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Saturday, January 26, 2008

जय हिंद, जय भारत

जय हिंद, जय भारत
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जो आज के दिन को समझते है, वे इसे महज छुट्टी के तौर पर नहीं देखते। टीवी के माध्यम से आज का दिन एक तरह का भुला बिसरा गीत सरीखा है। जिन्होने भी आज सुबह इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री का अमर जवानों को श्रद्धांजलि और बाद में राजपथ पर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की अगवाई में सेना और झांकियों की छटा देखी होगी, वे लोकतंत्र की गरिमा को समझने से वाकिफ हो पाएं होंगे। दूरदर्शन की महत्ता शायद आज जैसे दिनों में ज्यादा समझी जा सकती है। सुबह पहले रिनी खन्ना और फिर सेना के कई अधिकारियों की आवाज में देश का गरिमागान भाता है। निजी चैनलों पर केवल लोगो और स्क्रीन पर तिरंगा फहराने की प्रथा से कई गुना आगे जाते हुए दूरदर्शन आज के दिन, लोकतंत्र की गाथा, अमर जवानों का साहस, सेनाओं की सलामी और तरह तरह की जानकारियों को देकर पूरे सजीव प्रसारण को लुभावना और कशिश वाला बनाता है। हमारे देश में राष्ट्रभक्ति से जुड़े गीत भी अब दिनों के लिए बजने लगे है। वो बजते है, तो मन में कुछ सुरसुराहट होती है। अच्छा लगता है।

दूरदर्शन की सजीव प्रस्तुति को सारे समाचार चैनल दिखाकर जिस मानस को संतुष्ट करना अपना कर्तव्य समझते है, उसी को रोजाना देश के हित से अलग बहलाकर वे भले ही भला न कर रहें हो, लेकिन कभी कभी सभी चैनलों पर एक ही दृश्य का चलना एक माला के मोती जैसा अहसास देता है।

संविधान को देश ने आज से ५९ साल पहले अपनाया था। और उसमें अभी तक सौ के करीब बदलाव किए गए। जनता को शायद पंचायती राज से जुड़ा संविधान में बदलाव तो याद होगा। लेकिन बहुत से ऐसे बदलाव जारी है, जो अब पता नहीं चलते। ये जानना जरूरी है और जरूरत भी।

टीवी पर तोपों की सलामी, तिरंगे का फहराना, सेनाओं की कदमताल, सैनिकों का गरजना और आकाश से फूल बरसाते विमानों के नजारे अपने लोकतंत्र में फैले हर रंग की बयां करते है। शायद कंटेंटविहीन कलरबार की तरह। लेकिन, इसके बाद जो भी टीवी पर आता है, वो जनमानस को तभी भाता है जब उसमें लोकतंत्र की गरिमा और सूचना के ताकत का अहसास हो। ये भले ही कोरी कल्पना हो, लेकिन आप तभी तक इंसान है, जब आप अपने मूल्यों, कर्तव्यों और अधिकारों से लैस है।

जय हिंद, जय भारत।




'MediaYug'

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Sunday, December 30, 2007

बेनजीर हत्याकांड और ब्लाग

विश्वसनीयता का मानक क्या है। किसी बड़े हादसे के बाद टीवी के सामने ये सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। पाकिस्तान की आला नेता बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद टीवी पर खबरों का रूख पल पल बदलता नजर आ रहा है। पहले जिसे गोली से लगने वाली मौत माना जा रहा था, वो सरकारी बयान के बाद एक हादसा सा दिखाया गया। लेकिन इसे काटने के लिए भारतीय टेलीविजन चैनल एक से एक बढ़कर दावे पेश कर रहे है। आज एक प्रमुख समाचार चैनल ने एक ब्लाग पर से दिखाई गई तस्वीरों के बिना पर पाकिस्तान के सरकारी दावे की धज्जी उड़ाई। इन तस्वीरों को आप भी देखिए..




जाहिर है इस ब्लाग पर दी गई इन तस्वीरों में बहुत कुछ साफ नहीं है। लेकिन ये ब्लाग की ताकत को दिखाता है। चैनल ने लगातार कई घंटों तक ब्लाग के नाम और उसमें कहीं गई बातों को दिखाया। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब एक बड़ी राजनीतिक हत्या के बाद एक ऐसे सोर्स को पेश किया गया, जो पाकिस्तान में तो अभी नया ही कहा जा सकता है।
भारतीय चैनलों की इस हड़बड़ी को समझना जरूरी है। दरअसल कल दिन से ही एक अंग्रेजी चैनल ने पाकिस्तान में द हिंदू अखबार की संवाददाता के जरिए इस बात को बताया कि कैसे बेनजीर की हत्या के वक्त वे मौका ए वारदात पर थी। फिर हिंदी के समाचार चैनलों ने पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री जावेद चीमा के बयान को आधार मानकर थ्योरी को स्कल डैमेज से जोड़कर दिखाया गया। कहीं न कहीं सरकार के नजरिए को चैनल दिखा रहे थे। जबकि आज उनका रूख बीच वाला था। शाम से ही भारत में चैनल गोली की थ्योरी और स्कल डैमेज के बीच अंतर को दिखा रहे थे। पत्रकारीय सोच की एक झलक दिख रही थी। लेकिन पल पल बदलने वाले इस हादसे में जांच का रूख तय करता पाकिस्तान की सरकार ही दिख रहा था।

वैसे शाम तक ब्लाग पर दिखी तस्वीरों से एक बार फिर दिखा एक आम नजरिया। जो कहीं न कहीं सरकार के दावों की धज्जियां उड़ा रहा था। खैर सूचना के इस दौर में नए खुलासों के लिए इंटरनेट की इस नई दखल का स्वागत किया जाना चाहिए।

"सूचक"
soochak@gmail.com


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Monday, December 03, 2007

मनोरंजन जगत में रूका तूफान


कहीं दीप जले कहीं दिल। ये बात आज आपके सामने मौजूद सात हिंदी मनोरंजन चैनलों से समझी जा सकती है। सात कौन-कौन। स्टार प्लस, ज़ीटीवी, सोनी, सब, स्टार वन, सहारा वन और डीडी वन। कुछ ज्यादा ही ‘वन’ हो चले है। ये बात दीगर है कि जिसके नाम के साथ ‘वन’ जुड़ा है, वो अभी तक नम्बर ‘वन’ के पायदान से कोसों दूर है। पिछले कई सालों से कुछ चैनलों की बादशाहत से अब जाकर दर्शकों को कुछ निजात मिली है। क्या इसे नयापन भी कहा जा सकता है। शायद। बीते दिनों एक नए चैनल के एयर होने और अगले महीने एक के आने की खबर से बाजार में हलचल बढ़ी है। दरअसल स्टार प्लस की कई सालों की बादशाहत को चुनौती देने वाले भी इसी समूह से निकले दो लोग है। यानि नब्ज और समझ दोनों के स्तर से वाकिफ। 9 एक्स चैनल ने पहले दस्तक दी। 12 नवम्बर को ये चैनल नौ बजे से आने लगा। तीन बड़े कार्यक्रमों की फेहरिस्त के साथ। तीनों की कहानियों में किरदार मध्यम और उच्च वर्ग की आकांक्षाओं के चेहरे थे। यानि फार्मूला पुराना था। वैसे भी दर्शकों को जिस फंतासीपन की आदत लग गई हो, उसे ही परोसना सधा सौदा होगा। जिया जले, कहें न कहें, मेरे अपने जैसे सोप ओपेरा देखने की आदत अब हमारे संपन्न घरों को लग चुकी है। हां, चैनल का दावा बेहतर प्रोडक्शन वैल्यू देने का है। यानि ज्यादा लाइटिंग, ज्यादा कास्ट्यूम और ज्यादा मेकअप। गांव में रहकर शहर के सपने, शहर में रहकर संबंधों का षड़यंत्र और प्रेम की कई नायाब डेफेनिशन गढ़ना। हो सकता है प्रतिभाओं की तलाशनो की उनकी मुहिम ‘मिशन उस्ताद’ से दो चार लोग कुछ दिनों के लिए हर जुबान पर चढ़ जाए, लेकिन अंत सबको पता है। जीवन की सचाईयों के आगे सब फसाने कुछ पल के लिए ठहरते है। लेकिन सीरियल दर सीरियल एक अलग दुनिया गढ़ने की कारीगरी में लगे है।

