Sunday, August 19, 2007

सरोकार से शोर की पत्रकारिता

आउटलुक हिंदी देखी। चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता, या कहें कि विध्वंस प्रस्तुति को लेकर कवर स्टोरी छपी है। देखकर अजीब लगा। प्रासंगिक है। लेकिन क्या सरकार की एक मुहिम की छांव में चैनलों की हकीकत बताना जायज है।

समाचार चैनलों पर क्या दिखाया जाएगा, ये तय करना समाज का काम है। लेकिन भारत जैसे देश में समाज की सहमति को लेकर ही कई तरह के भ्रम जनसंचार माध्यमों में नजर आते है। पत्रिका में जो विमर्श है, वो समाज में नहीं दिखता। एक बड़े पत्रकार ने लिखा कि किसको बता रहें है कि जो दिखाया जा रहा है, वो सही नहीं है। जो टीवी देखता है, वो आम आदमी हो या खास, वो अपनी व्यस्तता के बाद ही इस चौखटे के सामने बैठता है। और इसी व्यस्तता की थकान मिटाने को टीवी चैनलों ने इस चौखटे को मनोरंजन का माध्यम बना रखा है।

सिनेमा को लेकर यहीं निष्कर्ष निकाला जाता है आदमी को वो दिखाओ जिससे वो सिनेमाहाल में अपनी निजी जिंदगी को भुला बैठे। यानि एक तरह की माया। जिसमें आप अपनी पहचान भुला बैठें। तो क्या टीवी ने भी आपको अपनी पहचान भूलने पर मजबूर कर दिया है।

गाहे बगाहे आप अपने अखबार में टीवी की खबरों के चुनाव और असर को लेकर लेख पढ़ते रहते है। इसकी प्रासंगिकता भी खबर को भूलने तक रहती है। क्या इसे दौर कहना उचित होगा, जब एक जल्दीबाजी में टीवी मीडिया खबर और मनोरंजन के बीच की रेखा को भुला बैठा है। क्या खबर को देखने का दिन कोई और होगा।

अनुभव यहीं बताते है कि तकनीकी और समय के साथ मीडिया के विषय उतने ही सीमित होते जाते है, जितनी उनका असर। एक खबर आपको कब तक बांध सकती है। अधिकतम एक दिन। तो फिर कैसे सोचा जाए कि मीडिया का असर लम्बा रहेगा। समाज बदलने की हद तक।

आज विकसित देशों में हर तरह की मीडिया पर नजर रखने के लिए हर तरह के संगठन और तमाम विकल्प मौजूद है। लेकिन क्या इससे किसी देश में सरकार और समाज के बीच मीडिया खड़ा है। क्या वो पुल है। जिससे गुजरकर सूचना समाज के लिए खबर बन जाती है। किसी भी देश में देख लीजिए। बड़े मीडिया समूह पर किसी न किसी घराने का कब्जा है। और यहीं खबर पर कब्जे की वजह है।

विकासशील देशों के हाल और भी नाजुक है। यहां पहले तो मीडिया विकसित सोच की अवस्था में नहीं है, और अगर एक दो देशों में है भी तो वहां दिशा और दशा तय करने वाले कारक उसे प्रभावित करते रहते है।

भारत में पत्रकारिता के आयाम राजनीति, समाज और समय के साथ अर्थ रहे है। सरोकार से शोर की पत्रकारिता आज मौजूद तो है, लेकिन उसका चेहरा बदल सा गया है। आज खबर लहरी है तो साथ में वार्ता फलक भी है। आज द हिंदू है तो टाईम्स आफ इंडिया भी है। आज एनडीटीवी इंडिया है तो स्टार न्यूज़ भी है।

दो चेहरों के बीच खबर ने स्वरूप और सामर्थ दोनों खो दिया है। बचा है तो केवल एक विश्वास कि एक दिन केवल पत्रकारिता के लिए पत्रकार होगा और खबर के लिए हायतौबा।

सूचक
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1 comment:

अनूप शुक्ला said...

दो चेहरों के बीच खबर ने स्वरूप और सामर्थ दोनों खो दिया है। बचा है तो केवल एक विश्वास कि एक दिन केवल पत्रकारिता के लिए पत्रकार होगा और खबर के लिए हायतौबा। सही है!