Saturday, June 30, 2007

'वार्ताफलक' की विरासत

सूचना अपने रास्ते खुद ब खुद बना लेती है। जैसे पानी। लेकिन ऐसा कौन सा जरिया है जो किसी सूचना को सबसे प्रभावी तरीके से आप तक पहुंचा सकता है। प्राचीन समय में नगरों में राजा के दूत ढोल नगाड़े बजाकर लोगों को ऊंची आवाज में सूचित करते थे। ये सिलसिला लिखने पढने की सहजता और स्वीकार्यता के बाद कागजों पर छपवाकर बंटवाने में जारी रही। देश का जो पहला प्रिंटिंग प्रेस लगा, वो एक मिशन के कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए ही लगा। और यहीं से शुरू हुआ दिन भर की घटनाओं को छापकर लोगों को जागरूक बनाने का काम। फिर संचार माध्यमों के विकास के साथ हम आप दृश्य श्रव्य माध्यमों की बदौलत आज जिस भी मुकाम पर है, वो सुविधाजनक कहा जा सकता है।

एक फ्रेज है वर्ल्ड आफ माउथ। इसका अर्थ है मुंहजबानी। यानि एक खबर की मंजिल उसे कई जबानों से मिलती जाती है। जैसे एक बात जो पत्रकारिता में हर कोई कभी न कभी कहता सुनता मिलता है। कि राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि सौ रूपए का दस पैसा ही वहां तक पहुंचता है जहां के लिए वो सौ रिलीज हुआ है।

आज के जमाने में वर्ल्ड आफ माउथ की अहमियत है। समय नहीं है। पढ़ने की रूचियां कम हो रही है। देखने सुनने के लिए पूरा संसार टीवी पर है। लेकिन काम से बचे वक्त में देखना भी तय हो चुका है। सबकुछ नहीं देखा जा सकता है। तो एक शहर में ऐसा क्या बचा है जो अनोखा है।

अनोखा है वार्ताफलक। वार्ता यानि बातचीत, फलक यानि वो स्थान जहां कुछ देखा जा सके। या मैं थोड़ा सा अर्थ में भ्रमित हूं।

पूना या पुणे में आज भी हर चौराहे हर गली पर आपके एक वार्ताफलक टंगा या रखा दिखेगा। ये अनोखा इस अंदाज में है कि इसमें आपको सबकुछ लिखा मिल सकता है। खबर, असर, नैतिकता, धर्म, अधर्म, टिप्पणी आदि।

पुणे में ये क्यो जीवित बचा है ये सवाल गौर करने लायक है। ये अपने आप में सामुदायिक भावना का प्रतीक है। और एक तरह की जीवंत पत्रकारिता का संबल।

सराय के जरिए एक शख्स इस विरासत पर शोधरत है। हमें उम्मीद है कि जो भी नतीजे आएंगे वे समाज की इस विधा को आगे बढ़ाने में मददगार ही होंगे।

http://vartaphalak-photos.blogspot.com/

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1 comment:

Pratik said...

साथ ही यह भी पता चलता है कि पुणे ज़िन्दा शहर है। नहीं तो बाक़ी शहर भाग-दौड़ की मशीन हो चुके हैं।