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Tuesday, July 17, 2007

नहीं पता कैसे बचेगी हिंदी

आसपास हिंदी है। बातचीत हिंदी है। माध्यम हिंदी है। और हर जनसंचार माध्यम के साथ हिंदी है। तो क्या माना जाए कि हिंदी, जो कि अब ब्लाग के हजारों पन्नो पर मौजूद है, इतनी लोकप्रिय हो चली है कि उसे रोजाना खबर बनाना जरूरी नहीं है। लगता कुछ ऐसा ही है।

आठ बार हो चुके विश्व हिंदी सम्मेलन के फायदे क्या है। इस बार के हिंदी सम्मेलन में नामधन्य लोग नहीं गए। कहा कि फिजूल है। वहां तो फला विचारधारा का कब्जा है।

तो क्या हिंदी विचारधारा में फंसी भाषा है। वो भारतीय नहीं है। वो किसी लेखक और प्रचारक की मोहताज है।

विदेश मंत्रालय तो इसे हर साल फैलाए जा रहा है। लोग तीन दिनों में इसकी सुध भी ले लेते है। लेकिन क्या हिंदी जनसंचार माध्यमों से फैल रही है। नहीं।

जिस हिंदी की बात इन सम्मेलनों में होती है वो कही किताबों और इतिहास में दर्ज है। आज वैश्वीकरण की जिस तरीके को हिंदी ने ढाला है, वो अनोखी है, क्रियात्मक है।

लेकिन हमारा सरोकार क्या है। टीवी इसे देखता नहीं, रेडियो को गाना बजाने से फुरसत नहीं। पेपरों में कुछ सौ शब्दो में हिंदी की कहना संभव नहीं। तो कैसे बचे हिंदी।

मेरा लिखना केवल लिखना भर है। मैं विचार के तौर पर जानता हूं कि हिंदी को समय और काल ने घेर रखा है। उसे अपनाना हीनता का भाव लाता है। उससे दूर रहना उच्चता है।

टीवी से हिंदी को समय देना अब केवल सपना भर है। रेडियो के विकास ने हिंग्लिश को पनपा रखा है। अखबारों में अंग्रेजी भाषा के शब्द घुस रहे है। तो कैसे बचे हिंदी।

नहीं पता कैसे बचेगी हिंदी।

सूचक
soochak@gmail.com

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Wednesday, March 21, 2007

ब्लाग की बाजार में कीमत

हिंदी व्यावसाईक भाषा नहीं है। इसमें व्यापार करना मुश्किल है। ये बात आम मानी जाती है। और शायद सच भी। एक साल से हिंदी में चल रहे ब्लागों को देखकर भी ऐसा अहसास होता है। अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम के तौर पर हर दिन हिंदी में आठ से दस ब्लाग तो बन ही रहे है। कहानी, कविता, विश्लेषण, बाजार और स्वयं की सोच को रखने के तौर पर ब्लाग बन-बुन रहे है। लेकिन क्या व्यवसाय हो रहा है। सवाल तीखा हो सकता है। आंकड़ो की कहें, तो जरूर ही। देश में अभी कुछ फीसदी ही इंटरनेट उपभोक्ता है। और इनमें से भी एक सीमित संख्या में ऐसे कम्प्यूटरों से जुड़े है, जो हिंदी को दिखा सकें। तो ऐसे में कितने लोग हिंदी को आपस में फैलाकर लोकप्रिय बना रहे है, सवाल ये है। हिंदी को एक भाषा और संस्कृति के तौर पर अपनाने के दावे को पूरा करने में सरकारें असपल रही हैं। तो क्या माना जाए कि इंटरनेट इसे कर पाएगा। कुछ रूकावटें है। जिन्हे अब पार पाने की कोशिशें जारी है। तकनीकी को छोड़ दें, तो अपनाने और उसे फैलाने में हित का सवाल बड़ी है। क्यो विस्तार दिया जाए। जिस एक प्रमुख प्रथम वेबसाइट ने इस कार्य को शुरू किया, उसके हित और मंजिल साफ थे। आज वो रीजनल बाजारों में मौजूद है। बाजार के सारे व्यावसाइक फंड़ो के साथ। वो कमा रहा है, लेकिन ब्लाग वाले लिख तो रहे है, पर क्या वे बाजार को देख रहे हैं। बाजार को देखना पड़ेगा। क्यों। क्योंकि जिस जमाने की देन ब्लाग और अभिव्यक्ति के नए माध्यम है, वो सीधे बाजार से जुड़े है। दुनिया भर की चर्चित ब्लाग प्रोवाडर्स की कमाई का जरिया भी बाजार के विग्यापन है। तो कहां छिपा है हिंदी ब्लागर्स का बाजार। देश में इंटरनेट की गति, ब्लाग पर मौजूद आम आदमी लायक जानकारी, ब्लाग से रोजाना के जीवन में होने वाले प्रभाव, दबाव समूहों के तौर पर ब्लाग का उभरना, ब्लाग को समस्या या जानाकरी के लिए प्रयोग किया जाना। तमाम ऐसी जरूरतें है जिनसे जुड़कर ही भारत का हिंदी ब्लाग का आकाश तारें पैदा कर सकता है।

गंभीरता से नजर डालने पर ज्यादातर ब्लाग सर्वव्यापकता के शिकार दिखते है। ये ईमेल के शुरूआती दिन जैसा है। लोग ईमेल आने का इंतजार करते थे। आज कमेंट का इंतजार है। लेकिन वो आता भी है तो एक गिने चुने वर्ग से। सो प्रसन्नता से ज्यादा निराशा होती है। हमेशा वहीं नाम। दूसरी ओर ज्यादातर ब्लाग लेखक क्रांतिकारी दिखते है। वे एक मुहिम के तौर पर ब्लाग चलाते है। जैसे कुछ को पढ़ाकर वे दुनिया बदल लेंगे। जुबानी प्रचारों के जरिए भी मशहूर होने वाले ब्लाग आज हाशिए पर है। अंग्रेजी में कच्चा चिट्ठा खोलने वाले मशहूर ब्लाग- वार फार न्यूज- को भी लोकप्रियता का चरम माने तो व्यवसाय का क्या। क्या कमाना जरूरी है। उद्देश्य से बढ़कर। हां, सवाल कमाने का नहीं, उद्देश्य पूर्वक कमाने का है। लोगों को जोड़ना आपके बस में हो या न हो, लेकिन उनका जो भी वक्त आपके साथ बीते, उसकी कीमत होनी चाहिए। ये फ्री टू एयर का जमाना हो सता है, लेकिन पे चैनल होकर ही आप आधार बनाते हैं। रही बात भविष्य की तो, वो हमारा होगा। लेकिन आप विकसित देशों में अपने आप को लोकप्रिय बनाने की ओर सोचें तो। अमेरिका या लंदन में बसे लाखों भारतीय हर चीज कीमत देकर खरीदते है। आपके लिए ये ग्राहक और प्रशंसक दोनों है। पर भारतीय होने के गर्व के साथ आप पेश करने में माहिर हो तो। अपनी बहस को आगे बढ़ाने का इच्छुक हूं। इसलिए नहीं कि कमाना चाहता हूं। इसलिए कि कीमत होने पर ही आप स्वाकीरे जाते हैं।

सूचक
soochak@gmail.com

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