टीवी मनोरंजन में डीडी के स्वाभिमान, जूनुन से जो प्रयोग किए गए वो आज क्योंकि सास भी...कहानी घर घर की.. से आगे आते हुए मेरी पचासवीं शादी में आइएगा जरूर तक जैसे कार्यक्रम प्रोमो तक आ चुकी है। खैर इस दौरान जिस फार्मेट ने टीवी मनोरंजन को सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया है, वो रहा रिएल्टी शोज का। यानि मधुर आवाज की खोज वाले कार्यक्रम। इनकी कड़ी लंबी है। सारेगामापा से लेकर स्चार वायस आफ इंडिया तक। इससे ही जुड़ा है सेलिब्रिटी को गाने और नचाने के प्रोग्राम। इसे हिट फार्मूला मानते हुए आज भी आने वाले चैनल इसे आजमा रहे है। तो देखते रहिए 9x का धमाल एक्सप्रेस और इंतजार करिए मिशन उस्ताद का।

जिस आने वाले चैनल का बाजार को इंतजार है, वो एनडीटीवी समूह का शुद्ध मनोरंजन चैनल होगा। एनडीटीवी इमेजिन। यानि कल्पना। कल्पना करिए कि क्या क्या परोसा जाएगा इस चैनल पर। दोस्ती, दरार, कामेडी, इमोशन और ड्रामा। तो नया क्या होगा। हर चैनल पर तो यही दिखता है। चैनल का मानना है कि वो हर कुछ परोसेगा। लेकिन अलग अंदाज में। अलग अंदाज। चलिए मान लेते है। ये तो तभी तय होगा जब इसे पसंद या खारिज किया जाएगा।

लेकिन ये सारे संकेत क्या कहते है। क्या भारतीय टीवी का मनोरंजन अपने सीमित दायरों में फैल कर बढ़ने का इंतजार करेगा। या एक समय पर एक जैसे कंटेंट के जरिए लोगों में एक तरह की भावनाए तरंगे पैदा करेगा। या इसे अपनी रचनात्मकता के लिए हमेशा विदेशी कांसेप्ट्स को देसी रंग में बेचना भाता रहेगा। या ये शहर और गांव के बीच एक नई दुनिया बसाकर भुलावा पैदा करना जारी रखेगा। ये सवाल इस टीवी के मनोरंजन के कर्ता धर्ताओं से है। यानि से सवाल आम समझ रखने वाले दर्शकों के है। हमारे जैसे आम दर्शक।

टीवी चैनलों के प्रसार से दर्शक और उत्पाद दोनों को भारी फायदा हुआ। दोनों ने अपने अपने तरीके से इसे लिया। बाजार ने हर घर और दिमाग में सीधी पहंच बनाई, तो दर्शक को अपने खाली समय में मनोरंजर की एक ठीक ठाक खुराक मिली। ये अलग बात है कि उसके सपनों की बुनियाद को केन्द्र में रखकर ही ज्यादातक कार्यक्रमों ने टीआरपी, टीवीआर बटोरी। लेकिन इस दौरान उसे एक हकीकत से दूर ऱखा गया। टीवी मनोरंजन के फसाने में फंसने के बाद वो अपनी जिंदगी के ताने बाने से कट सा गया। बिल्कुल सिनेमाहाल में बैठे दर्शक की तरह। बाहर बरसात हो या धमाका। वो गुम है पर्दे की बनाई दुनिया में। पर्दे का सुख उसका, दुख उसका।

टीवी मनोरंजन से जो उम्मीदें है, वो अभी मरी नहीं है। वो वास्तविकता के करीब तो है, पर वास्तविक नहीं। सो आने वाले वक्त में बोरियत भरे सीक्वेंस से बेहतर वो देखना होगा, जो सच है। अमीरी और गरीबी के बीच का सच। ये किसी तरह की समाजवादी मांग नहीं है। ये वक्त के दायरे में दिखाए जाने वाले धुंधले आइने में सच दिखाने की गुजारिश है। आज भी इस देश में डिस्कवरी और एनजीसी जैसे चैनलों की व्यूवरशिप करोड़ों में है। तो क्या खुद के बनाए समाज को जानने में क्या दर्शक की रूचि नहीं होगी।

खैर। सपनों की दुनिया में आने वाले वक्त में कई दावेदार एक साथ एक ही केक में हिस्सा बांटने के लिए चिल्ल पौं मचाएंगे। और इसे देखना दर्शक की खुशी और गम दोनों होगा। जाहिर है हर चैनल अपने लिए एक नया दर्शक वर्ग खड़ा करने में कोई न कोई नया कदम उठाएगा। और तय जानिए इसके ठीक बाद दूसरा चैनल उसी वर्ग को वैसे ही कंटेंट के साथ काटेगा।
बहरहाल देखते रहिए इस मनोरंजन को। और मनोरंजन जगत में रूके इस तूफान को भी। दरअसल टीवी दुनिया को भी एक ऐसे तूफान का इंतजार है जो उसके दर्शकों की संख्या को यकायक बढ़ा दे। और सीधी बात है इस तूफान से जुड़ा है बाजार और प्रचार।

Soochak
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Sunday, October 07, 2007

सूचना के खरीदार आप

किस तरह की पत्रकारिता के खरीदार है आप। सुबह से लेकर शाम तक आपके सामने से कई तरह के संचार साधन गुजरते है। हर की कीमत तय है। अखबार, टीवी, रेडियो और इंटरनेट। सबने बीड़ा उठा रखा है कि वो आपको सूचना देगी। एक ऐसी सूचना, जिसका उपयोग आप अपनी किसी जरूरत को पूरा करने में कर पाएंगे।
अखबार में पहले पन्ने की खबर में से पाई गई एक सूचना से दिनभर की बासी बहसों को नया आयाम मिला करता था। लेकिन आज तमाम और निजी जरूरतों ने इनपर कब्जा कर लिया। किसी से पहली मुलाकात में देश, विदेश और समाज नहीं अब फाइनेंस, गाड़ी, मोबाइल और बेहद ऊपरी बातें होती है। ये हाल तो शहर का है। लेकिन ग्रामीण अंचलों में लोग अब सरकार से ज्यादा लोकल स्कीम्स, व्यवसाय की खबरों, मंडी भाव और मनोरंजन की खबरों को तव्वजों देने लगे है।
टीवी ने जिस ऊबाउपन को दूर किया था, आज वो बीच बीच में आने वाले ब्रेक्स से बढ़ गया। तकरीबन एक सी प्रस्तुतियों से लोगबाग अपनी सामान्य समझ को किनारे रखकर टीवी देखने लगे है। मनोरंजन की विविधता के दर्शन के नाम पर गाना बजाना, फूहड़ हंसी और रोमांच के नाम पर पैसों का खेल। लेकिन इसके भी दो चेहरे है। सरकारी चैनल अभी भी कुछ जमीनी है। वैसे भी दूरदर्शन के दर्शक कम से कम अपने घरों में नैतिकता की शिकायत नहीं कर सकते। निजी टीवी चैनलों की रचनात्मकता केवल बनावटी और नकल को अपने ढांचे में पेश करने में ज्यादा दिखती है। वैसे अपने कांसेप्ट पर हमने जो भी ऊंचाईयां पाई है, वो आज के दौर में इतिहास है। आगे आने वाले दिनों में बेकार समय गुजारने का माध्यम टीवी अगर नहीं बन पाया तो इसके पीछे केवल देशकाल की समझ रखने वाले कंटेट को ही अपनाना वाला होगा। जो हमें अपनी पहचान के पास रखेगा, और टीवी को उसकी।
रेडियो की आवाज बदल गई है। वहां आवाजें तो बहुत है। लेकिन प्रभाव घट गया है। हालांकि रेडियो को इस धमाल का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिसके गाने बजाने से आज रेडियो जिंदा है। एफएम एक पहल थी। जो बीते कुछ सालों में लूप में बजने वाले गाने सी होकर रह गई है। सरकारी रेडियो ने भले ही अपनी मौजूदगी बनाए रखी हो, लेकिन उसका पुरकशिश अंदाज अब पुराना सुर सा लगता है। खबरों के लिए रेडियो सुनने वालों की कमी हो गई है। सुबह शाम बीबीसी सुनने वाले अब कम हो चले है। रेडियो को नई पहचान तो मिली, लेकिन उसकी अतीत अब ज्यादा प्रभावी लगता है।
इंटरनेट पर खबर पढ़ने वालों को माध्यमों की बहुलता से जूझना पड़ता है। आप गूगल पर खोजकर सूचना को ज्यादा उपयोगी नहीं बना सकते। सूचना को सींचना कैसे ये इंटरनेट पर तय करना मुश्किल है। सबसे बड़ी दिक्कत तो स्क्रीन की चंचलता ही है। प्रचार, सामग्री का ऐसा घलमेल होता है कि आप कि एक गलत क्लिंकिग आपका समय ही बर्बाद करती है। और अगर आप किसी ग्रुप के सब्सक्राइबर है तो सूचना के साथ आफर इतने कि आप का जी आजिज। शोध की गहरी संभावना को शायद इंटरनेट ने खत्म सा कर दिया है। इसे पत्रकारिता अच्छे से समझ सकता है।

