दहेज हत्या, बच्चों की जान की चिंता और आज का दिन जानिए। बीते दिनों में टीवी पर ये तीनों ही छाए रहे। दिल्ली और आसपास के इलाकों में दहेज को लेकर एक अजब सा माहौल पनपता जा रहा है। कई कई सालों से शादीशुदा जोड़े अपनी शादी को तोड़ने पर आ गए है। क्यों। जीवन के तनावों को दूर करने का माध्यम अब शहर को लोग पैसे को मान चुके है। ज्यादा पैसा कम परेशानी। किसी के पास चार पहिया नहीं है, तो किसी को धंधे के लिए और पैसे चाहिए। सो जब उन्हे अपने आसपास से पैसा नहीं मिलता, तो वे समाज की एक ऐसी कुरीति का दामन थामते है, जिससे वे परिवार को दांव पर लगा रहे है। टीवी पर दहेज अत्याचार से जुड़ी खबरे आई, लेकिन किसी में भी गहनता से ये नहीं दिखाया गया कि असली वजह क्या है। पर जिस एक वजह को टीवी ने दिल से छुआ, वो रही देश भर में इलाज की वेदी पर सिसक रहे बच्चों की। कही किसी के दिल में छेद है, तो कही किसी को कैंसर। कही कोई अनाथ रेल के डिब्बे में पड़ा मिला, तो कही उसे अपनाने की ललक समाज में दिखी। कुल मिलाकर इस सारी पेशकश में एक चरित्र तो साफ हो गया कि भारत में भावनाए अभी भी बहती है। टीवी ने कम ही बार इसे समझा और दिखाया है। लेकिन इससे गाहे बगाहे भला उनका हो जाता है, जो सचमुच किसी की मदद करना चाहते है, या हैसियत में है, लेकिन शुरू कहां से करें, ये नहीं जानते। कुल मिलाजुलाकर इस सारे फसाने ने एक दर्द को हवा दी है, कि बिलखते बच्चों का कोई तो खैर करें। टीआरपी की चाह के बावजूद भी ये सराहनीय रहा। और भविष्यगामी भी। भविष्य बांचने वालों की तो चांदी हो चली है। हर चैनल पर वे बहस रहे है। आज आपका दिन रहेगा, ऐसा, वैसा, कैसा। लेकिन ज्योतिष और तमाम भविष्य बांचने वाली विधाओं को स्टूडियों की चांदनी में पेशकर टीवी चैनल देश को किस ओर ले जा रहे है, पता नहीं। क्या देश की आधुनिक पीढ़ी इसे देखना चाहती है, या एक प्रोफेशनल अपने काम को अब राशि और रत्नों से आंकने लगे। क्या देश की राजनीति अब ग्रह नक्छत्र औऱ कुंडली के हिसाब से अपनी जननीतियां तय करें। या किसी घर में क्या पके, ये भी अब राशिवक्ता बताएंगे। बुरा है। बहकाव है। आप किसी भी ग्यान पर भरोसा कर सकते है, अंधविश्वास नहीं। देश को आगे ले जाने वाली खबरों की जरूरत है। देश को ये देखना है कि सुबह सवेरे कैसे प्रकाश जीवन को बदल रहा है। कैसे ग्रह नक्छत्र नहीं। मैं अतिश्योक्ति नहीं बांच रहा हूं। आप आनलाइन या एसएमएस सर्वे करा लीजिए। नतीजे आ जाएंगे। वैसे हां ये जरूर सत्य है कि ऐसे तमाशे चलते रहे तो आने वाले दिनों में तमाम समाचार चैनल विरोधियों को पछाड़ने के लिए यग्य, मंत्रोच्चार आदि कराने लगे। ऊं आजतकाय नम, ऊं स्टार न्यूजाय नम आदि आदि। वैसे मजाक ही सही, पर क्या किसी चैनल से किसी खबर को दिखाने के लिए किसी ज्योतिषाचार्य से पूछा कभी। नहीं न। तो क्या जरूरत है, जनता को हर दिन सचेत करने की। ऐसे देश में जहां कर्मण्येवाधिकारस्ते जपा जाता हो, वहां रोजाना कर्म से ज्यादा भविष्य को बताना घातक ही होगा। वैसे टीवी को जरूर आ पड़ी है इसकी जरूरत। यानि जल्द ही आपको चैनल विशेषग्य पंडित मिलने लगेंगे।
