Monday, February 26, 2007

बिन सिक्योरिटी रेल चली


रेल चल निकली है। लालू यादव ने टीवी पर देश को हरी झंडी दिखाते हुए एक लोकलुभावन बजट पेश किया। पर जो टीवी पर दिखता रहा वो भी रेल के डिब्बे में दिखने वाली रंगबिरंगी दुनिया से कम नहीं था। चटख रंग,आते जाते ग्राफिक्स,दाएं-बाएं होते विजुअल्स,खाना खाते रेलमंत्री,टिकर पर एक बात दोहराते चैनल। कुछ मजा नहीं आया। वैसे भी लालू के बजट के ज्यादा ही जमीनी होने से चैनलों को उसे पेश करने के तरीके को ज्यादा ही रंगरंगीला बनाना पड़ता है। जैसे अब नामों को ही ले लीजिए। सब लालू के ईर्द गिर्द घूमते नजर आते है। ये एक व्यक्ति की सबसे बड़ी सफलता कही जा सकती है कि वो छा जाए। विषय से ज्यादा। टीवी को लालू अपने मसखरेपन की वजह से प्यारे है। और जनता को वे अपनी नीतियों की वजह से। रेल को बीस हजार करोड़ का लाभांश मिला। यात्री किरायों में कमी की गई। माल ढुलाई में कमी,सुविधाओं को बढ़ाने का वादा और अनरिजर्वड क्लास में सीटों पर गद्दी लगवाने तक ध्यान रखा गया है। सो इसे आप क्या कहेंगे। इस आने वाले साल के लिए वजट भी इक्तीस हजार करोड़ का रखा गया है। आठ नए गरीब रथ,बत्तीस नई गाड़िया,आठ सौ नए डिब्बे,हर रेल में और अनरिजर्वड डिब्बे,टीटीई को हाथ में कम्प्यूटर, १३९ का इंक्व्यारी नम्बर। और बहुत कुछ। तो क्या ये सब बताता है कि रेल का हाल दुरूस्त है। क्या लालू चैन से बंशी बजा सकते है। और बड़े पद की दावेदारी भी कर सकते है। राजनीति के हिसाब से सही लगने वाला फैसला कही आगे चलकर रेल को निजीकरण के रास्ते पर न ले जाए। आज जितनी सहूलियतों को रेलमंत्री बांट रहे है, वो अगला नहीं कर पाया तो क्या। रेल में निजी दखल को लालू अभी टालते है, लेकिन बाजार को सस्ता देकर वे क्या सही दिशा में जा रहे है। जितने आतंकवादी हादसे पिछले साल रेलों में हुए है,उस पर रेलमंत्री चुप क्यों हैं। क्या रेल की सिक्योरिटी की जिम्मेदारी किसी और की है। जनता खुश,उद्योग खुश,नेता खुश। सब खुश, पर ट्रेनों में पचास रूपए देकर कुछ भी ले जाने वाला भी खुश है। वो कुछ भी कही भी ले जा रहा है। ट्रेनों में अगर सब्जी,दूध जा रहा है तो पेट्रोल,विस्फोटक भी आर पार हो रहा है।पूरे बजट में सिक्योरिटी का सवाल नदारद है। टीवी भी रंगबिरंगी दिखावट में जुटा है। भूल जाता है कि अभी दो हफ्ते पहले पुरानी दिल्ली से चढ़ी छाछठ जाने अब इस दुनिया में नहीं है। उनके लिए कौन दोषी है। कौन देख रहा है। एक टीवी चैनल ने चलाया कि सीसीटीवी कैमरे पांच मिनट बाद रिकार्ड करते है और वो भी ब्लैक एंड व्हाइट। तो रेल के आधुनिकीकरण का क्या। रेल में मनोरंजन तो ठीक है लालूजी,पर रेल में किसी व्यक्ति को जो सबसे पहले फिक्र होती है वो है अपनी जान और माल की। उम्मीद है अगले रेल बजट तक ये समझ में आ जाएगा देश को। और हां टीवी को भी।


सूचक



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2 comments:

संजय बेंगाणी said...

अच्छी बातो की प्रशंसा करें, खराब की आलोचना.

लकडी की सीटो पर गद्दीयाँ लगवाना सही कदम है. अब ईंजनो को वातानुकूलित किया जाना चाहिए. धान की ढुलाई सस्ती होनी चाहिए.

इन सब के उपर सुरक्षा को कड़ा किया जना चाहिए.

रेल के निजीकरण का समर्थन करूंगा.

TallyHelper said...

सिर्फ एक बात कहुगा रेल के मुनाफे पर।
मेरे पास एक धंधा है जिसमे ग्राहको की कमी है क्या खाक चलेगा चलेगा ! इस का मतलब या तो धंधा गलत है या मैं गलत हू जो चला नही पा रहा हू। लालू जी के पास एक धंधा है जिसमे ग्राहक की कोइ कमी नही है फिर भी नही चल रहा था पर अब मुनाफा देने लग गया है तो इसका मतलब चलाने वाले पहले गलत थे या उनको इस बात से कोइ फरक नही पड़ रहा था कि धंधा कहा जा रहा है या अब सही आदमी आ गया है चलाने वाला।