तो क्या आने वाले वक्त मे हमें एक नए संचार माध्यम की जरूरत होगी। या हम वाहियात सी लगने वाली सूचनाओं से अपने आप को आगे बढ़ाएंगे। बहरहाल जो भी हो आप खरीदार बनें रहेंगे। और जो भी उत्पाद आप खरीदेंगे उसी से तय होगा कि आपकी सूचना क्या है।

सूचक
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Sunday, September 09, 2007

एक खबर, एक पत्रकार, और टूटता विश्वास

एक स्टिंग। एक निशाना। एक शिकार। एक पत्रकार। और टीवी चैनलों को एक नसीहत। कि संभले। ये लोकतंत्र है। वे चौथे स्तंभ है। लेकिन उनकी चाहतों में किसी इंसान की जिंदगी पिस जाए तो सवाल बड़ा हो जाता है। जिस पत्रकार ने एक महिला की जिंदगी पर दाग लगाए वो कल थाने में फूट फूट कर रो रहा था। कह रहा था कि रिपोर्टर के रूप में स्थापित होना चाहता था। इसलिए हर बेइमानी को अपना लिया था। गलती उसकी जितनी है, उससे ज्यादा उस माहौल की है, जिसने उसे ये समझाया था कि पत्रकारिता इंसानी अधिकारों के ऊपर है।

स्टिंग पर लोकतंत्र के सारे स्तंभ सवाल खड़े करते रहे है। ये निजता पर हमला है। ये दवाब का हथियार है। ये टीआरपी की चाहत का नतीजा है। हर दिन चैनलों को स्टिंग के घटिया से बढ़िया फुटेज मिलती रहती है। वे कभी कभी बिना नापे तौले इन पर खेलते है। और कर देते है किसी एक जिंदगी को ताउम्र के लिए दागदार।

एक लालच ने उमा खुराना को अरोड़ा की बात मानने पर मजबूर किया। और एक लालच ने एक चैनल और एक नए पत्रकार से वो करवाया, जो केवल नाजायज ही नहीं, समाज के लिए खतरा भी है। एक बड़े चैनल पर चले एक स्टिंग के बाद एक छोटा अधिकारी संवाददाता को फोन करके कहता है। नौकरी से तो केवल सस्पेंड हुआ हूं। लेकिन धन्यवाद। अब सब जानते है कि मैं दलाल हूं। काम मेरे जरिए करवाए जा सकते है। मेरी कमाई बढ़ गई है। ये सच है।

बदनाम होने को भी नाम कमाना माना जा रहा है। समाज की सोच बदल चुकी है। विश्वास और खबर के नाते टूट चुके है। अब खबर के बाद क्या होगा ये खबर करने वाले को पता नहीं है। वो केवल या तो खानापूर्ति में खबरें करता है या उसे होना है नाम वाला। बदनामी की कीमत पर भी।

बीते दिनों सूचना एवं प्रसार मंत्रालय ने आंकड़ो के खेल को समझाने वाली कंपनी को चेताया है। चैनलों पर लगाम कसने की उसकी हसरत को चैनल अपने कर्म से बढ़ावा दे रहे है। वे भाग रहे है एक तमाशे के पीछे। और एक दिन इस तमाशे में मदारी के हाथ बंदरों की तरह नांचेंगे ये चैनल।

खबरों में मसाला दिखाकर वे जनता के साथ हंसने और टांट का रिश्ता बना चुके है। सूचना और मनोरंजन की देहरी पर वे नग्नना औरक अपराध दिखा रहे है। समाज को खुली आंखों से खून और देह बना रहे है।

स्टिंग की मर्यादा को भुला चुके चैनल अब असमंजस में है। एक ने दूसरे की गलती को भुनाना भी चालू कर दिया है। हर कोई नैतिकता के लिए काम कर रहा है। मानो सबने रामायण और महाभारत से कुछ सीख लिया है। चैनलों पर श्लोक तो नहीं कूटनीति साफ दिख रही है।

ये वो आगाज है, जो अंत के नजदीक जाती दिखती है। एक खबर को दूसरा काटे को समाज खबर पर विश्वास कैसे पैदा करेगा। और अगर विश्वास का संकट पैदा होगा तो समाज कहां देखेगा।

समाचार चैनलों को सोचना है। उन्हे देखना है। कि दिखाना क्या है। दबाव किस पर बनाना है। लाभ किसे पहुंचाना है। उसे पत्रकार बनाना है। खबर चलाना है। और ऐसा केवल विश्वास और समझ से हो सकता है। उम्मीद है कि कहीं तो कोई पत्रकारिता के लिए काम कर रहा होगा।

सूचक

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Saturday, July 21, 2007

हरिया के देश में हैरी पॉटर की जिंदगी

जिस देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी के ख्वाब देखता है, करोड़ो खर्च करके अंग्रेज बनना चाहता है. वहां हैरी पॉटर जिंदा रहेगा या मरेगा कितना बड़ा सवाल है। आज सुबह ये रहस्य टूटा कि वो जिंदा रहेगा।

टीवी चैनलों के आम दर्शक के लिए मिथक बन चुका ये फिक्शनल किरदार आज चाचा चौधरी और हमारे बिल्लू, पिंकी, नागराज, ध्रुव और किवदंती सरीखी रचनाओं से बहुत आगे है। चंद्रकांता संतति या किसी अलाद्दीन तो इसके आगे पीछे नहीं है। ये हम नहीं हमारी टीवी कहती है। एक अनुमान के मुताबिक हर खबरिया चैनल ने बीते दिनों में रोजाना आधा घंटा हैरी पॉटर को दिया है। मानो पूरा देश हैरी के बचने की प्रार्थना कर रहा हो।

क्या इसे उदारीकरण कह सकते है। नहीं। क्योकि एकपक्षीय आयातित किरदार का मायाजाल है। जिसे हम आप अब समझ कर भी अंजान है।

टीवी चैनलों को बालक और युवा होते वर्ग को अपने से जोड़ने के लिए इस मायाजाल में अपनी मौजूदगी दिखाना जरूरी है। बाजार में आठ सौ की किताब वो खरीद सकता है, जो इस बाजार के लिए बना है।

अरबों के व्यापार वाली किताबें और अंग्रेजी। क्या हम दिन प्रतिदिन अपनी समझ से कटते जा रहे है। जिस देश में कुछ करोड़ लोग अंग्रेजी के साथ जीते है, वे ही इंडिया है। हरिया को भूल चुके भारत में हैरी ही बचेगा और बिकेगा।

हमें बहलाने और डराने वाले खबरिया चैनलों के सामने जो दिक्कतें है वो समझ के बाहर है। लेकिन क्या बहुप्रचारित और बहुप्रतीक्षित उत्पादों को अपनाने के लिए केवल जनउन्माद ही काफी होंगे।

हैरी को जिंदा किवदंती बनाने वाली जे के राउलिंग के सामने इतिहास में हमेशा मौजूद रखने की चुनौती थी। और आज के टू मिनट मीडिया ग्लेयर का दुनिया में ऐसा सम्मानजनक अंत के साथ किया जा सकता है। सो उन्होने इसे सात किताबों में सिमटा दिया। ताकि आगे कोई हैरी पॉटर पर सीक्वेल भी न लिख सके।

देश को खबरों से आगाह कराने वाले खबरिया चैनलो को ये देखना जरूरी है कि हरिया की मौत के बाद भी उसकी बरसी वो करते रहे। ये हैरी की दुनिया में फिट नहीं बैठता। उसका मायाजाल हमारी कथाओं से बड़ा नहीं है। लेकिन जिस बाजार में वो बिक रहा है,वो हमारी आकांक्षाओं से बहुत बड़ा है।

सूचक
soochak@gmail.com


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Tuesday, July 10, 2007

"The Race of English News In India"

Welcome to the World on Indian English News. English sounds elite. So the caterer of English channels caters elite advertisements with choosy news. In a country where no single language reins, English market has immense possibilities. So the news has four national channels. National Channels. You can say, but in true means, the constitution of content and presentation is sometime like a Hollywood movie dubbed in Bollywod.