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Monday, May 07, 2007
Monday, April 02, 2007
जनसंचार माध्यमों की दंतकथा (अखबार)
अखबार, रेडियो, टेलीविजन और इंटरनेट। चार जनसंचार माध्यम। चार जरिए, जिससे आप जहां को जानते है। समझते है। पर क्या सचमुच। सवेरे सवेरे अखबार बांचने वालों में क्या पढ़ा जाता है, और क्या नहीं। ये सोचने वाला विषय हो चला है। खासकर जब सवेरे सवेरे मध्यम आकार के चटपटे अखबार बड़ी संख्या में बिकने लगे। मुंबई में मिड-डे है तो, दिल्ली में मेट्रो नाउ। जायका बदल रहा है। हार्डकोर न्यूज के सामने रसभरी खबरों को तरजीह दी जा रही है। ध्यान रखें कि ये आकलन शहरों का है। अखबारों की बड़ी कतार सड़क किनारे दुकानों पर दिखती है। अंग्रेजी में टाइम्स आफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स, पाएनियर, द हिंदु, स्टे्टसमैन, इकानामिक टाइम्स, मिंट आदि लुभावने अखबार है। समय के साथ चलते रहने और बदले में, आप इसे तारीफ न समझे, टीओआई ने बढ़त ली है। पहले जिस अखबार का संपादक प्रधानमंत्री के बाद सबसे ताकतवर शख्स होता था, आज उसी टीओआई में संपादक का पद खाली है। जरूरत नहीं है। उन्नीस सौ नब्बे में उदारीकरण के बाद ये अखबार बदलता ही रहा। कभी शहर दर शहर तस्वीरों से पटे पेज थ्री के जरिए, तो कभी संपादकीय को गैर जरूरी समझकऱ। वैसे जिस बयार में आपको भी न समझने लायक छोड़ा है, उसे फांसने में टाइम्स आफ इंडिया सबसे आगे रहा। नहीं है सहमत, तो मेट्रो नाउ देखिए। संवाददाता आपको अंतरंग वस्त्रों की दुकान पर सेल्स गर्ल बनकर अनुभव लिखती दिख जाएगी। खैर बयार में मौजूद रहने वालो अंग्रेजी अखबारों में एचटी ने भी अपने सप्लीमेटों के जरिए दखल बनाई हुई है। रही बात हिंदु, पायनियर, स्टेट्समैन की तो, वे बदस्तूर जारी है। अपनी भूली बिसरी पहचान और नोस्टालजिया के साथ। शायद वक्त बदले और दिन बहुरे।
गुलाबी अखबारों की क्या कहें। अलग पाठक, अलग खबर और टीवी पर इंसान को कुत्ता बनाने वाले विग्यापन। इक़ॉनामिक टाइम्स की रचनात्मकता आपको पिकासो की लगती है, तो मिंट का आकार ईटी के आगे छोटा लगता है। बहरहाल असरदार दोनों है। पर सीमित वर्ग के लिए।
