जय हिंद, जय भारत
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। जो आज के दिन को समझते है, वे इसे महज छुट्टी के तौर पर नहीं देखते। टीवी के माध्यम से आज का दिन एक तरह का भुला बिसरा गीत सरीखा है। जिन्होने भी आज सुबह इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री का अमर जवानों को श्रद्धांजलि और बाद में राजपथ पर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की अगवाई में सेना और झांकियों की छटा देखी होगी, वे लोकतंत्र की गरिमा को समझने से वाकिफ हो पाएं होंगे। दूरदर्शन की महत्ता शायद आज जैसे दिनों में ज्यादा समझी जा सकती है। सुबह पहले रिनी खन्ना और फिर सेना के कई अधिकारियों की आवाज में देश का गरिमागान भाता है। निजी चैनलों पर केवल लोगो और स्क्रीन पर तिरंगा फहराने की प्रथा से कई गुना आगे जाते हुए दूरदर्शन आज के दिन, लोकतंत्र की गाथा, अमर जवानों का साहस, सेनाओं की सलामी और तरह तरह की जानकारियों को देकर पूरे सजीव प्रसारण को लुभावना और कशिश वाला बनाता है। हमारे देश में राष्ट्रभक्ति से जुड़े गीत भी अब दिनों के लिए बजने लगे है। वो बजते है, तो मन में कुछ सुरसुराहट होती है। अच्छा लगता है।
दूरदर्शन की सजीव प्रस्तुति को सारे समाचार चैनल दिखाकर जिस मानस को संतुष्ट करना अपना कर्तव्य समझते है, उसी को रोजाना देश के हित से अलग बहलाकर वे भले ही भला न कर रहें हो, लेकिन कभी कभी सभी चैनलों पर एक ही दृश्य का चलना एक माला के मोती जैसा अहसास देता है।
संविधान को देश ने आज से ५९ साल पहले अपनाया था। और उसमें अभी तक सौ के करीब बदलाव किए गए। जनता को शायद पंचायती राज से जुड़ा संविधान में बदलाव तो याद होगा। लेकिन बहुत से ऐसे बदलाव जारी है, जो अब पता नहीं चलते। ये जानना जरूरी है और जरूरत भी।
टीवी पर तोपों की सलामी, तिरंगे का फहराना, सेनाओं की कदमताल, सैनिकों का गरजना और आकाश से फूल बरसाते विमानों के नजारे अपने लोकतंत्र में फैले हर रंग की बयां करते है। शायद कंटेंटविहीन कलरबार की तरह। लेकिन, इसके बाद जो भी टीवी पर आता है, वो जनमानस को तभी भाता है जब उसमें लोकतंत्र की गरिमा और सूचना के ताकत का अहसास हो। ये भले ही कोरी कल्पना हो, लेकिन आप तभी तक इंसान है, जब आप अपने मूल्यों, कर्तव्यों और अधिकारों से लैस है।
जय हिंद, जय भारत।
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Saturday, January 26, 2008
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