Monday, August 06, 2007

न हंसिए न रोइए, केवल खुद को बचाईए

ब्राडकास्टिंग सर्विसेज रेग्युलेशन एक्ट 2007 के प्रारूप में नजर डालने पर आदर्श और व्यावहारिकता के बीच का फासला नजर आने लगता है। ये पत्रकारिता पढाने वाली संस्थाओं के निकले छात्र और काम करने वाले युवाओं के अनुभव से बेहतर समझा जा सकता है। चौथे पन्ने पर न्यूज एण्ड करेंट अफेयर्स चैनल की परिभाषा देख कर समझा जा सकता है कि खबर के जिस पहलू को हम आज समाचार चैनलों पर देखते है, वो न तो आदर्श में सही है न ही व्यावहारिकता में। मसलन परिभाषा में, एक चैनल को हालिया घटनाओं की रिपोर्ट, बहस, विचार, जनता के बड़े हिस्से की रूचि को दिखाने वाली खबरों, ऐसे व्यक्ति और संस्थाओं को, जो राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर जुड़े हो, की खबरें दिखाता हो। ये उस कागज पर लिखा है, जो आने वाले दिनों में हर चैनल के चेहरे पर चिपका होगा।

तो क्या चैनल इसे अपनाने को तैयार है। नहीं। वे स्वयं पर खुद नियंत्रण वाले मूड में है। यानि सेल्फ रेग्युलेशन। नया शब्द नहीं है। पर चैनल चलाने वाले खर्चो के आगे किसी तरह की रेग्युलेशन नहीं पहचानते। वक्त बदला है। लाइव का तमाशा है। इमोशनल खबरों की पूछ है। लो सोसाइटी के विजुअल की इलक नहीं है। शहरों की खबरे है। अपराध की बाढ़ है। और है कुछ मिनट के विजुअल पर घण्टों खेलने का माद्दा।

जरा अपने बच्चे से पूछ कर देखिए क्या वो काण्डोम या एड्स के बीच के संबंध को जानता है। पर वो सेक्स और सेक्सी के अंतर को समझने लगा है। एक हालिया फिल्म में बच्ची नाम सेक्सी पुकारा जाता है।

शिक्षा के दूर जाते चैनल अब आसानी से मिल जाने वाली दोयम दर्जे की खबरों को दिखा दिखा कर समाज को समझा रहे है कि यहीं खबर है। इसे ही देखिए। यही है। पारिवारिक मूल्यों की नींव अब अपराध और नाजायज संबंधों ने हिला दी है। अब केवल समाज में बलात्कार ही नही होता। होता है खुलेआम आवासीय मुहल्लो से देह व्यापार, जिसे स्टिंग आपरेशन से दिखाया जाता है आपको।

रोकना था किसी न किसी को। नागरिक समाज की चेतना को कौड़ी के भाव मानने वाले समाचार चैनलों के स्वयंभू प्रवक्ता अब दिशाहीन नाव के सवार है। एक स्थापित प्रिंट जर्नलिज्म की चीखोपुकार को वे हताशा बताते है। नौकरी पाने की हताशा।

आने वाले दिनों में आप टीवी पर जो देखेंगे वो आपको आपकी आने वाली कई पीढ़ियों तक व्यवहार और आचार में देखना पड़ेगा। किसी दिन किसी तमाशे के किरदार आप होंगे और उस दिन आप न हंस सकेंगे न रो।

http://mib.nic.in/informationb/POLICY/Bill200707.pdf

Soochak
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1 comment:

संजय तिवारी said...

अब बड़ा सवाल यह है कि खबर क्या है?