहपाश में बांधने की कोशिश नहीं बन पाया। पर निजी चैनलों ने वो कर दिखाया जो आज नशा है, जरूरत है और है भरपूर तमाशा।

समाचार क्या है, खबर क्या है। ये कोई भी हाईस्कूल का लड़का नहीं जानना चाहता है। पर आज वो समाचार चैनल देखना चाहता है। क्यों। मल्लिका है, शाहरूख है, फिल्म है, गाना बजाना है, रेप है, गैंगवार है और है भरपूर क्राइम। जो दिखता है, वो बिकता है। यानि असली भारत दिखना बंद हो गया है। सो बिकना भी। टीवी ने इस जुमले को जिस करीनेपन से भुनाया है, उतना फिल्म वाले भी न भजा पाए। आज का टीवी विविध है, मनोरंजक है, उथला है, पर मौजूद है। वो आम आदमी को खबर बनाने की ताकत रखता है, पर समुदाय के सामने झुक जता है। वो कड़ी जबान में सत्ता का सामना करता है, पर सत्तासीन व्यक्ति को लुभाता रहता है। वो बाजार के उत्पाद पर खबर करता है, नकारात्मक भी, पर प्रचार पाने को कम खबरें दिखाता है। वो आम आदमी को अपनी एक्सक्लूजिविटी का अहसास कराता है। और उसके दरवाजे पर घुसने की हिम्मत नहीं पैदा होने देता है। एक खबर की मौत क्या होता है, ये आप किसी भी पेश होने वाली खबर के तौर तरीके से समझ सकते है। टीवी की मौत क्या होती है, इसे जानने के लिए आप दिन भर टीवी देखकर समझ सकते है।

आज देश में तीन सौ के करीब चैनल है। हिंदी के पचास के करीब। औऱ रीजनल भाषाओं के सौ के करीब। यानि पलड़ा भारी है भाषाओं का। और पलड़ा भारी है उन खबरों का, जो मौका और दस्तूर तो निभाते है, पर सूचना नहीं, ग्यान नहीं। तो बदलते वक्त की नब्ज भांप कर भी टीवी ने भले ही चोला बदला हो, लेकिन ये रंगबिरंगा ताना बाना क्या बना रहा है, ये समझना भी मुश्किल नहीं है। नई पीढ़ी को देखिए। वो टीवी कब देखता है। रात को। आधी रात को। तेज स्वर में। हर सेंकेंड में उसके लिए छह बार फ्रेम बदल जाते है। वो चार सेंकेड़ों की जिंदगी जीता है। वो चैनलों को गियर जैसा बदलता है। वो कैमरे के फ्लैश सा चमकता है। वो टीवी इतना ही देखता है।

टीवी ने जो बदलाव लाए है, वो इतिहास का हिस्सा नहीं हो सकते है। टीवी ने जो दिया है, वो याद करने लायक नहीं है। टीवी ने जो रचा है, वो कपोलकल्पित संसार सच से बहुत दूर है। करीब है तो आपके दर्द में उनके बेतुके, असंवेदनशील सवाल। मौके पर खड़े होकर अ अ करके देते जवाब। और आपको बता दे कि....का राग। आप जान चुके है। और जागरूक हुए आपको तकरीबन बीस साल हो चुके है। तो अगले बीस साल बाद आप क्या देखना चाहते है, ये तय कर लीजिए। क्योंकि टीवी एक मशीन है, और सोचना आपका काम है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Saturday, February 17, 2007

मैं निर्दोष हूं..