English news market has ruled by Times Now. As the stats says. The other competitors are good enough, but are over burdened. The tag they shoulders is the problem, the very pacy runner CNN-IBN is lagging, the masterstroke player NDTV is little succumbing.

Why? Headlines Today is never considered a news player? Why Times Now Rules? These are the current Questions hounded the market and the planner of the second, third placed channels.

At a time when the serious journalism is a miracle type of expression, English channels cater a good some of serious news and variety, you can see all this on their websites. But this is the cliché. Why a viewer is get bored?

News is a serious business and the players are so serious about it. After launching Headlines Today , the channel CEO quote this - G Krishnan, CEO, TV Today Network, said, "Our news channel offers quality programming to its viewers, and would certainly be accepted by them. Any other channel that comes into existence will have to create a niche for itself. This is possible only if the channel understands the pulse of the target audience and plan accordingly."
And after passing four years in market, they are only on Television, not in viewers mind and choice.

What exactly this tells? Come to NDTV, the English niche channel. At a time it was market leader. And currently surviving for its image. They actually become Bata of the market, which hold good image and have loyal viewers. But can it works in a market. Especially in future.

CNN-IBN has started with, Whatever it takes, so they can give all they have! You see they have so many distinct programmes and left little space for live news!

Come to the real picture, why Times now is No.1. The tag they follow is NOW. And it works slowly. The colors they use are dark (Red& Blue). Which shows vibrancy and alarm ness, and at the end they are almost live in passion. They devout very much time in politics and have long discussion.

This is not all, they translate the Hindi formula. There slotting is according to Hindi News channels, like they have a women show at 2:30 pm. And after all people change their taste!

Surely the war of news is not going to cake pie revenue share. English viewer is little choosy always and not follow the dictum. And this is why they change their taste.

One more thing to add is The Times of India Effect. The paper has immense effect on India English Journalism. And the group is promoting the news channel from the launching day. People gradually attach them selves to this intention of the group.

NDTV and CNN-IBN has a chance to play the game indirectly. It includes a heavy outdoor Advertising, People Campaign and less focus on programming. Channels are for News and when you portray yourself an epic, don’t write slogans then.

The new funds of web journalism and Citizen journalism is not very close to viewers, so do your level best but show, the benefitable content.

CNN-IBN lagging is mostly due to the brand they attach with them is not very much reputed. After Iraq, CNN is supposed to embedded.

Here Times Now has a leap, Reuters. So they use as much as they can. Reuters has many Indian reporters, this converts into local attachment.

English news market is not saturated, like Hindi is. So the upcoming channels have a space to play. But if the runners didn’t play the game rightly, they loose in future.

'Soochak'
soochak@gmail.com

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Monday, July 02, 2007

भूत और कामुकता के बीच विज्ञापन

भागो भूत आया। अरे भई ये भूत अमिताभ बच्चन का है। और वो भी कैडबरी चाकलेट के प्रचार में। क्या टीवी के भूत अब तीस सेंकेंड वाले प्रचारों में आ गए है। स्वाद के दीवाने ही जाने। बहरहाल भारतीय टीवी पर्दे पर दिखने वाले प्रचारो की किस्में बांचने वाले आजकल तकनीकी, अंधविश्वास, साहस और कामुकता के बीच डोल रहे है। मिरिंडा के प्रचार में जाएद खान एनिमेटड कैरेक्टर में बदल जाते हैं तो थम्पअप के एड में अक्षय कुमार किसी स्पाइडर मैन को भी मात देते है। वहीं अमूल माचो ने तो कामुकता को धोबी घाट पर ही धो डाला। एक धोने वाले साबुन और डिटर्जेंट ने सबको कन्फ्यूज ही कर दिया। रिन अब सर्फ एक्सेल हो गया है। मतलब। मतलब की उन्नीस रूपए का साबुन। कपड़े धोने के लिए।

टीवी पर अब कार के प्रचारों ने काफी जगह घेरी है। तमाम ब्रांड अपनी अपनी खासियतों से लैस कार को टीवी पर ब्रेक लगा रहे है। दूसरा स्पेस घेरा है होम अप्लाएंसस ने। घर में हर चीज केवल एक शब्द से। ईएमआई।

पंखों के प्रचारों मे आजकल बेतहाशा बढ़ोतरी देखी जा रही है। मानो पंखे से तनाव, पंखे से यौवन और पंखे से ही ताजगी आती है। आती है जनाब पर उस ग्रे मार्केट का क्या करिएगा, जो आज ब्रांडेड की आधी कीमत में भी हवा देता है।

वैसै एपेनलिबे के शेरो शायरी वाला प्रचार देखकर मन थोड़ा मीठा जरूर हो जाता है। वहीं दांतो की चमक से रास्तो को गुलजार करने वाला प्रचार अनोखा और बदहजमी जैसा दिखता है।

हवाई यात्रा के अनुभवों से रूबरू जनता को लुभावने एयर होस्टसों को तैयार करने वाली कंपनियों के एड जरूर भाते होंगे। कोई हवा में उड़ना चाहता था तो कोई इसे अपनी चाल से ही ये जता देता है कि वो खास है।

खास अंदाज में पानी की छींटे रंगीन अंदाज में टपका टपका कर रिलायंस की बातों के रंग एक गीला गीला सा अनुभव पैदा करते है। बातचीत में रंगीनी तो समाज में कुछ और ही मानी जाती है वैसै। प्रेमियों को रात भर बात करने की आजादी का ख्याल मोबाइल कंपनियों ने सदैव रखा है भई। चक दे फट्टे और मोबाइल की चोर को सुविधा देने वाले प्रचार मोबाइल की अहमियत बता रहे है।

कुछ प्रचारों के साथ ब्रांड इमेज जुड़ी होती है।जैसे मयूर और च्यवनप्राश के सारे एड। मयूर का चेहरा तो सलमान खान हो गए है तो अमिकाब बनाम शाहरूख की लड़ाई च्यवनप्राश और कुछ सूटिंग शर्टिग वाले विज्ञापनों में देखी जा सकती है।
टीवी को दिखाने की एक और लड़ाई जारी है। डीटीएच के जरिए। टाटा स्काई लगवाए या डिश टीवी। डायरेक्ट प्लस, डीडी वाला भई, को तो कोई पूछ ही नहीं रहा है।

टीवी से कम्पूटर के खरीदार भी खूब बन रहे है। लिनेवो को आपको खोने के बाद भी पहचानने का दावा करता है। और काम्पैक का दुकानदारी शाहरूख बढ़ा ही रहे थे।

लेकिन जिस सेक्टर ने सबसे ज्यादा टीवी को घेर है वो घर का मामला है। घर बनाना है। रिएल स्टेट में तो इतने नाम आ गए है कि यहां उन्हे गिना पाना आसान नहीं है। रेडियों में तो वे हर गाने के आजू बाजू खड़े है।

तो क्या हम सूचना के बाढ़ में तैर रहे है। हमारे आस पास की इमारतों नें खिड़किया कम नजर आने लगी है। प्रचार के बोर्ड ज्यादा हो गए है। आकाश के बीच में एक बड़ा सा आउटडोर एजवर्टाइजिंग का बिलबोर्ड टंगा है। जो बताता है कि हम बनाए आपका जीवन सुंदर।

दरअसल पेपर वालों से लेकर टीवी-रेडियो-इंटरनेट वालों तक सबको रोजी रोटी देने वाले विज्ञापन आज उत्पाद की हर दुकानदारी में लगे है। आपकी नजर में बने रहना ही उनकी जरूरत है। और इसके लिए आपको चौकन्ना करना इनकी जिम्मेदारी है। आने वाले दिनों में आपके मोबइल पर इनका कब्जा होना है। और फिर आपकी निजी जिंदगी में ये हर पल कहते रहेंगे कि वेअरएवर यू गो, आवर नेटवर्क फालोज।

Soochak
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Wednesday, June 27, 2007