हिंदी का अखबार बाजार अनोखा है। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, दौनिक जागरण, वीर अर्जुन और तमाम फुटपाथ पर सजे अलग अलग नामों के अखबार। नभाटा की साख थी। आज प्रचार ज्यादा है। जान और अब्राहम के नाम को मिलाइए औऱ इनाम पाइए। यही नभाटा बचा है। हिंदुस्तान में लेख है, पर व्याकरणीय गलती पांच क्लास का बच्चा पकड़ ले। औऱ रविवार का संपादकीय लेख साहित्याकार भी पढ़कर झल्ला जाए। यानि वक्त के साथ वो बदलाव नहीं है। रही बात पंजाब केसरी की तो अखबार पढना कहां से शुरू करें, ये तय करना मुश्किल है। पहले सिनेमा है या समाज, इस अखबार को देखकर समझा जा सकता है। रही बात दैनिक जागरण की तो राजधानी की छन्नी में उसकी विचारधारा छन जाती है। निकलकर आती है तो रंगरोगन भरे पन्ने। वीर अर्जुन, महामेघा और अन्य अखबार जारी है। वजूद की लड़ाई के साथ।
जाहिर है आप रोजाना दो से ज्यादा अखबार नहीं पढ़ सकते। भले ही आप पत्रकार हो। तो जो भी पढ़े, दिन भर के लिए क्या पढना है, ये तय करना जरूरी हो गया है। और तय करने के लिए आप जो भी पढ़े, उसका आपकी रूचि का होना। और जनाब आपकी रूचियां बदल चुकी है। यकीन नहीं होता। तो टीवी चलाकर देखिए। जो दिख रहा है, वो ही आपकी रूचि मानी जा रही है। खैर...बाकी जनसंचार माध्यमों पर जल्द ही...
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गुलाबी अखबारों की क्या कहें। अलग पाठक, अलग खबर और टीवी पर इंसान को कुत्ता बनाने वाले विग्यापन। इक़ॉनामिक टाइम्स की रचनात्मकता आपको पिकासो की लगती है, तो मिंट का आकार ईटी के आगे छोटा लगता है। बहरहाल असरदार दोनों है। पर सीमित वर्ग के लिए।
हिंदी का अखबार बाजार अनोखा है। नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, पंजाब केसरी, दौनिक जागरण, वीर अर्जुन और तमाम फुटपाथ पर सजे अलग अलग नामों के अखबार। नभाटा की साख थी। आज प्रचार ज्यादा है। जान और अब्राहम के नाम को मिलाइए औऱ इनाम पाइए। यही नभाटा बचा है। हिंदुस्तान में लेख है, पर व्याकरणीय गलती पांच क्लास का बच्चा पकड़ ले। औऱ रविवार का संपादकीय लेख साहित्याकार भी पढ़कर झल्ला जाए। यानि वक्त के साथ वो बदलाव नहीं है। रही बात पंजाब केसरी की तो अखबार पढना कहां से शुरू करें, ये तय करना मुश्किल है। पहले सिनेमा है या समाज, इस अखबार को देखकर समझा जा सकता है। रही बात दैनिक जागरण की तो राजधानी की छन्नी में उसकी विचारधारा छन जाती है। निकलकर आती है तो रंगरोगन भरे पन्ने। वीर अर्जुन, महामेघा और अन्य अखबार जारी है। वजूद की लड़ाई के साथ।
जाहिर है आप रोजाना दो से ज्यादा अखबार नहीं पढ़ सकते। भले ही आप पत्रकार हो। तो जो भी पढ़े, दिन भर के लिए क्या पढना है, ये तय करना जरूरी हो गया है। और तय करने के लिए आप जो भी पढ़े, उसका आपकी रूचि का होना। और जनाब आपकी रूचियां बदल चुकी है। यकीन नहीं होता। तो टीवी चलाकर देखिए। जो दिख रहा है, वो ही आपकी रूचि मानी जा रही है। खैर...बाकी जनसंचार माध्यमों पर जल्द ही...
