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Thursday, November 01, 2007

रेडियो की दशा दिशा...


रेडियो को लेकर एक चर्चा जारी है। रेडियो के हालिया बरसों में विस्तार के बाद उसके बदलते स्वरूप पर विचार किया जा रहा है। एक वेबमैगजीन ने इसे अपने इस बार के त्रैमासिक अंक में जगह दी है। रेडियो से जुड़े बहुत सारे पहलुओं पर यहां अपने विचार लिखे गए है।

आप भी इन विचारों से अवगत हो।

http://mediavimarsh.com/

Media Yug

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Sunday, October 07, 2007

सूचना के खरीदार आप

किस तरह की पत्रकारिता के खरीदार है आप। सुबह से लेकर शाम तक आपके सामने से कई तरह के संचार साधन गुजरते है। हर की कीमत तय है। अखबार, टीवी, रेडियो और इंटरनेट। सबने बीड़ा उठा रखा है कि वो आपको सूचना देगी। एक ऐसी सूचना, जिसका उपयोग आप अपनी किसी जरूरत को पूरा करने में कर पाएंगे।
अखबार में पहले पन्ने की खबर में से पाई गई एक सूचना से दिनभर की बासी बहसों को नया आयाम मिला करता था। लेकिन आज तमाम और निजी जरूरतों ने इनपर कब्जा कर लिया। किसी से पहली मुलाकात में देश, विदेश और समाज नहीं अब फाइनेंस, गाड़ी, मोबाइल और बेहद ऊपरी बातें होती है। ये हाल तो शहर का है। लेकिन ग्रामीण अंचलों में लोग अब सरकार से ज्यादा लोकल स्कीम्स, व्यवसाय की खबरों, मंडी भाव और मनोरंजन की खबरों को तव्वजों देने लगे है।
टीवी ने जिस ऊबाउपन को दूर किया था, आज वो बीच बीच में आने वाले ब्रेक्स से बढ़ गया। तकरीबन एक सी प्रस्तुतियों से लोगबाग अपनी सामान्य समझ को किनारे रखकर टीवी देखने लगे है। मनोरंजन की विविधता के दर्शन के नाम पर गाना बजाना, फूहड़ हंसी और रोमांच के नाम पर पैसों का खेल। लेकिन इसके भी दो चेहरे है। सरकारी चैनल अभी भी कुछ जमीनी है। वैसे भी दूरदर्शन के दर्शक कम से कम अपने घरों में नैतिकता की शिकायत नहीं कर सकते। निजी टीवी चैनलों की रचनात्मकता केवल बनावटी और नकल को अपने ढांचे में पेश करने में ज्यादा दिखती है। वैसे अपने कांसेप्ट पर हमने जो भी ऊंचाईयां पाई है, वो आज के दौर में इतिहास है। आगे आने वाले दिनों में बेकार समय गुजारने का माध्यम टीवी अगर नहीं बन पाया तो इसके पीछे केवल देशकाल की समझ रखने वाले कंटेट को ही अपनाना वाला होगा। जो हमें अपनी पहचान के पास रखेगा, और टीवी को उसकी।
रेडियो की आवाज बदल गई है। वहां आवाजें तो बहुत है। लेकिन प्रभाव घट गया है। हालांकि रेडियो को इस धमाल का शुक्रगुजार होना चाहिए, जिसके गाने बजाने से आज रेडियो जिंदा है। एफएम एक पहल थी। जो बीते कुछ सालों में लूप में बजने वाले गाने सी होकर रह गई है। सरकारी रेडियो ने भले ही अपनी मौजूदगी बनाए रखी हो, लेकिन उसका पुरकशिश अंदाज अब पुराना सुर सा लगता है। खबरों के लिए रेडियो सुनने वालों की कमी हो गई है। सुबह शाम बीबीसी सुनने वाले अब कम हो चले है। रेडियो को नई पहचान तो मिली, लेकिन उसकी अतीत अब ज्यादा प्रभावी लगता है।
इंटरनेट पर खबर पढ़ने वालों को माध्यमों की बहुलता से जूझना पड़ता है। आप गूगल पर खोजकर सूचना को ज्यादा उपयोगी नहीं बना सकते। सूचना को सींचना कैसे ये इंटरनेट पर तय करना मुश्किल है। सबसे बड़ी दिक्कत तो स्क्रीन की चंचलता ही है। प्रचार, सामग्री का ऐसा घलमेल होता है कि आप कि एक गलत क्लिंकिग आपका समय ही बर्बाद करती है। और अगर आप किसी ग्रुप के सब्सक्राइबर है तो सूचना के साथ आफर इतने कि आप का जी आजिज। शोध की गहरी संभावना को शायद इंटरनेट ने खत्म सा कर दिया है। इसे पत्रकारिता अच्छे से समझ सकता है।