टीवी को है किसकी सुध

एक ऐसा खांका जो भारतीय राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मीडिया की आंखे खोलने को पर्याप्त है। ये एक ऐसा सच है जिससे हमारे देश का टेलीविजन मुंह मोड़ चुका है। आज के समय में अगर वजहें तलाशी जाएं तो हम केवल एक शब्द में सिमट जाएंगे। बाजार। जहां मॉल है, उत्पाद है, सेल है, शहर है। यहां गरीबी का अभाव है। यहां कल का अभाव है। आज में जीने वाले बाजार को आज का टीवी परोस रहा है। हर दिन का तमाशा तय है। हर दिन के फिक्स्ड प्वाइंट चार्ट भी डिसाइड है। कैसे खबरों को दरकिनार करके समाज को वो दिखाने की होड़ लगी है, जिसे आज से पचास साल पहले सौ साल पहले हमारे कर्णधार दकियानूसी बता चुके है। वे तब धारा के खिलाफ थे। आज हम धारा के बीच है। आज टीवी पर अंधविश्वास है, टोना टोटका है, अंधविश्वास की भुतहा पेशकश है, तंत्र मंत्र है, अपराध है, ज्योतिष है, नाजायज संबंध है, सेलेब्रिटी की पल पल की गतिविधियां है, शहरों की चमक है, बहसे मुबाहिसे है, एसएमएस पोल है, नेताओं से जुड़े हल्के किस्से है, फिल्म है, फूड है, सेक्स है, क्राइम है, और है तमाम नाकाबिले बर्दाश्त की जाने वाली पेशकशें।

तो आखिर हम कहां जा रहे है। कभी कभी अच्छी खबरों की टाइमिंग देखकर लगता है कि चैनल भी न चाहते हुए उन्हे चला रहे है। हर राजनैतिक खबर पर तंज का भाव दिखता है। हर बेरहमी में नाइंसाफी की चीखो पुकार। और हर गलती पर बस फांसी देने का सुर।

क्या सामाजिक तौर पर जिम्मेदार इन समाचार चैनलों को ये बताना पड़ेगा कि हम एक विविधता वाले देश है, जहां धर्म, कर्म और मोक्ष के बाद चीजें मायने रखती है। सुख शांति और समृद्धि के लिए आज माध्यम कई है। लेकिन टीवी से जुड़कर आप सबसे कट जाते है।

एक टीवी को नैतिक रूप से क्या होना चाहिए, तय होना बाकी है। तबतक एक विदेशी चैनल की सुध देखिए। जो काम हमें रोजाना करना चाहिए वो, वे कभी कभी करते है। अनुरोध है इस प्रयास को यूं ही न आंकिए। उन्हे भी बाजार देखना है। और भारत की गरीबी दिखाकर बाजार नहीं जोड़ा जा सकता। तो क्यों भारतीय माध्यमों पर मर चुके इस मुद्दे को वे दिखा रहे है।

जवाब। पत्रकारिता और सरोकार है जनाब।
Agricultural Problems Lead to Farmer Suicides in India

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Monday, May 07, 2007

टीवी के तीन चेहरे

दहेज हत्या, बच्चों की जान की चिंता और आज का दिन जानिए। बीते दिनों में टीवी पर ये तीनों ही छाए रहे। दिल्ली और आसपास के इलाकों में दहेज को लेकर एक अजब सा माहौल पनपता जा रहा है। कई कई सालों से शादीशुदा जोड़े अपनी शादी को तोड़ने पर आ गए है। क्यों। जीवन के तनावों को दूर करने का माध्यम अब शहर को लोग पैसे को मान चुके है। ज्यादा पैसा कम परेशानी। किसी के पास चार पहिया नहीं है, तो किसी को धंधे के लिए और पैसे चाहिए। सो जब उन्हे अपने आसपास से पैसा नहीं मिलता, तो वे समाज की एक ऐसी कुरीति का दामन थामते है, जिससे वे परिवार को दांव पर लगा रहे है। टीवी पर दहेज अत्याचार से जुड़ी खबरे आई, लेकिन किसी में भी गहनता से ये नहीं दिखाया गया कि असली वजह क्या है। पर जिस एक वजह को टीवी ने दिल से छुआ, वो रही देश भर में इलाज की वेदी पर सिसक रहे बच्चों की। कही किसी के दिल में छेद है, तो कही किसी को कैंसर। कही कोई अनाथ रेल के डिब्बे में पड़ा मिला, तो कही उसे अपनाने की ललक समाज में दिखी। कुल मिलाकर इस सारी पेशकश में एक चरित्र तो साफ हो गया कि भारत में भावनाए अभी भी बहती है। टीवी ने कम ही बार इसे समझा और दिखाया है। लेकिन इससे गाहे बगाहे भला उनका हो जाता है, जो सचमुच किसी की मदद करना चाहते है, या हैसियत में है, लेकिन शुरू कहां से करें, ये नहीं जानते। कुल मिलाजुलाकर इस सारे फसाने ने एक दर्द को हवा दी है, कि बिलखते बच्चों का कोई तो खैर करें। टीआरपी की चाह के बावजूद भी ये सराहनीय रहा। और भविष्यगामी भी। भविष्य बांचने वालों की तो चांदी हो चली है। हर चैनल पर वे बहस रहे है। आज आपका दिन रहेगा, ऐसा, वैसा, कैसा। लेकिन ज्योतिष और तमाम भविष्य बांचने वाली विधाओं को स्टूडियों की चांदनी में पेशकर टीवी चैनल देश को किस ओर ले जा रहे है, पता नहीं। क्या देश की आधुनिक पीढ़ी इसे देखना चाहती है, या एक प्रोफेशनल अपने काम को अब राशि और रत्नों से आंकने लगे। क्या देश की राजनीति अब ग्रह नक्छत्र औऱ कुंडली के हिसाब से अपनी जननीतियां तय करें। या किसी घर में क्या पके, ये भी अब राशिवक्ता बताएंगे। बुरा है। बहकाव है। आप किसी भी ग्यान पर भरोसा कर सकते है, अंधविश्वास नहीं। देश को आगे ले जाने वाली खबरों की जरूरत है। देश को ये देखना है कि सुबह सवेरे कैसे प्रकाश जीवन को बदल रहा है। कैसे ग्रह नक्छत्र नहीं। मैं अतिश्योक्ति नहीं बांच रहा हूं। आप आनलाइन या एसएमएस सर्वे करा लीजिए। नतीजे आ जाएंगे। वैसे हां ये जरूर सत्य है कि ऐसे तमाशे चलते रहे तो आने वाले दिनों में तमाम समाचार चैनल विरोधियों को पछाड़ने के लिए यग्य, मंत्रोच्चार आदि कराने लगे। ऊं आजतकाय नम, ऊं स्टार न्यूजाय नम आदि आदि। वैसे मजाक ही सही, पर क्या किसी चैनल से किसी खबर को दिखाने के लिए किसी ज्योतिषाचार्य से पूछा कभी। नहीं न। तो क्या जरूरत है, जनता को हर दिन सचेत करने की। ऐसे देश में जहां कर्मण्येवाधिकारस्ते जपा जाता हो, वहां रोजाना कर्म से ज्यादा भविष्य को बताना घातक ही होगा। वैसे टीवी को जरूर आ पड़ी है इसकी जरूरत। यानि जल्द ही आपको चैनल विशेषग्य पंडित मिलने लगेंगे।

सूचक
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Wednesday, May 02, 2007