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Tuesday, March 13, 2007
बेचो बेचो, खेल है भईया
मजेदार है ये आंकड़ा। एक हफ्ता। सात दिन। चौंतीस सौ पैतीस(3435) मिनट। और इनमें से चौहद सौ इक्यावन(1451) मिनट दिखे क्रिकेट के कार्यक्रम। यानि बयालीस(42%) फीसदी क्रिकेट। बाकी भी रहा। पर जरा जरा। जैसे पूणे की रेव पार्टी में रेड की खबर को मिले नब्बे मिनट और हसन अली के पैसे की दास्तान को पैंसठ मिनट। ये तस्वीर है आज के भारत की। क्रिकेट के आक्रमण की। औऱ बदलते चलन की। देश में कितनी लहर क्रिकेट की है, यो भांपना मुश्किल है। मैने अपने घर में जांचा तो किसी को ये न पता था कि कितनी टीमें भाग ले रही है। तो क्या माने। कि क्रिकेट से ज्यादा क्रिकेट का प्रचार बेचा जा रहा है। कहा जाता है कि बार बार झूठ बोलते रहने से वो सच हो जाता है। शायद सच है। पर देखिए फसाना सीधे बाजार से जुड़ा है। इस बार विग्यापनों में ज्यादा पैसा लगा है। ज्यादा अवधि तक मैच में प्रचार दिखाया जाना है। और देखने वाले को ये समझाना है कि ये खिलाड़ी जो बेच रहा है, वहीं खरीदना है। आंकडों में मत जाइए। खो जाइएगा। सीधा समझिए। आईसीसी करारों को कई सौ करोड़ों में बेचती है। कंपनियां उन्हे खरीदती है। खिलाड़ी लोकप्रियता को केवल प्रदर्शन से बरकरार रखने में असफल साबित हो रहे है। और तो और खेल से जी जान से जुड़ा देश क्रिकेट में बह जाता है। खिलाड़ी बने रहने के लिए, कमाने के लिए भी, प्रचारों को अपनाते है। कंपनियां अपनी साख सही रखने और उत्पाद को भावनात्मक बाजारीकरण के जरिए बेचती है। औऱ क्रिकेट से जुड़ी संस्थाएं बाजार को समझती है। लब्बोलुआब ये कि खेल कम और भावनात्मक शोषण ज्यादा। क्रिकेट केवल गिने चुने देशों में खेला जाता है। पर एशिया के हावी होने से बड़ी कंपनियों को बड़ा बाजार दिखता है। क्रिकेट में प्रदर्शन पर ही टिकना संभव है, पर प्रचार में बने रहकर क्रिकेटर देश की नजर में बना रहता है। क्या सौरभ गांगुली जब बाहर थे, तो टीवी पर नहीं दिखते थे। तो खेल खेलना खिलाड़ी का भले ही काम हो, पर उसे बेचना बाजार का काम है। टीवी को समझने वाले जानते है कि अनुत्पादकता क्या होती है। औऱ चौबीस घण्टे चैनल चलाना कितना मुश्किल है। खबर खबर करके आप जीवित नहीं रह ससते है। तो हर चीज को सूचना मानकर दिखाना आपकी मजबूरी है। और तो और अगला आगे न बढ़े। कोई भी खबर कैसी भी हो, उसे केवल एक चैनल न चलाए। प्रचार पेश करने की रणनीति औऱ ब्रेक के समय को मैनेज करना। सब चुनौती है। क्रिकेट के खेल की तरह। तो जब खेल विक रहा है, तो टीवी के साथ क्या दिक्कत है भई।
साभार- www.cmsmedialab.wordpress.com
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Saturday, February 17, 2007
मैं निर्दोष हूं..

