Thursday, July 26, 2007

शून्य में जीते हम आप

क्या आपको पता है देश में एक ऐसा कानून बनने जा रहा है जो गर्भवती महिलाओं की संख्या का हिसाब रखेगा।

क्या आपको पता है कि देश में के वन कानून में बड़ा बदलाव किया जा चुका है।

क्या आपको पता है कि आईआईएम में अब सरकार निदेशकों के पद भरेगी। इसके विज्ञापन भी निकाले जा चुके है। इससे पहले ये वहां की गवर्निंग बॉडी का काम था।

क्या आपको पता है कि देश में बाल श्रम को लेकर जो कानून लागू है, उसके अनुसार आपको जेल और जुर्माना दोनो हो सकता है।

क्या आपको पता है जंतर मंतर पर आप पांच हजार से ज्यादा की संख्या में धरना नहीं दे सकते है।

क्या आपको पता है कि देश की राजनीति में क्या हो रहा है। और केवल राजनीति ही नहीं जिन नीतियों को राजनेता बनाते है या पेश करते है, वे आपको किस तरह से प्रभावित करने वाली है।

देश में जो हो रहा है, उसका एक चेहरा दिखाने वाली मीडिया अब देश को राजनैतिक, सामाजिक तौर पर जागरूक करने वाला नहीं रहा। ये एक ऐसा वक्त है जब आप देश की राजनैतिक गतिविधियों के हिस्सेदार नहीं है। क्या ये वक्त की जरूरत है या ये अर्थ के प्रभावी होने का प्रभाव है।

क्या फर्क पड़ता है कि हम न जाने कि हमारे लिए कौन सी नीतियां बनाई जा रही हैं। क्या ये मायने रखता है कि हम ये जाने कि सामाजिक विकास की कौन सी कड़िया हम खोते जा रहे हैं।

जनसंचार माध्यमों की भूमिका के मद्देनजर ये उनका कर्तव्य रहा है कि वे वक्त के आगे और पीछे को जोड़कर पेश करें। मतलब कि खबर से जुड़े सभी सरोकारो को पेश करना उनका काम है। लेकिन यहीं पन्ना अब वर्तमान में सिमटता जा रहा है।

देश के राजनैतिक फलक पर होने वाली घटनाओं में केवल चुनाव, सदन स्थगन, दल-बदल और नेताओं की रार ही नहीं होती। हर दिन किसी न किसी नई नीति पर विचार विमर्श चलता रहता है। जो अगले संसद काल में पेश की जानी होती है। जाहिर है हर नीति आपसे जुड़ी होती है। और इससे जुड़ा होता है समाज। तो अगर टीवी या रेडियो, एक अंश में अखबार ने थोड़ी गंभीरता बनाए रखी है, इन नीतियों को पेश न करें तो आप कैसे जानेंगे कि आने वाले दिनों में आपको टीवी रखने पर भी सालाना टैक्स देना होगा।

माना जाता है कि जिस देश की जनता उसके राजनैतिक प्रक्रिया की हिस्सेदार नहीं, वो एक तरह के शून्य में जी रही है। और ऐसा शून्य आपके जीवन को अंधेरे में रखने जैसा है।

हमारे जनसंचार माध्यम, खासकर टीवी को केवल सामाजिक तमाशे को पेश करने की बजाए ये देखना ज्यादा जरूरी है कि वो सामाजिक ताने बाने को पेश करें। राजनैतिक रस्साकशी के ज्यादा राजनीतिक पहल से बनने वाली नीतियों को आगे लाए। और देश के आवाम को ये बताए कि फला कदम आपको यहां ले जाएगा।

देश के एकाध गंभीर अखबार और टीवी चैनलों को ये देखना और भी जरूरी है कि वो अपनी तारतम्यता बनाए रखे। खबरों के बीच एक हार्ड डोज देकर। आपकी चेतना पर जो पर्दा है, उसे केवल आर्डर आर्डर ही दूर न करें। आप खुद भी शिकायती तेवर दिखाकर ये मांग सकते है कि हमें ये देखना है। ये बड़ी बात नहीं है। आप के पास चैनलों के ईमेल, या पते पर अपनी बात लिख सकते है। जब आपके एसएमएस से चैनल किसी को लोकप्रिय या अलोकप्रिया बना सकते है तो आपकी राय की बाढ़ से क्या वे जरा भी नहीं सोचेंगे। सोचिए।

बहरहाल। देश में रहने के लिए संविधान ने आपको कई अधिकार दे रखे हैं। इनमे से किनको कितना इस्तेमाल करना है ये आप पर है। लेकिन देश को जानने के लिए उसकी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक धड़कन से जुड़ना जरूरी है।

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1 comment:

विजय said...

चर्चा, परिचर्चा, बहस, सुलझा नहीं सवाल।
प्रश्न वही है आज भी, रोटी कपड़ा दाल।
या फिर....
मसाइल पेचीदा नहीं है
सियासतदां ही संजीदा नहीं है।