टीवी की भाषा क्या हो।

टीवी की भाषा क्या हो। ये सवाल अब टेलेविस्टा या बेलटेक जैसा है। किसी पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में रंगीन फिल्म देखने जैसा। पर सवाल बड़ा है। क्यूं। क्योंकि टेलीविजन आडियो वीडियो जनसंचार माध्यम है। या इसलिए कि सुनकर ही समझने की कमजोर स्थिति में आप आ पहुंचे है। विजुअल मीडिया के तौर पर टेलीविजन की ताकत दृश्य होने चाहिए और आडियो-वीडियो के तौर पर दोनों। आज भी सभी आडियो-वीडियो माध्यमों- विग्यापन, फिल्म- में स्क्रिप्ट की बड़ी भूमिका बाकी है। तो टीवी के साथ क्या हुआ। क्या टीवी की कोई भाषा बची है। या कहें कि कभी बनी ही नहीं। भाषा का विकास टीवी में प्रिंट मीडिया की बड़ी देन है। लेकिन अब ये विजुअल से प्रिंट की ओर बह रही है। आप कहेंगे कि विरोधाभास सा है। लेकिन जिस भी भाषाई आडंबर को टीवी ने गढ़ा है, वो आज आपको बोलचाल, लेखनी में नजर आने लगी है। दरअसल जितनी खींचतान प्रिंट में भाषा और शैली को लेकर हुई है, उसका निचोड़ टीवी के पास है। सरल, सपाट और सीधी भाषा। आपसी संवाद की भाषा। आम बोलचाल की भाषा। लेकिन यहीं से टीवी ने खुद को सीमाओं में कैद कर लिया। और एकरेखीय संस्कृति और धरोहर को बार बार गढ़ने को मजबूर भी। आज टीवी के पास विरासत जैसा कुछ नहीं है। कम से कम भाषा तो नहीं। अगर दशकों से भी देंखे तो किसी दशक की देन कृषि दर्शन है, तो किसी की बुनियाद। और इन सबकी एक तरह की भाषा थी। और अगर संस्कृति से देंखे तो रामायण और महाभारत। और अगर शैली से देंखे तो आधे घण्टे का आजतक। तो क्या चैनलों की बहुतायत से भाषा मर रही है। या कहें कि रिपीट दर रिपीट हो रही है। नहीं। आज आपके पास पचासों सिर पैर वाले धारावाहिक है। सैकड़ों खबरों से भरे समाचार चैनल है। समाज पर भाषाई व्यंग्य करते टीवी हंसोड़िए है। और हर दिन भाषा की खिचड़ी बनाने वाले विग्यापन मौजूद है। तो विविधता क्यों नहीं दिखता है। सारे मनोरंजन चैनल एक से, सारे समाचार चैनल एक से, और सारे विग्यापन प्रभाव क्यों नहीं छोड़ते। आप रिमोट पर ऊँगलियां रोक नहीं पाते। दरअसल टीवी की क्रिएटिविटी खत्म हो रही है। आपके पास विचारों का खालीपन आ गया है। और जो विचार जिंदा है उनकी भाषा तय हो चुकी है।जो भी नकल आप परोस रहे हैं उसमें आपकी अक्ल भले ही अलग हो, पर भाषा वहीं है, जो असल ने अपनाई हुई है।

तो अलग कैसे पैदा हो। और क्या भाषा के स्तर पर बदलाव लाकर टीवी में क्रियात्मकता सुधारी जा सकती है। शायद हां। ये छायावाद से आधुनिक युग की ओर बढ़ने जैसा है। (अर्थ न लें, भाव स्वीकारें)

सोचिए किसी खड़ी बोली हिंदी चैनल में आप एक आंचलिक प्रस्तुति या इलक से किस कर मोहित हो जाते है। हिंदी की खड़ी बोली होना कर्म जैसा है , मर्म जैसा नहीं। उसका रूखापन किसी भी प्रस्तुति को सीमित कर देता है।

तो बात सरल सपाट या सीधी की नहीं है। बात भाषा को करवट और खोलने की है। भाषा को दृश्य सो जोड़कर दिखाना एक कला है, विग्यान है, कोशिश है। लेकिन दृश्य को पैमानों में बांधने की भूल करना भाषा के साथ खिलवाड़ है।

टीवी की लोकप्रियता के बदलते मानकों के दौर में निश्चित ही भाषा केवल संवाद का माध्यम है। आज व्यक्ति बड़ा है, संस्थान बड़ा है। और उत्पाद की कामत बाजार से है। ऐसे में टीवी के कदम अगर भाषा के फैलाव की ओर बढ़े, तो उसे एक ऐसी सुविधा होगी, जिसका इंतजार उसे कई दशकों से रहा है।


सूचक
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Friday, April 27, 2007

आपकी बीमारी, मेरी खबर है

देश की तबीतय कैसी है। इस सवाल के सीधे अर्थ राजनीतिक लिए जाते है। और अगर इसे हर भारतीय की तबीयत से जोड़ा जाए तो मायने अनोखे ही होते है। लेकिन व्यक्तिगत बोलचाल में तबीयत तो ठीक है न, का पूछा जाना जो बताता है, वो ही हमारा मतलब है। देश में हर मर्ज का इलाज है, लेकिन बीमार बढ़ते जा रहे है। किसी के पचास लाख है तो किसी के आठ लाख। एचआईवी से लेकर कैंसर ने मानो अब भारत का रूख किया है। लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल जिस गति से टीवी, रेडियो जैसे सरल जनसंचार माध्यमों ने प्रसार पाया है। उसी गति से इनसे सूचना को फैलाना भी सरल हो चला है। लेकिन यहीं सवाल खड़ा हो रहा है। इस सूचना जागरूकता के अभियान से किसका हित है। बीमार का या सरकार का। एनजीओ का या विदेशी दवाई कंपनियो का। सवाल सीधा है, लेकिन जवाब टेढ़ा। पिछले चार पांच सालों में यकायक आपको लगा कि एचआईवी और एड्स आपके नजदीक खड़ी है। और अनजाने या गलती में एक कदम के बाद आप भी किसी प्रचार का हिस्सा बन जाएंगे। यकायक लगी कि कैंसर की भारतीय प्रजातियां बढ़ गई है। यकायक बर्ड फ्लू ने लाखों मुर्गियों को आहार बना लिया। और एक ओर मलेरिया, हेपेटाइटिस और डायरिया शांत शिकार बनाते रहे। ये मौजूद थे, और आंकड़ो में ज्यादा जिंदगिया लील रहे थे, लेकिन जागरूकता अभियानों में केवल वे बीमारियां शामिल है, जो विदेशी ज्यादा है।

टीवी को क्या दिखाना है सवाल इसका है। अभी जो स्थिति है उसमें उसके पास किसी भी बीमारी या नशे को प्रति जागरूकता फैलाने वाले विग्यापन तो खूब है, लेकिन खुद की पैदा की गई स्टोरीज का अभाव है। जिसकी वजह से एक गैप आ गया है। दर्शक को समझा पाना कि आप भी कई तरह की बीमारियों के पास खड़े है, केवल विग्यापनों से मुश्किल है। लेकिन टीवी समाचार के दायरे में हेल्थ स्टोरीज का संसार छोटा है, कहें कि अल्प है।

किसी बीमारी को आप तक पहुंचने और उसे शांति से आपकी जान लेने के बाद भी टीवी या सरकार नहीं चौंकती। जब पीड़ितों की संख्या इतनी हो जाए कि खबर बन सके तो आप पाते है कि हर दिन आंकड़ो में आप गिने जा रहे है। तीन दर्जन मरीज आज भर्ती हुए। ये तर्ज भेड़, बकरियों और मुर्गियों को गिनने जैसा है। अट्ठावन जानों का जाना और छह दर्जन बीमार में फर्क है। और टीवी इसे समझने से दूर होता जा रहा है।

बहरहाल बीमारी कोई भी हो, इलाज कैसा भी हो, जब तक हम और आप जानकारी नहीं रखेंगे, तब तक इलाज और मरीज का फासला बड़ा ही रहेगा। सूचना देने वाले की बांट जोहने से अच्छा है कि आप खुद एक कदम बढ़ाएं और सूचना तक पहुंच जाएं। अस्पताल जाना केवल बीमार के लिए नहीं, जानकारी के लिए भी शुरू कर दें। क्योंकि आपकी बीमारी किसी की खबर बनें, इससे ज्यादा पीड़ादायक कुछ नहीं होता।

सूचक
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Wednesday, April 18, 2007

