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Tuesday, March 10, 2009

फिर बैतलवा डाल पर: चौथी दुनिया का मिथक

गलतियां सभी से होती हैं। लेकिन ऐतिहासिक गलतियां कुछ ही करते हैं। जैसे सीपीएम ने ऐतिहासिक गलती की थी। उसने माना भी, कि सरकार को बाहर से समर्थन देना कितना गलत फैसला साबित हुआ। कुछ दुर्लभ ही होते हैं जो दो बार ऐतिहासिक गलती करते हैं। सीपीएम ऐसी ही दुर्लभ पार्टी है। उसे इस दुहराव का क्‍या नुकसान होगा, यह आगामी चुनाव में साफ हो जाएगा। 

मैंने भी ऐतिहासिक गलती की। यह जानते हुए कि गलत हूं, उसे दुहराया। यह दुहराव मुझे कोई नुकसान करने नहीं जा रहा। लेकिन दिल में दुख के जो स्‍थायी फफोले इसने छोड़े हैं, उन्‍हें दबा पाना मुश्किल जान पड़ रहा है। 

सोचता हूं, इस बारे में सबको जानना चाहिए। यह मसला निहायत निजी भी कहा जा सकता है, लेकिन अपने मूल में राजनीतिक है और राजनीतिक मसले पब्लिक डोमेन में लाए ही लाने चाहिए। क्‍योंकि कभी-कभार राजनीति निजी सम्‍बंधों पर भारी पड़ जाती है और दुख देती है। इस बार मेरे साथ ऐसा ही हुआ।

मुझे जानने वाले जानते हैं कि मेरा एक करीबी मित्र है। उसका नाम है व्‍यालोक। वह जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राजनीति में काफी सक्रिय रहा है। पिछले सात साल का दोस्‍ताना रहा है। वैसे तो कई दोस्‍त पंद्रह-बीस साल भी पुराने हैं, लेकिन वह इसलिए खास है मेरे लिए (और मैं उसके लिए) क्‍योंकि हमने अपना सबसे बुरा वक्‍त एक साथ गुज़ारा है। चाय-मठरी पर दो महीने जिंदा रहे हैं लक्ष्‍मी नगर के एक कमरे में। जब नौकरी नहीं थी और अखबार में लिखने से हजार रुपए मुश्किलन आते थे महीने भर में।

आज एक बड़े संपादक पूछ रहे थे कि मैंने उसके साथ आखिर इतने लंबे वक्‍त तक निभाया कैसे, जबकि हम दोनों विपरीत ध्रुव के प्राणी हैं। यह सवाल नया नहीं है। मुझे कई जगह उसके कारण और उसे कई जगह मेरे कारण अपने-अपने राजनीतिक दायरों में संदिग्‍ध होना पड़ा है। सभी पूछते रहे, लेकिन यह अद्भुत याराना था जो बना रहा। मेरे जानने वाले यह समझते रहे कि वह अब प्रगतिशील हो चला है। उसे जानने वाले मुझे छद्म वामपंथी।

खैर। पिछले एक साल मैंने इकनॉमिक टाइम्‍स (हिंदी) में नौकरी की। यह मेरी पहली ऐतिहासिक गलती थी। याद है 28 सितंबर 2006, जब मैंने तय किया था कि अब नौकरी नहीं करनी। जाने किस मुहूर्त में नासिरुद्दीन भाई ने लखनऊ से इस नौकरी की खबर दी और मैं अर्थ की दुनिया में अनामंत्रित घुस गया। पिछले साल अक्‍टूबर में ईटी हिंदी में छंटनी शुरू हुई, तो भीतर से मुझे यह खबर मिली कि सातवां नाम छंटनी की सूची में मेरा है। मैं बहुत कुछ समझ पाता और आगे का रास्‍ता तय कर पाता, इससे पहले चौथी दुनिया के दोबारा प्रकाशन की खबर बाजार में आई। व्‍यालोक वहां जा चुका था। अचानक वह कैसे वहां पहुंचा, मैं नहीं जानता था। मेरी छंटनी के दिन करीब आ रहे थे। हमारी बात रोज़ाना होती थी और उसके कहने पर मैंने एकाध लोगों को चौथी दुनिया में भेजा भी था। अचानक उसने एक दिन फोन किया कि आ जाओ।