तो क्या आने वाले वक्त मे हमें एक नए संचार माध्यम की जरूरत होगी। या हम वाहियात सी लगने वाली सूचनाओं से अपने आप को आगे बढ़ाएंगे। बहरहाल जो भी हो आप खरीदार बनें रहेंगे। और जो भी उत्पाद आप खरीदेंगे उसी से तय होगा कि आपकी सूचना क्या है।

सूचक
soochak@gmail.com

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Friday, September 28, 2007

एफएम रेडियो के नए वार

“नेपाली को इंडियन आईडल बना दिया, अब हमारा घर, महल्ला का चौकीदारी कौन करेगा जी”


ये शब्द रेड एफएम के एक रेडियो जॉकी नितिन के थे। जिसकी तपिश अब सिक्किम में देखी जा रही है। ये शब्द उस मानसिकता से निकले है, जो सालों से एक वीर कौम को देश की सेवा में निरंतर देखे जाने के बाद भी कायम है। बहादुर, नाम से ही हम सारे नेपालियों को समझते है। माने बहादुरी गुण नहीं, पेशा हो गया।

रेडियो पर दिनभर बकवास को पेश करने वाले जबान को पेशा बनाने वाले प्रस्तोताओं को अपने शब्दों का कीमत ये वाक्या ही समझा सकता है। देश भर में तीन सौ एफएम रेडियो चैनल है और दिन भर में अगर शब्दों की बरसात का अंदाजा लगाया जाए तो ये देश की जनसंख्या के आधे पर तो बैठेगी।

इस खास वाक्ये में क्योंकि इण्डियन आईडल का विजेता प्रशांत तमांग जुड़ा था, तो ये मुद्दा बन गया, लेकिन भाषाई तबको में नए खुले रेडियो चैनल क्या दिन भर में ऐसी तमाम गलतियां नहीं दोहराते होंगे। सवाल ये है कि क्या रेडियो को प्रचार के बीत गाना सुनाने का यंत्र मान लिया गया है। क्या रेडियो की रचनात्मकता और भूमिका केवल समय गुजारने के लिए पेश किए जाने वाले कार्यक्रमों में समा गई है।

आज रेडियो की बेहतरीन पेशकश करने वाले भी जानते है कि बाजार को साथ लेकर चलना कितना जरूरी है। और यहीं से शुरू हो जाता है सांस्कृतिक हल्के पन का एक तमाशा।

सितम्बर 24 की रात को नितिन ने विजेता के लिए जो शब्द कहे, वो केवल शब्द नहीं मानसिकता की सही तस्वीर दिखाता है। रेडियो जॉकी पूरी तैयारी के साथ ही स्टूडियो आते है। लेकिन काम का दबाव इन्हे अलग जुमले गढ़ने से रोकता है। सो निकलता वो है जो कहीं से काम का न हो या फिर किसी न किसी को कमजोर करता है।

रेडियो की नई भूमिका के लिए कोई मानदण्ड है कि नहीं ये पता करना आसान नहीं है। दिल्ली, लखनऊ, मुंबई या और महानगरों में कई नामों से जारी एफएम एक कपड़े में अलग अलग चेहरे से लगते है।

आने वाले दिनों में रेडियों की पहुंच छोटे शहरों से जुड़े गांवों तक होगी। और तब क्या किसान खेतों में गाना सुनकर खेती करेगा। या बेरोजगार अपना दिन इसी बकवास के बीच गुजार देगा।

बीते दिनों सरकार ने कहा कि उसे निजी रेडियो पर समाचार प्रस्तुत करने देने में कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते उस पर कोई नजर रखे। आज तो किसी की नजर है नहीं, आगे क्या होगा भगवान जाने।

इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल है कि क्या रोडियो को टाइमपास बनाने में इन रेडियो जॉकियो की सबसे बड़ी भूमिका है। और अगर है तो क्या लगता है कि रेडियो का भविष्य केवल दाम और नाम के बीच गाना बजाने की बची है।

http://sikkimnews.blogspot.com/2007/09/idol-ridiculed-protests-in-darjeeling.html
http://sikkimnews.blogspot.com/2007/09/24-hours-kalimpong-bandh-over-rj-nitin.html

