Saturday, February 17, 2007

मैं निर्दोष हूं..


एक दंपत्ति। कई जिंदगियों को लेने के आरोपी। देश की उच्चतम अदालत ने कहा कि मौत दे दो। मामला इससे आगे नहीं जा सकता है देश में। पर टीवी को क्या इसका पता है। शायद नहीं। तभी तो दो दिन सजा पाए पति पत्नी को लाइव दिखाता है। उनसे पूछता है कि क्या किए थे आठ कत्ल। और जाहिर है जवाब ना ही होता। पर टीवी ने इस पर दो दिन क्यों दिए। ये किसे देखना था। क्यो देखना था। क्यो दिखाना था। ओछी लोकप्रियता का अनैतिक तमाशा या अपनी ताकत को जाहिर करने का एक और शो। टीवी के एक चैनल पर जारी ये सामाजिक विद्रूपता कई सवाल खड़े कर देती है। एक दंपत्ति पर संपत्ति का मामला। २००१ का हादसा। एक विधायक रेलु राम पुनिया की बेटी और दामाद आरोपी। सोनिया और संजीव को सेशन कोर्ट ने मौत की सजा दी थी। हाईकोर्ट मे उसे उम्रकैद में बदला था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने कहा जघन्यता है। पर टीवी को ये सब समझ नहीं आया। दोनों को पकड़ा। और बैठा लिया। कहा बोलो। फोन करिए। सवाल पूछिए। मानो भविष्य बाचने वाले बैठें है। मानो वे कहेंगे कि हां हमने की थी अपने पिता, मां, भाई, भाभी और छोटे छोटे तीन मासूमों का हत्या। राड से पीटकर। टीवी ने फिर चलाया। चार सौ करोड़ की संपत्ति थी। और इसे ही चाहते थे वे। लेकिन सवाल ये है कि जब कोर्ट ने, और सर्वोच्च कोर्ट ने मौत की सजा सुना दी थी, तो क्यो जारी थी ये कहानी। क्यो हिमाकत दिखा रहा था टीवी। अपनी संप्रभुता को भूलते हुए। दर्शक इसे देख रहा था। वो इतनी गहराई में सोचता है कि नहीं , इसे समझ पाना मुश्किल है। हकीकत को बढ़ा चढा कर दिखाने वाला टीवी समाज के बदलाव को विद्रूपता के नजरिए से दिखा रहा था। वो गलत को सही कहने का मौका दे रहा था। वो अपराधी को मौका दे रहा था। वो रूख दिखा रहा था। कभी आरोपी स्टूडियों में आता है। सर उठाता है। औऱ जेल जाता है। कभी अभियुक्त हर फैसले के बाद कहता है कि वो निर्दोष है। उसे फँसाया गया है। तो टीवी इसे क्यो दिखाता है। बार बार। क्यो जनता की दया का पात्र बनाता है। क्यो रियाया के दिल में न्यायपालिका के खिलाफ एक तेवर पैदा कर रहा है। क्यो अपने आप को सर्वोच्च मान रहा है। ये ऐसे सवाल है जो ऐसे तमाशे खड़े करने वालों को परेशान नहीं करते। वे केवल आंखों का ख्याल रखते है। देखने वाली आंखे। समाज या न्याय की नहीं। बल्कि दर्शक की। वे ऐसे माहौल को बना रहे है, जो हर गलत को सही मानने पर मजबूर कर रहा है। वे दो चार सौ एसएमएस से ये बताने में लगे है कि समाज ऐसा सोच रहा है। वे टीवी पर फोन करके सवाल पूछने वालों से ये दिखा रहे हैं कि सब गलत है वो सही है। वे दिखा जो रहे है। उनके पत्रकार अब लोगों को बटोरने में लगे है। कोई अभियुक्त के रिश्तेदारों के आंसू दिखा रहा है तो कोई उनसे खफा लोगों के मर्म। न जाने कहां ले जा रहे है विषय औऱ वस्तु को। वस्तुपरकता खो चुकी है। व्यक्तिवादिता हावी हो रही है। एक जाते जान की कोई कीमत नहीं है। जबकि जो जान लेने पर उतारू है उसे जगह दी जा रही है। कैसे पर्दा है ये। क्या ये समाज के सच को बताकर खुद अलग खड़े होने में यकीन रखते है। या शामिल होकर किसी कातिल का हौसला बढ़ा रहे है। आओ, मारो, सजा पाओ, और हम तुम्हे देंगे एक मौका अपनी दलील रखने का। ये खतरनाक संकेत है। एक समाज को सचाई के फैसले से दूर ले जाना का घिनौना नाटक। जो जारी है। और अगर जारी रही तो आप भी एक दिन पाएंगे कि आपके साथ हुए हादसे का अपराधी टीवी पर चीख रहा है। मैं निर्दोष हूं।

सूचक



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4 comments:

Raag said...

भैयै टी आर पी से आगे कोई सोचता ही नहीं? छोटी छोटी सोच का मारा है ये समाज।

miredmirage said...

जैसा हम पसन्द करते हैं वही परोसा जाता है । अब वे नैतिकता पर उपदेश तो देने से रहे । अखरता तो है पर चैनल बदलने के सिवाय क्या उपाय है?
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com
miredmiragemusings.blogspot.com/

Shrish said...

सब टीआरपी का खेल है भैया। टीवी वाले तो अंधे हो गए हैं इसके पीछ। नैतिकता, ईमानदारी जैसी चीजें दिखनी बंद हो गई हैं इनको।

प्रियंकर said...

मीडिया पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है पर उसकी आंख सिर्फ़ टीआरपी देख रही है .