Sunday, December 31, 2006

क्यों बार बार दिख रहा है सद्दाम..

टीवी जनक्रांति ला सकता है या नहीं। ये सवाल सद्दाम के साथ खड़ा हुआ है। एक देश के अतीत को जिस तरह सरेआम फांसी देते दिखाया गया, वो क्रोध पैदा करता है। टीवी पर वो शांत तानाशाह है। अतीत में उसके गुनाह आज के फैसले की वजह है। पर। सवाल है। क्या ये सही था। क्या मारने से ज्यादा भय पैदा करना जरूरी था। टीवी अपनी हदें जानता हो या न जानता हो। पर देखने वाला टीवी से हकीकत देख रहा है। हकीकत जबरन न्याय देने की। लोकतंत्र के नाम फंदा डालने की। और शांत तानाशाह आह न भरते हुए बिन नकाब डाले जिंदगी सौंप देता है। दुनिया में कई तानाशाह है। वे जरूर टीवी पर इतने हिला देने वाले दृश्य देखकर हिल गए होंगे। टीवी के माध्यम में ये एक मोड़ है। कैसे। क्यों। पिछला टीवी पर देखा कोई दृश्य याद करिए। मुझे तो ट्विन टावर का गिरना याद आता है। एक साम्राज्य के खंभों पर इसे हमला करार दिया गया। साथ ही लोकतंत्र पर भी। अब कल-आज देखे गए दृश्यों को याद करिए. वो सद्दाम जिसे कभी बहादुर माना गया। शांत रहते हुए फँदा कुबूलता है। टीवी ने अभी तक कोई ऐसी निजाम नहीं पेश की जो जनभावनाओं को एकाकार करने वाली हो। पर फांसी के ये शांत विजुअल आगामी तूफान के संकेत लिए हुए लगते है। विचार करिए। एक देश में जिस घुसपैठ को अमेरिका के लोग ही गलत मानने लगे हो, वहां पर लोकतंत्र के नाम पर इस तरह का नजारा। चुभता है। गलत के साथ गलत ठीक है। पर तरीका इतना टीवीनुमा होगा। आक्रोश दिखने लगा है। टीवी को जिन पलों का इंतजार सदियों में रहता है। वो शायद जाने अनजाने घट रहा है। पर क्या इसे दिखाया जाना जरूरी था। आज देखिए एक एमेच्योर वीडियों सभी चैनलों पर दौड़ रहा है। कैसे लटका तानाशाह। कैसे और क्यों खींचा गया ये वीडियों। तमाशा बनाया जा रहा है। डर बिठाया जा रहा है। और सभी दिखाने वाले चैनल एक बड़ी साजिश को बढ़ावा दे रहे है। क्यो लाश न दिखाने वाले समाचार चैनल बार बार सद्दाम को लटकाने, उसके शव और पूरी फांसी प्रक्रिया को बार बार दिखा रहे है। टीवी हदें भूल रहा है। जनता नाराज हो रही है। क्रांति सुलग रही है। आप देखे तो बुरा, न देखें तो बुरा। बहरहाल एक इंसान को मरते देखना कभी भी इंसानियत नहीं कहलाती। पर टीवी इसे नहीं समझ रहा है। आप समझिए। आप सोचिए। और चैनल बदलने में देर न करिए।

सूचक
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1 comment:

श्रीश । ई-पंडित said...

आपका आक्रोश समझ आता है। इस खेल में सभी के अपने स्वार्थ हैं। अमरीका दुनिया को डराना चाहता है। टीवी चैनलों के बारे में कहने की जरुरत नहीं कि उन्हें बस अपनी टीआरपी से मतलब है।