एक दंपत्ति। कई जिंदगियों को लेने के आरोपी। देश की उच्चतम अदालत ने कहा कि मौत दे दो। मामला इससे आगे नहीं जा सकता है देश में। पर टीवी को क्या इसका पता है। शायद नहीं। तभी तो दो दिन सजा पाए पति पत्नी को लाइव दिखाता है। उनसे पूछता है कि क्या किए थे आठ कत्ल। और जाहिर है जवाब ना ही होता। पर टीवी ने इस पर दो दिन क्यों दिए। ये किसे देखना था। क्यो देखना था। क्यो दिखाना था। ओछी लोकप्रियता का अनैतिक तमाशा या अपनी ताकत को जाहिर करने का एक और शो। टीवी के एक चैनल पर जारी ये सामाजिक विद्रूपता कई सवाल खड़े कर देती है। एक दंपत्ति पर संपत्ति का मामला। २००१ का हादसा। एक विधायक रेलु राम पुनिया की बेटी और दामाद आरोपी। सोनिया और संजीव को सेशन कोर्ट ने मौत की सजा दी थी। हाईकोर्ट मे उसे उम्रकैद में बदला था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कहा जघन्यता है। पर टीवी को ये सब समझ नहीं आया। दोनों को पकड़ा। और बैठा लिया। कहा बोलो। फोन करिए। सवाल पूछिए। मानो भविष्य बाचने वाले बैठें है। मानो वे कहेंगे कि हां हमने की थी अपने पिता, मां, भाई, भाभी और छोटे छोटे तीन मासूमों का हत्या। राड से पीटकर। टीवी ने फिर चलाया। चार सौ करोड़ की संपत्ति थी। और इसे ही चाहते थे वे। लेकिन सवाल ये है कि जब कोर्ट ने, और सर्वोच्च कोर्ट ने मौत की सजा सुना दी थी, तो क्यो जारी थी ये कहानी। क्यो हिमाकत दिखा रहा था टीवी। अपनी संप्रभुता को भूलते हुए। दर्शक इसे देख रहा था। वो इतनी गहराई में सोचता है कि नहीं , इसे समझ पाना मुश्किल है। हकीकत को बढ़ा चढा कर दिखाने वाला टीवी समाज के बदलाव को विद्रूपता के नजरिए से दिखा रहा था। वो गलत को सही कहने का मौका दे रहा था। वो अपराधी को मौका दे रहा था। वो रूख दिखा रहा था। कभी आरोपी स्टूडियों में आता है। सर उठाता है। औऱ जेल जाता है। कभी अभियुक्त हर फैसले के बाद कहता है कि वो निर्दोष है। उसे फँसाया गया है। तो टीवी इसे क्यो दिखाता है। बार बार। क्यो जनता की दया का पात्र बनाता है। क्यो रियाया के दिल में न्यायपालिका के खिलाफ एक तेवर पैदा कर रहा है। क्यो अपने आप को सर्वोच्च मान रहा है। ये ऐसे सवाल है जो ऐसे तमाशे खड़े करने वालों को परेशान नहीं करते। वे केवल आंखों का ख्याल रखते है। देखने वाली आंखे। समाज या न्याय की नहीं। बल्कि दर्शक की। वे ऐसे माहौल को बना रहे है, जो हर गलत को सही मानने पर मजबूर कर रहा है। वे दो चार सौ एसएमएस से ये बताने में लगे है कि समाज ऐसा सोच रहा है। वे टीवी पर फोन करके सवाल पूछने वालों से ये दिखा रहे हैं कि सब गलत है वो सही है। वे दिखा जो रहे है। उनके पत्रकार अब लोगों को बटोरने में लगे है। कोई अभियुक्त के रिश्तेदारों के आंसू दिखा रहा है तो कोई उनसे खफा लोगों के मर्म। न जाने कहां ले जा रहे है विषय औऱ वस्तु को। वस्तुपरकता खो चुकी है। व्यक्तिवादिता हावी हो रही है। एक जाते जान की कोई कीमत नहीं है। जबकि जो जान लेने पर उतारू है उसे जगह दी जा रही है। कैसे पर्दा है ये। क्या ये समाज के सच को बताकर खुद अलग खड़े होने में यकीन रखते है। या शामिल होकर किसी कातिल का हौसला बढ़ा रहे है। आओ, मारो, सजा पाओ, और हम तुम्हे देंगे एक मौका अपनी दलील रखने का। ये खतरनाक संकेत है। एक समाज को सचाई के फैसले से दूर ले जाना का घिनौना नाटक। जो जारी है। और अगर जारी रही तो आप भी एक दिन पाएंगे कि आपके साथ हुए हादसे का अपराधी टीवी पर चीख रहा है। मैं निर्दोष हूं।

सूचक



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