Monday, January 01, 2007

खबरों से दूर, नए साल का तमाशा भरपूर

मुबारक हो। इस सदी का सातवां कदम। टीवी पर हंगामा मचा रहा। कही मल्लिका। कही राजू। कही नाच। तो कही गलबहियां करते पेयर। तो इन सब के बीच नया साल मनाना टीवी को भाता है। नए रेजोल्यूशन के बारे में पूछने पर कोई कैमरे पर कहता है कि वो ज्यादा घूमेगा। ज्यादा खाए पिएगा। और एक ने तो कहा ज्यादा सिगरेट पिऊंगी। भला हो। तो ३१ दिसम्बर का सूरज ढलते ही टीवी पर रोशनी फैल गई। एंकर कहता है.. और आप देख सकते है कि किस तरह लोग नए साल के स्वागत में नाच रहे है, झूम रहे है, खुश हो रहे है...। खैर नया तो नया है। पर हंसी के नमूने छाए रहे। कुछ कार्यक्रमों से पहचान बना चुके हंसोड़ समाचार चैनलों पर साल के मश-हूरों को खींचते रहे। क्या खीचें। भौंड़ापन ही ज्यादा खिंचा। क्यों जररूत पड़ी इस भौंडेपन की। क्या हंसना हंसाना ही धर्म बन चुका है। और वो भी समाचार चैनलों का। पूरा दिन ऐसा लगा कि कही न गम है और न कही रूसवाई। मानता हूं कि कामेडी फिल्म भी देखनी चाहिए। पर क्या बदलते साल में सचाई से दूर जाकर। चलिए तर्क है। कुतर्क के साथ। पर सच भी है। एक ऐसे साल में जब देश ने विकास और अवसान दोनों देखा हो, तो टीवी पर साल के आखिरी रात को केवल नाच, गाना, ठुमके, विदूषक, एस्ट्रोलाजी और भौंड़ी नकल देखना नहीं सुहाता। फिर क्या देखें। साल भर में ऐसी तमाम प्रेरक और बदलावकारी घटनाएं हुई जो रोचक भी रही। और तो और अगर केवल सबक ही लेना हो तो राष्ट्रीय चैनल से लिया जा सकता था। दो एंकर, दो अतिथि और पूरे देश से संपर्क। गंभीर बातें, चटपटे अनुभव और बीच बीच में स्वाभाविक होता संचार। खैर इसे पुराना फार्मेट कहकर खारिज किया जा सकता है। पर वास्तविकता के करीब लगा। लोग मंदिरों में जाकर भी नए साल का इंतजार कर रहे थे। तमाम समाचार चैनलों पर भविष्य की छवि भी अखरने वाली लगी। क्यों जानना है भविष्य। क्यों बताना है। श्रम के महत्व की बात को तो कही भी नहीं परोसा गया। एक देश जिसमें हजारों बोलियां, पहनावा, व्यंजन और माटी माटी के लोग बसे हो वहां खबर ये है कि सब नाच गा रहे है। सब हंस रहे है। सब भविष्य जानने को आतुर है। टीवी को जानना पड़ेगा अपना भविष्य। दिखता तो सीमित औऱ संकुचित ही है। बहरहाल नववर्ष मंगलमय हो...

सूचक
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1 comment:

श्रीश । ई-पंडित said...

आपकी बातें एकदम सही हैं, लेकिन क्या करें इस मौके पर सभी खुशियाँ ही तलाशते हैं।