टीवी की कमजोरी पर हमला

बड़ी चिक चिक मची हुई है। लोकतंत्र पर हमला करार दिया गया एक समाचार चैनल पर हालिया हमला। कुछ ने कहा ये फलां है, कुछ ने कहा कि चैनल की किस्मत थी। खैर तोड़ फोड़ हुई और इसे आप विरोध के तौर पर कतई उचित नहीं कह सकते। पर बड़े सवालों पर किसी का कोई ध्यान नहीं गया। क्या टीवी देखने वाला टीवी की ही तरह सीमित सोचने लगा है। शायद हां। कहा गया है कि डिफाइन इज़ द लिमिट। और टीवी ने खबरों को मनोरंजन के तौर पर डिफाइन करके आपको भी नकली हंसी औऱ नकली आंसू बहाने की स्थिति में ला दिया है। किसी भी जनसंचार माध्यम पर हमला या उससे जोर जबरदस्ती पहली नजर में दबिश ही मानी जाती है। खबर को दबाने या चलाने के बाद गुस्से की प्रतिक्रिया। प्रेस को स्वतंत्रता चाहिए, औऱ उस पर वार लोकतंत्र पर वार सरीखा होता है। यानि कि गलत कदम। लेकिन अगर ये प्रतिक्रिया किसी ऐसी घटना के बदले की जाए जिसका देश के आम आदमी के मौलिक अधिकार से ताल्लुकात हो तो। तो बात को विचारधारा की कट्टरता या एक झुंड की मूर्खता माना जा सकता है। और मानने की जरूरत ये है कि इस घटना से मीडिया की ताकत नहीं कमजोरी जाहिर की है। कमजोरी। एक ऐसी कमजोरी जिससे मीडिया का नाता खत्म होता जा रहा है। सामाजिक सुरक्छा की कमजोरी। बताइए। आप किसी जनसंचार माध्यम में कार्य करते है। और हमले में आप घायल होते है नुकसान झेलते है और एक खबर बन जाते है। तो क्या इससे आपकी भावना और मजबूत होती है। आगे ऐसा करते रहने के प्रति। खबर को उसी दृढ़ता से दिखाने के प्रति। या इसे आप केवल इस तौर पर देखने लगेंगे कि जब संस्थान ही सुरक्छित नहीं तो हम क्या होंगे। और इससे भी बड़ा सवाल, जो जोड़ा भागकर समाचार माध्यम के पास आया। इस आशा में कि उसे अधिकार मिलेगा, आजादी मिलेगी और एक मिसाल कायम होगी। उसका क्या। देश में कुंवारी उम्र में प्यार की पींगे बढ़ाने वाले लाखों जोड़ों को क्या अब रास्ता दिखा है। या डर बैठ गया है कि जब किसी पत्रकारिता संस्थान पर हमला हो सकता है, तो हमारा क्या होगा। हम कहां जाएंगे। पूरे देश में प्रचार पाने के बाद। कमजोरी। ये है टीवी की। उसने समाज को मजबूत नहीं किया। बदला नहीं। प्रवृत्तियां नहीं बदली। मानसिकता नहीं बदली। औऱ इसके बीच मीडिया हक को दिलाने की पैरवी करने लगा। पैरवी और जिरह। जिरह उस समाज से जो कई खांचों में बंटा। जाति, पाति, धर्म, कुनबा औऱ सोच में। तो कैसे माना जाए कि पत्रकारिता की जिस ताकत से आप समाज बदल सकते थे। उसी का बेफिजूल उपयोग आपने मजबूती पा ली है। कमजोर हो गया है हर वो आदर्श जिसके बदौलत आप मिसाल बनाते थे। रसूखों के गुमान तोड़ते थे। औऱ सामाजिक विकृतियों को बदलते थे। तो यानि हमला इसी कमजोरी पर हुआ है। और इस कमजोरी को टीवी ने खुद पैदा किया है। और कमजोरी को ताकत में बदलने के लिए जिस बदलाव का हिमायती होना चाहिए, उससे बहुत दूर हो चला है टीवी। तो प्रेम को अधिकार दिलाने की इस लड़ाई में न तो जोड़ा जीता, न ही टीवी।

सूचक
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Wednesday, April 11, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा(टेलीविजन)

रूकावट के लिए खेद है। रूकना तो दूर अब टीवी ने इतनी तेज गति पकड़ ली है कि सफर कठिन होता जा रहा है। स्वागत है आपका एक ऐसे समाज में जहां ये कहना कि टीवी आईना है, धुंधलका फैलाना जैसा होगा। टीवी ने देश में पचास साल से ज्यादा समय बिता लिया है। और निजी चैनलों ने तकरीबन बीस साल। बीस साल बाद क्या होगा। कल्पना करिए। आपकी टीवी आपके हाथ में होगी। आप केवल वो देखना पसंद करेंगे, जो समयखपाऊ न हो और कंटेंट पर आपकी मर्जी चलेगी। कंटेंट। देश में जब टीवी ने शुरूआत की, तब माहौल देश में जागरूकता लाने का था। उसने ये भूमिका निभाई भी। निजी चैनलों ने अपनी शुरूआत ही मनोरंजन से की। हालांकि सोप ओपेरा का पूरा तमाशा फैलाने में सरकारी चैनल ने ही प्रथम की भूमिका निभाई। शांति और स्वाभिमान के जरिए। लेकिन ये खाली वक्त में घरेलू महिलाओं को किसी तरह के मोहपाश में बांधने की कोशिश नहीं बन पाया। पर निजी चैनलों ने वो कर दिखाया जो आज नशा है, जरूरत है और है भरपूर तमाशा।

समाचार क्या है, खबर क्या है। ये कोई भी हाईस्कूल का लड़का नहीं जानना चाहता है। पर आज वो समाचार चैनल देखना चाहता है। क्यों। मल्लिका है, शाहरूख है, फिल्म है, गाना बजाना है, रेप है, गैंगवार है और है भरपूर क्राइम। जो दिखता है, वो बिकता है। यानि असली भारत दिखना बंद हो गया है। सो बिकना भी। टीवी ने इस जुमले को जिस करीनेपन से भुनाया है, उतना फिल्म वाले भी न भजा पाए। आज का टीवी विविध है, मनोरंजक है, उथला है, पर मौजूद है। वो आम आदमी को खबर बनाने की ताकत रखता है, पर समुदाय के सामने झुक जता है। वो कड़ी जबान में सत्ता का सामना करता है, पर सत्तासीन व्यक्ति को लुभाता रहता है। वो बाजार के उत्पाद पर खबर करता है, नकारात्मक भी, पर प्रचार पाने को कम खबरें दिखाता है। वो आम आदमी को अपनी एक्सक्लूजिविटी का अहसास कराता है। और उसके दरवाजे पर घुसने की हिम्मत नहीं पैदा होने देता है। एक खबर की मौत क्या होता है, ये आप किसी भी पेश होने वाली खबर के तौर तरीके से समझ सकते है। टीवी की मौत क्या होती है, इसे जानने के लिए आप दिन भर टीवी देखकर समझ सकते है।

आज देश में तीन सौ के करीब चैनल है। हिंदी के पचास के करीब। औऱ रीजनल भाषाओं के सौ के करीब। यानि पलड़ा भारी है भाषाओं का। और पलड़ा भारी है उन खबरों का, जो मौका और दस्तूर तो निभाते है, पर सूचना नहीं, ग्यान नहीं। तो बदलते वक्त की नब्ज भांप कर भी टीवी ने भले ही चोला बदला हो, लेकिन ये रंगबिरंगा ताना बाना क्या बना रहा है, ये समझना भी मुश्किल नहीं है। नई पीढ़ी को देखिए। वो टीवी कब देखता है। रात को। आधी रात को। तेज स्वर में। हर सेंकेंड में उसके लिए छह बार फ्रेम बदल जाते है। वो चार सेंकेड़ों की जिंदगी जीता है। वो चैनलों को गियर जैसा बदलता है। वो कैमरे के फ्लैश सा चमकता है। वो टीवी इतना ही देखता है।

टीवी ने जो बदलाव लाए है, वो इतिहास का हिस्सा नहीं हो सकते है। टीवी ने जो दिया है, वो याद करने लायक नहीं है। टीवी ने जो रचा है, वो कपोलकल्पित संसार सच से बहुत दूर है। करीब है तो आपके दर्द में उनके बेतुके, असंवेदनशील सवाल। मौके पर खड़े होकर अ अ करके देते जवाब। और आपको बता दे कि....का राग। आप जान चुके है। और जागरूक हुए आपको तकरीबन बीस साल हो चुके है। तो अगले बीस साल बाद आप क्या देखना चाहते है, ये तय कर लीजिए। क्योंकि टीवी एक मशीन है, और सोचना आपका काम है।

सूचक
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Tuesday, April 10, 2007

