Tuesday, April 10, 2007

तेरह मिनट में सिमटे विकासशील देश


तो क्यो देंखे टीवी। ये सवाल बार बार दस्तक देता है। हाल ही में टीवी देखा। दिखा। मनोरंजन के बाहुपाश में सिसकता समाचार। और तो और हर पल इधर उधर से अपनी मौजदूगी दिखाने वाला बाजार। खैर। हमने जब ये जानना चाहा कि तीन दिनों तक आठ देशों के बीच चलने वाले सार्क सम्मेलन का क्या हुआ। तो नतीजा कुछ मिनटों में निकला। तेरह मिनट। सारे निजी समाचार प्रदाताओं ने मिलकर इस भूराजनौतिक सम्मेलन को मात्र तेरह मिनट में सिमटा दिया। तेरह मिनट में सारी विकासशील दुनिया। अच्छा है। कौन जानना चाहता है। अब आईएएस की तैयारी करने वाला तो टीवी देखता नहीं है। और तमन्नाई लोगों को क्या मतलब है आप पड़ोस के मुल्कों से। वे तो अमेरिका और पश्चिमी देशों की सुध बुध जानना चाहाते है। क्या यही सच है। जो हमें टीवी पर दिख रहा है। जिस सरकारी चैनल को भारत में कई करोड़ लोग बिना असुविधा के देखते है, उसने तकरीबन तीन घण्टे दिखाया कि क्या हो सकता है इस बैठक और मिलने जुलने का नतीजा। वैसे अखबार की मौजूदगी औऱ साप्ताहिक पत्रिकाओं के लेखों से आप जान सकते है कि क्या हुआ। पर क्या इस वजह से टीवी की जिम्मेदारी घट जाती है। क्या इस वजह से आप प्राइम टाइम में मजाक बनने को तैयार रहते है। हंसने हंसाने को हर चैनल ने हंसोड़ियों को गांठ लिया है। उन्हे केवल देश के गिरती चीजों की खस्ताहाली की चिंता है। क्रिकेट और फिल्म की। वैसे शायद यही बिकता है। मुद्दे पर लौटते है। तो तीन दिन चले इस चौदहवें शिखर सम्मेलन में नया सदस्य देश अफ्गानिस्तान भी था। और साथ में पश्चिमी पर्यवेक्छक। पाकिस्तान ने कश्मीर का राग अलापा। नौ देशों के सौ से ज्यादा लेखकों ने अपनी अपनी बांची। साउथ एशिया फूड बैंक और यूनिवर्सिटी बनाने औऱ आतंकवाद पर साझा सोच बांटी गई। इसके अलावा भारत ने पड़ोसी देशों के लिए एकतरफा रियायतों की भी पहल की। कुल मिलाकर बिना किसी विवादित विषयों के ये सम्मेलन बीत गया। पर इसमें जो भी हुआ उसे टीवी पर जानना संभव नही रहा। दुख की बात है। और सोचने की भी।

सूचक
soochak@gmail.com

http://4.bp.blogspot.com/_DSuFI24Iqnw/Rhs2ITLxKuI/AAAAAAAAACU/-Lm-ymWUv10/s1600-h/Saarc+summit.bmp
http://outlookindia.com/full.asp?fodname=20070416&fname=Saarc+%28F%29&sid=1
http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/04/070403_saarc_delhi.shtml

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1 comment:

संजय बेंगाणी said...

पत्रकार जो चाहकर भी टीवी पर दिखा नहीं सकते अपने चिट्ठो पर रख सकते है.
मगर उन्हे कस्बो के मोहल्लो में बाजार लगने से फूर्सत तो मिले.