बिना किसी प्‍लानिंग और सोच के मैंने अगले दिन चौथी दुनिया का दामन थाम लिया। ईटी से इस्‍तीफा दे दिया। कम पैसे पर गया, लेकिन आकर्षण अच्‍छी पत्रकारिता करने का और बड़े संपादक के नीचे काम करने का था। दूसरे यह, कि पिछले कई साल से मैं और व्‍यालोक जो एक साथ काम करने का सोच रहे थे, उसके भी पूरा होने का संतोष था। यह बात 16 फरवरी की है, सिर्फ तीन हफ्ते ही हुए हैं।

मैंने चौथी दुनिया से परसों इस्‍तीफा दे दिया। कम लोगों को अब तक यह खबर है। कुल जमा तीन हफ्ते रहा वहां। आज व्‍यालोक से मैंने अपने तईं सम्‍बंध खत्‍म मान लिया है। मान लिया है कि बुनियादी राजनीतिक आस्‍थाएं निजी रिश्‍तों पर भारी पड़ती हैं।

वहां हुआ क्‍या आखिर। वहां पहुंच कर जाना कि चौथी दुनिया के संपादक को छोड़ संपादकीय टीम पर वास्‍तव में संघियों ने कब्‍जा कर लिया था। एक एबीवीपी का जेएनयू में पूर्व अध्‍यक्ष तो दूसरा सचिव। मुझसे संतोष भारतीय ने पूछा था कि तुम वामपंथी तो नहीं। बात हंसी में उड़ गई थी। मैं नहीं जानता कि उन तीनों से (व्‍यालोक समेत) नियुक्ति के वक्‍त यह पूछा गया था या नहीं कि वे दक्षिणपंथी तो नहीं।

मैं वहां से क्‍यों चला आया। क्‍योंकि बहुमत की प्रतिगामी राजनीति वहां मुझे शिकार बना रही थी- सही। क्‍योंकि अखबार निकलने से पहले उसे राजनीतिक संगठन की तरह चलाया जा रहा था- सही। क्‍योंकि वहां काम करने के वक्‍त तय नहीं (सुबह 10 से रात 12 भी कम हैं। मैंने गिना तो पता चला कि 16 फरवरी से 7 मार्च के बीच मैंने करीब 160-180 घंटे वहां दिए)- यह भी सही है। लेकिन सबसे बड़ा दुख यह रहा कि सबसे बुरे दिनों के दो साथियों में एक के भीतर राजनीतिक बहुमत से पैदा वर्चस्‍व का भाव आ चुका था। मुझे सुबह से शाम तक महसूस करवाया जा रहा था कि मैं वहां लाया गया हूं। मेरे कान भरे जा रहे थे। मुझे चुप रहने को कहा जा रहा था। मुझे निर्देश दिए जा रहे थे, यह कहते हुए कि तुम्‍हें तीन महीने लगेंगे इस गैंग में शामिल होने में। बकौल संपादकीय टीम के प्रमुख, हम यहां एक गैंग बना रहे हैं।

क्‍या यह सब संपादक को पता है। मैं नहीं जानता। मेरी बात भी नहीं हुई छोड़ने के बाद। मेरे पास संघी और सामंती राजनीति को राजनीतिक तरीके से ध्‍वस्‍त करने का एक तरीका था- उसके विपक्ष को समाप्‍त कर देना। सो मैं चला आया।

दुख इस बात का है कि दिल्‍ली का मेरा सबसे करीबी साथी यह नहीं जानता कि मैं किस कारण से चला आया। उसने जानने की कोशिश भी नहीं की, कोई फोन नहीं। वे लगे हैं अखबार निकालने में उसी पुराने तेवर के साथ। अच्‍छा है। पत्रकारिता में ऐसी स्‍पेस कम ही जगह मिलती है। लेकिन चौथी दुनिया पर संघियों का कब्‍जा एक मौजूं सवाल है। इसकी खबर किसी को नहीं।

हम इस बात को काफी आगे भी बढ़ा सकते हैं। समाजवादियों और संघियों के बीच ऐतिहासिक गठजोड़ की व्‍याख्‍या कर सकते हैं। लेकिन मेरी इसमें फिलवक्‍त दिलचस्‍पी नहीं।