तेरह मिनट में सिमटे विकासशील देश


तो क्यो देंखे टीवी। ये सवाल बार बार दस्तक देता है। हाल ही में टीवी देखा। दिखा। मनोरंजन के बाहुपाश में सिसकता समाचार। और तो और हर पल इधर उधर से अपनी मौजदूगी दिखाने वाला बाजार। खैर। हमने जब ये जानना चाहा कि तीन दिनों तक आठ देशों के बीच चलने वाले सार्क सम्मेलन का क्या हुआ। तो नतीजा कुछ मिनटों में निकला। तेरह मिनट। सारे निजी समाचार प्रदाताओं ने मिलकर इस भूराजनौतिक सम्मेलन को मात्र तेरह मिनट में सिमटा दिया। तेरह मिनट में सारी विकासशील दुनिया। अच्छा है। कौन जानना चाहता है। अब आईएएस की तैयारी करने वाला तो टीवी देखता नहीं है। और तमन्नाई लोगों को क्या मतलब है आप पड़ोस के मुल्कों से। वे तो अमेरिका और पश्चिमी देशों की सुध बुध जानना चाहाते है। क्या यही सच है। जो हमें टीवी पर दिख रहा है। जिस सरकारी चैनल को भारत में कई करोड़ लोग बिना असुविधा के देखते है, उसने तकरीबन तीन घण्टे दिखाया कि क्या हो सकता है इस बैठक और मिलने जुलने का नतीजा। वैसे अखबार की मौजूदगी औऱ साप्ताहिक पत्रिकाओं के लेखों से आप जान सकते है कि क्या हुआ। पर क्या इस वजह से टीवी की जिम्मेदारी घट जाती है। क्या इस वजह से आप प्राइम टाइम में मजाक बनने को तैयार रहते है। हंसने हंसाने को हर चैनल ने हंसोड़ियों को गांठ लिया है। उन्हे केवल देश के गिरती चीजों की खस्ताहाली की चिंता है। क्रिकेट और फिल्म की। वैसे शायद यही बिकता है। मुद्दे पर लौटते है। तो तीन दिन चले इस चौदहवें शिखर सम्मेलन में नया सदस्य देश अफ्गानिस्तान भी था। और साथ में पश्चिमी पर्यवेक्छक। पाकिस्तान ने कश्मीर का राग अलापा। नौ देशों के सौ से ज्यादा लेखकों ने अपनी अपनी बांची। साउथ एशिया फूड बैंक और यूनिवर्सिटी बनाने औऱ आतंकवाद पर साझा सोच बांटी गई। इसके अलावा भारत ने पड़ोसी देशों के लिए एकतरफा रियायतों की भी पहल की। कुल मिलाकर बिना किसी विवादित विषयों के ये सम्मेलन बीत गया। पर इसमें जो भी हुआ उसे टीवी पर जानना संभव नही रहा। दुख की बात है। और सोचने की भी।

सूचक
soochak@gmail.com

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiHqJAQi_eTp8nOmd3zhOIRTqz7byx8VVLdVkSmlMuJMzFm8kjlWR2jpuoirQVjbH-4pjWJi97uDvBtchbH_L03rqXWQ3Ly4VrEoYKvCoA54Edtrn5PE_TQ-kWpWeV9CX_Y3yEC/s1600-h/Saarc+summit.bmp
http://outlookindia.com/full.asp?fodname=20070416&fname=Saarc+%28F%29&sid=1
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070403_saarc_delhi.shtml

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Wednesday, March 14, 2007

Rating of Televison Viewership.

"The words Dr. N. Bhaskar Rao said are true to the scenario and the fate of Television in India. It is necessary for us to promote this with 'you'. You, the viewer, the receiver and the follower. Hope you agrre that TV is not bound to TRP. The Social Responsibility factor is more adamant". Inhale these words for the better sake of Televison News viewership….

Media Yug

Dr. N. Bhaskara Rao’s Observations introducing the topic to the CMS National meet on TV viewership ratings at India International Centre, New Delhi, March 7, 2007

Welcome:

1. As is the practice at CMS, I would like to say at the very outset that this programme is being organized independently on our own – not at any one’s instance. There are no sponsors, nor is there any conflict of interest.

2. CMS started 17 years ago as a methodology research agency, having earlier pioneered readership and viewership studies. CMS organized more than a couple of discussions and workshops on research methodologies here at IIC and written extensively about audience measurement.

3. In fact, CMS had developed with in the country more than a decade ago, in collaboration with ECIL a meter and methodology for studying viewing patterns. However, after demonstrating, it gave up for viability reasons and also because of DD’s shortsighted out look that it should get endorsement of advertisers.

4. No body would say that we do not need to viewership studies. In fact, we need to put more serious efforts and spend more for this so that we have more reliable research beyond temporal purpose. Ratings of course facilitate advertisers and ad agencies by simplifying their work and optimize the advertiser’s spend. But when they are publicized as the benchmarks, we need to be concerned about their inclusiveness and the consequences of such ratings in the larger context. That is why; we need to be discussing basic issues to do with television as the most powerful media. And any such research should help enhance the very reach and maximize potential of TV, improve level playing opportunities, encourage citizen’s participative role, and help think beyond day to day top-of-the-mind aspects of viewership, going beyond whether the TV set is on or not and who is around the TV.

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You will recall the poser of Finance Minister Chidambaram a day after presenting his budget as to what he said how “instant coverage” of channels of budget was misleading.

5. Recently we were on a committee on environmental sensivity promotion, where in a young consultant from ad world had given a prescription to the Ministry that its TV based programmes should be evaluated using TRPs as the criteria and the Secretary of the Ministry went along innocently, not relishing what it meant to the core objectivities of the Ministry to the core objectivities of the Ministry.

6. Some time ago in one state capital, we held a conference about recent paradigm shift in media operations. When one channel CEO referred and shared with the gathering about a prescription given to his channel by their market research consultant on what should be programme priorities using TRPs and he also gave the channel a programme formula to get higher TRPs in writing.

7. With recent proliferation of television channels, the percent of unreached people in the country should have gone down substantially, But has it? It has not. By and large it remained stagnant. What does it imply. The chase for viewership is in fact for the deep pockets although that is bound to be. But than the phenomena in operation here too is the same -- “rich becoming richer”.

8. I had the opportunity to see recently a presentation of aMap a new rating agency, and earlier, a couple of years ago, of TAM, the agency that has been the sole rating agency after the merger of the two-backed by two different market research agencies. TAM deserve praise for its efforts over these two decades for pioneering the tools. A few weeks ago on the eve of the launch of IPTV in Delhi, Amit Dev the man behind it, told me how viewership could be monitored more reliably and less costly. With more delivery technologies coming obviously, the rating methodology can not remain static.

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9. That is how we thought of this meet today. And we were encouraged by the responses we got at the very outset. – from Mr. Bhaskar Gosh, the man who is credited for many ideas and initiatives in this sector, Ms. Brinda Karat, MP, Mr. Subhash Chandra of Zee TV, Mr. Kiron Karnik and earlier by Mr. Somnath Chattergee, now the Lok Sabha speaker, to mention just a couple of people who felt that meet is much delayed.

10. We thought we should sensitise about the rating services not only those in policy responsibilities but also the larger public. One need to wonder how ratings have become the yardstick and benchmark with so few knowing about the very approach and knowing so little about its relevance. We have over 100 universities having Communication Dept. and yet there has been no contribution or involvement of this, even as antiques.

11. I am grateful to TAM’s Mr. L.V. Krishnan and aMap’s Ravi Arora for coming from Mumbai and Ahmedabad to give a presentation on their rating services. I also thank Amit Dev of Time Broadband. We all should appreciate their interest. I am sure they are even as much concerned about the people and limitations of the current system and are interested in coming up with a more reliable ratings. They of course are trying their best. I have all praise for Krishnan’s efforts in this report over the years. But then they alone cannot be blamed for rating becoming part of public relations and aggressive marketing by channels. But since such use will effect the very credibility of ratings, we should be concerned about such a practice and also see that they are used more responsibly and objectively. This meet is not to condemn everything about ratings. Rather it is to facilitate a more reliable & representative one. Ratings could also be created for speeding up the growth of TV India.

12. Over the years, at CMS, as some of you know, we have been analyzing trends at macro level and in fact CMS Media Lab has been doing a daily content analysis of news channels in particular. We see clear signs of role of ratings on the content priorities of channels. Offlate TV Ratings are used more by channels than by advertising agencies. That is how we thought we should open up the debate in the interest of every one, particularly the public rather than leaving it to the channels, advertising agencies, market researchers and P.R. agencies. Some seems to think that advertising agencies should be discussing about ratings. In my opinions it is the channels, civil society and policy people who should be concerned more. I am glad that the Secretary, I&B, Mr. Choubey of TRAI, are here. The media scene is also changing because of technologies like CAS, DTH, IPTV and cell phone as of now. What implications & challenges will this emerging technologies have on TRPs?

13. CMS has compiled some basic concerns of well informed people about TV viewership ratings. These are presented as “some posers”. I hope you all had collected a copy of it. These are compiled over the years with a view to provoke a debate on rating service so that we could evolve a more reliable, relevant, responsible, representative and objective analysis of viewership taking into account fast changing communication technologies and scenario. Please read these posers. But please help to better the rating practices and enhance the very scope of audience measurement.

14. To this meet we invited CEO’s of most TV companies, many advertising agencies, some advertisers, media experts and academics. At least a couple of them from each functions are expected during the course of the day.

Courtesy: Centre for Media Studies

http://www.cmsindia.org/cms/index.html
http://www.cmsindia.org/cms/tvviewership.pdf

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