Soochak
soochak@gmail.com

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Thursday, April 05, 2007

जनसंचार माध्यमों की दंतकथा (रेडियो)

तो बात पढ़ने पढ़ाने पर खत्म हुई थी। इसे अब आवाज़ से शुरू करते है। रेडियो की आवाज़। आकाशवाणी। याद होगा आपको। सिलोन रेडियो से गूंजती गंभीर दिल को छू लेने वाली आवाजें। जमाना बदल गया है। ग्रीन पार्क के ढींगरा साहब की मर्सिडीज में रेडियो आज भी बजता है। उनका ड्राइवर उनकी नामौजूदगी में एफएम सुनता रहता है। रेडियो बजता रहता है। आज महानगरों में रेडियो का संजाल है। रेडियो सिटी, रेड एफएम, रेडियो मिर्ची, बिग एफएम, रेडियो वन, फीवर १०४ और साथ में खड़ा है आकाशवाणी का एफएम। निजी रेडियो कंपनियों ने हर शहर को गानों की गूंज से गुजांयमान कर दिया है। ये अलग बात है कि एक पर सुना गाना ज्यादातर दूसरे पर कुछ घण्टों में बजता है। रेडियो ने पहचान ढूंढ ली है। उसका पुनर्जागरण हो चुका है। ये अलग बात है कि पहचान में समरूपता हावी है। दरअसल जिस रेडियो को पहले आप दिन भर अपनी दिनचर्या का हिस्सा मानते थे, वो अब मनोरंजन भर बन गया है। घर में काम के साथ धुन बज रही है तो गाड़ी में चलने के साथ। खैर ये वो समय है जब हर यंत्र संगीत देने में जुटा है। मोबाइल से लेकर एमपी थ्री प्लेयर तक। वैसे आकाशवाणी से गानावाणी तक पहुंचने के बीच रेडियो ने एक दौर ऐसा भी देखा है जब ये गांव देहात तक सीमित हो चुका था। या क्रिकेट की कमेंट्री सुनने का सस्ता और फीजिबिल माध्यम। रेडियो को अपनाना बीच के दौर में गरीबी और निम्न वर्ग का प्रतीक सा था। जैसे बंबई से कमाकर हाथ में रेडियो लेकर लौटता एक गांव का छोरा। रेडियो ने भारत के प्रसव काल को देखा, जन्म काल को सुनाया और विकासकाल में गुम सा गया। अब दोबारा ये पुनर्जन्म ले चुका है। एक नए कलेवर में। बाजार में इसका सुनना सुनाना अब शौक है। और इसे अपनाना फैशन। मोबाइल वाला रेडियो बिकता है। और कार में विदेशी प्लेयरों में देशी आवाज राग अलापती है। ये अलग बात है कि इस नए जन्म ने रेडियो के इतिहास में खास योगदान नहीं दिया है। क्योंकि बाजार में पैठ बनाने और एकरसता के शिकार रेडियो चैनल क्या परोस रहे है, ये समझ के परे है। रात को नौ बजे लड़के लड़को की सेटिंग या दिल की बात बताते लवुगुरू। ऐसे में आप केवल गानों को सुनना ही पसंद करते है। पर एक बात है कि नए अवसर और नए नाम बन रहे है। पर ये नाम इतिहास में दर्ज होने वाले नहीं है। ये बरसाती मेढ़क जैसे नाम है। रेडियो चैनलो की बरसात और तकनीकी सम्पन्न चैनलो में माइक पर चिक चिक करते रेडियो जॉकी।

नए रेडियो चैनलो ने गंभीर प्रयास के तौर पर नामी समाचार माध्यमों से करार किए। पर वहां भी नामी गिरामी लोगों के इंटरव्यू में पूछा गया फिल्म कौन सी अच्छी लगती है, गाना कौन सा। खैर ये नया कदम कब गांव देहात की सुनाएगा, इसका इंतजार है।

देखा जाए तो भविष्य मोबाइल के कालर ट्यून जैसा लगता है। तब नया गाना आए को ट्यून बदल लीजिए। लोगों ने फ्रीक्वेंसियों पर रेडियों ट्यून करना अब सीख लिया है। लोग सुन रहे है। जो बज रहा है। लेकिन एक हल्की याद्दाश्त के साथ

सूचक
soochak@gmail.com

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