मैंने एक बार फिर तय किया है कि नौकरी नहीं करनी है। काफी विश्‍वास के साथ। पहली दुनिया के बारे में कोई भ्रम कभी नहीं था। अब तो चौथी दुनिया का भी मिथक टूट ही चुका है। नई दुनिया कैसे बन-बिगड़ रही है, सभी देख ही रहे हैं। अपनी दुनिया में लौट कर बाकी दुनियाओं पर सोच रहा हूं। इकलौता दुख इस बात का है कि अपनी दुनिया का एक साथी अब 'अपनी दुनिया' में वापस जा चुका है। बैताल फिर डाल पर है...।

 

 

 

 

Monday, September 24, 2007

टीवी पत्रकारिता के लिए खुद को बदलने का वक्त

एक दिन में क्या क्या बदल सकता है। ये सवाल आप तीन वजहों से पूछिए। पहला, एक निजी समाचार चैनल को एक महीने की बंदी का फरमान जारी हुआ। दूसरा, एक लड़की ने अपने आप को काम के बोझ, या किसी तनाव में खत्म कर डाला, लड़की टीवी पत्रकार थी। एक दिन में होने वाली इन दो घटनाओं के रिश्ते टीवी पत्रकारिता से इतने गहरे है कि इस दाग को अपने दामन से वो हटा नहीं पाएगा।

टीवी के लिए ये एक ठहराव है। जहां से अब जब वो आगे बढ़ेगा, तो उसे सोचना, समझना और फूंक फूंक कर कदम बढ़ाना होगा। ये झटके उसकी निजी और सामाजिक गलतियों से पनपे है। एक दिन एक खबर में अपनी सफलता के परचम को देखते हुए किन्ही मासूमों को फ्रेम करने वाले एक पत्रकार को एक दिन की सफलता ने ले डूबा, तो टीवी के मायाजाल में उलझी एक लड़की को जिंदगी में मनचाहा न मिलने पर जिंदगी के नाता तोड़ लेना ही रास्ता दिखा।

एक खबर से लोकतंत्र में मिले अधिकार को हाशिए पर लाया जा सकता है। इसकी मिसाल बनी टीवी की एक खबर ने टीवी पत्रकारिता के चरम को हिला कर रख दिया है। लेकिन इसके पीछे एक सच, जो अब एक मौत के बाद चुभने वाला बन चुका है। एक पत्रकार को क्या मार डालता है। उसका काम। उसका नाम या उसके प्रति जिम्मेदारों का असंवेदनशील चेहरा।

कई पहलू उभरे एक महिला पत्रकार की मौत से। छोटे बड़े शहरों, हर तरह के सामाजिक वर्गो, हर तरह की पारिवारिक ढांचों से आने वाले युवक-युवती। सबमें टीवी को लेकर चाहत है, दिखने की चाहत। टीवी की मांग के अनुरूप, इन सुंदर चेहरों को इस्तेमाल भी किया जाता है। उन्हे तव्वजो मिलती है। लेकिन इसी से बढ़ जाती है उनकी अपेक्षाएं। टीवी पत्रकारिता में बहुमुखी होने के अपने लाभ है। लेकिन इनके साथ आब्जेक्टिव होना चुनौती है।

एक पत्रकार की मौत और चैनल को लगे कोमा के बीच जो सबसे कमजोर कड़ी है वो है एक लड़की। स्टिंग में भी एक लड़की को गलत दिलासे के जरिए इस्तेमाल किया गया। और मौत के पीछे भी लड़की की लिखा वजह, उसको दी जा रही प्रताड़ना रही। ऐसे में सवाल है कि गलती किसकी ओर से हो रही है। कौन ज्यादा अपेक्षा कर रहा है। काम करवाने वाला या काम करने वाली।

टीवी को जो भी दिखना है, वो उसकी बुनियादी सोच से ही बनता है। अगर टीवी चैनल एक नारी को किसी भी तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं तो निश्चित ही मीडिया में भी काम कर रही महिलाओं की स्थिति उम्दा नहीं होगी। फिल्मी पर्दे पर नंगई और कास्टिंग काउच के रिश्ते को समाज समझता है। टीवी में उसके स्वरूप को वो अब धीरे धीरे करके देख रहा है।

क्या समाज को ऐसी घटनाओं, बंदी और मौत, से कोई फर्क पड़ता है। क्या इससे इस पेशे की गरिमा पर कोई आंच आने वाली है। क्या मर रही टीवी पत्रकारिता को आने वाले समय में नई सांस और फांस के लिए तैयार रहना चाहिए। सवाल कई है लेकिन जवाब देने के लिए कोई आगे नहीं आता दिखता।