एक दंपत्ति। कई जिंदगियों को लेने के आरोपी। देश की उच्चतम अदालत ने कहा कि मौत दे दो। मामला इससे आगे नहीं जा सकता है देश में। पर टीवी को क्या इसका पता है। शायद नहीं। तभी तो दो दिन सजा पाए पति पत्नी को लाइव दिखाता है। उनसे पूछता है कि क्या किए थे आठ कत्ल। और जाहिर है जवाब ना ही होता। पर टीवी ने इस पर दो दिन क्यों दिए। ये किसे देखना था। क्यो देखना था। क्यो दिखाना था। ओछी लोकप्रियता का अनैतिक तमाशा या अपनी ताकत को जाहिर करने का एक और शो। टीवी के एक चैनल पर जारी ये सामाजिक विद्रूपता कई सवाल खड़े कर देती है। एक दंपत्ति पर संपत्ति का मामला। २००१ का हादसा। एक विधायक रेलु राम पुनिया की बेटी और दामाद आरोपी। सोनिया और संजीव को सेशन कोर्ट ने मौत की सजा दी थी। हाईकोर्ट मे उसे उम्रकैद में बदला था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कहा जघन्यता है। पर टीवी को ये सब समझ नहीं आया। दोनों को पकड़ा। और बैठा लिया। कहा बोलो। फोन करिए। सवाल पूछिए। मानो भविष्य बाचने वाले बैठें है। मानो वे कहेंगे कि हां हमने की थी अपने पिता, मां, भाई, भाभी और छोटे छोटे तीन मासूमों का हत्या। राड से पीटकर। टीवी ने फिर चलाया। चार सौ करोड़ की संपत्ति थी। और इसे ही चाहते थे वे। लेकिन सवाल ये है कि जब कोर्ट ने, और सर्वोच्च कोर्ट ने मौत की सजा सुना दी थी, तो क्यो जारी थी ये कहानी। क्यो हिमाकत दिखा रहा था टीवी। अपनी संप्रभुता को भूलते हुए। दर्शक इसे देख रहा था। वो इतनी गहराई में सोचता है कि नहीं , इसे समझ पाना मुश्किल है। हकीकत को बढ़ा चढा कर दिखाने वाला टीवी समाज के बदलाव को विद्रूपता के नजरिए से दिखा रहा था। वो गलत को सही कहने का मौका दे रहा था। वो अपराधी को मौका दे रहा था। वो रूख दिखा रहा था। कभी आरोपी स्टूडियों में आता है। सर उठाता है। औऱ जेल जाता है। कभी अभियुक्त हर फैसले के बाद कहता है कि वो निर्दोष है। उसे फँसाया गया है। तो टीवी इसे क्यो दिखाता है। बार बार। क्यो जनता की दया का पात्र बनाता है। क्यो रियाया के दिल में न्यायपालिका के खिलाफ एक तेवर पैदा कर रहा है। क्यो अपने आप को सर्वोच्च मान रहा है। ये ऐसे सवाल है जो ऐसे तमाशे खड़े करने वालों को परेशान नहीं करते। वे केवल आंखों का ख्याल रखते है। देखने वाली आंखे। समाज या न्याय की नहीं। बल्कि दर्शक की। वे ऐसे माहौल को बना रहे है, जो हर गलत को सही मानने पर मजबूर कर रहा है। वे दो चार सौ एसएमएस से ये बताने में लगे है कि समाज ऐसा सोच रहा है। वे टीवी पर फोन करके सवाल पूछने वालों से ये दिखा रहे हैं कि सब गलत है वो सही है। वे दिखा जो रहे है। उनके पत्रकार अब लोगों को बटोरने में लगे है। कोई अभियुक्त के रिश्तेदारों के आंसू दिखा रहा है तो कोई उनसे खफा लोगों के मर्म। न जाने कहां ले जा रहे है विषय औऱ वस्तु को। वस्तुपरकता खो चुकी है। व्यक्तिवादिता हावी हो रही है। एक जाते जान की कोई कीमत नहीं है। जबकि जो जान लेने पर उतारू है उसे जगह दी जा रही है। कैसे पर्दा है ये। क्या ये समाज के सच को बताकर खुद अलग खड़े होने में यकीन रखते है। या शामिल होकर किसी कातिल का हौसला बढ़ा रहे है। आओ, मारो, सजा पाओ, और हम तुम्हे देंगे एक मौका अपनी दलील रखने का। ये खतरनाक संकेत है। एक समाज को सचाई के फैसले से दूर ले जाना का घिनौना नाटक। जो जारी है। और अगर जारी रही तो आप भी एक दिन पाएंगे कि आपके साथ हुए हादसे का अपराधी टीवी पर चीख रहा है। मैं निर्दोष हूं।
सूचक
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