खुद की गरिमा से खेलकर टीवी पत्रकारिता ने एक तरह से खुद के खोखलेपन को दर्शाया है। आदर्शी बुनियादी उसूलों से परे होकर वो एक ऐसा कल्पना लोक गढ़ चुका है जहां सोच की सीमितता ही सत्य है।

हमें इसे लेकर गंभीर चिंतन करना चाहिए। क्योंकि खबरों से आप ही नहीं आपका परिवार भी प्रभावित होता है। और ये परिवार एक समाज का हिस्सा है।

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Sunday, August 19, 2007

सरोकार से शोर की पत्रकारिता

आउटलुक हिंदी देखी। चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता, या कहें कि विध्वंस प्रस्तुति को लेकर कवर स्टोरी छपी है। देखकर अजीब लगा। प्रासंगिक है। लेकिन क्या सरकार की एक मुहिम की छांव में चैनलों की हकीकत बताना जायज है।

समाचार चैनलों पर क्या दिखाया जाएगा, ये तय करना समाज का काम है। लेकिन भारत जैसे देश में समाज की सहमति को लेकर ही कई तरह के भ्रम जनसंचार माध्यमों में नजर आते है। पत्रिका में जो विमर्श है, वो समाज में नहीं दिखता। एक बड़े पत्रकार ने लिखा कि किसको बता रहें है कि जो दिखाया जा रहा है, वो सही नहीं है। जो टीवी देखता है, वो आम आदमी हो या खास, वो अपनी व्यस्तता के बाद ही इस चौखटे के सामने बैठता है। और इसी व्यस्तता की थकान मिटाने को टीवी चैनलों ने इस चौखटे को मनोरंजन का माध्यम बना रखा है।

सिनेमा को लेकर यहीं निष्कर्ष निकाला जाता है आदमी को वो दिखाओ जिससे वो सिनेमाहाल में अपनी निजी जिंदगी को भुला बैठे। यानि एक तरह की माया। जिसमें आप अपनी पहचान भुला बैठें। तो क्या टीवी ने भी आपको अपनी पहचान भूलने पर मजबूर कर दिया है।

गाहे बगाहे आप अपने अखबार में टीवी की खबरों के चुनाव और असर को लेकर लेख पढ़ते रहते है। इसकी प्रासंगिकता भी खबर को भूलने तक रहती है। क्या इसे दौर कहना उचित होगा, जब एक जल्दीबाजी में टीवी मीडिया खबर और मनोरंजन के बीच की रेखा को भुला बैठा है। क्या खबर को देखने का दिन कोई और होगा।

अनुभव यहीं बताते है कि तकनीकी और समय के साथ मीडिया के विषय उतने ही सीमित होते जाते है, जितनी उनका असर। एक खबर आपको कब तक बांध सकती है। अधिकतम एक दिन। तो फिर कैसे सोचा जाए कि मीडिया का असर लम्बा रहेगा। समाज बदलने की हद तक।

आज विकसित देशों में हर तरह की मीडिया पर नजर रखने के लिए हर तरह के संगठन और तमाम विकल्प मौजूद है। लेकिन क्या इससे किसी देश में सरकार और समाज के बीच मीडिया खड़ा है। क्या वो पुल है। जिससे गुजरकर सूचना समाज के लिए खबर बन जाती है। किसी भी देश में देख लीजिए। बड़े मीडिया समूह पर किसी न किसी घराने का कब्जा है। और यहीं खबर पर कब्जे की वजह है।

विकासशील देशों के हाल और भी नाजुक है। यहां पहले तो मीडिया विकसित सोच की अवस्था में नहीं है, और अगर एक दो देशों में है भी तो वहां दिशा और दशा तय करने वाले कारक उसे प्रभावित करते रहते है।

भारत में पत्रकारिता के आयाम राजनीति, समाज और समय के साथ अर्थ रहे है। सरोकार से शोर की पत्रकारिता आज मौजूद तो है, लेकिन उसका चेहरा बदल सा गया है। आज खबर लहरी है तो साथ में वार्ता फलक भी है। आज द हिंदू है तो टाईम्स आफ इंडिया भी है। आज एनडीटीवी इंडिया है तो स्टार न्यूज़ भी है।

दो चेहरों के बीच खबर ने स्वरूप और सामर्थ दोनों खो दिया है। बचा है तो केवल एक विश्वास कि एक दिन केवल पत्रकारिता के लिए पत्रकार होगा और खबर के लिए हायतौबा।

सूचक
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