Friday, July 13, 2007

एक सचाई: कैसे मिले मीडिया में नौकरी - दी एंड

इंटर्नशिप के दौरान

आप पाते है कि आप अपने सपने के पास खड़े है। पहले दिन आपकी सज्जनता पूरे उफान पर होती है। ये एक वक्त होता है, जब आपको लगता है कि जग जीतने की सारी काबिलियतें आपके पास है और यहीं मौका वो सब आपको दे देगा। चैनल या अखबार में हर किसी को सर कहते हुए आप कुछ ही दिनों में फ्रस्टेट हो जाते है। आपको या को फीड के टीसीआर नोट करने का काम मिल जाता है या किसी डेस्क पर अनुवाद का घसिटाना काम। आपके सपने टूटने से लगते है। लेकिन इसी प्रक्रिया में पत्रकार बनने का एक गुण आप सीख लेते है। चाटुकारिता।

दो महीने बाद

इंटर्नशिप करने वाले अस्सी फीसदी लोगों को दो महीने बाद एक दिन घर जाने की बस पकड़ लेनी होती है। और कईयों को कई रास्ते दिखने लगते है। जो बीस फीसदी बते रहते है वे किसी न किसी तरह के अपमान के बाद नौकरी के पहले पायदान को पाते है। ट्रेनी के तौर पर पत्रकार पैदा होने लगता है। अपवादों के लिए हमेशा जगह होती है। इसलिए सौ में से एक पत्रकार अपनी सही काबिलियत के बल पर भी मौके पाता है। और कुछ साल में वो अपनी जगह भी बना लेता है।

एक सचाई

पत्रकार बनाने वाली सारी संस्थाओं में नौकरी नहीं निकलती है। ज्यादातर संस्थान जो अखबारों में विग्यापन निकालते भी है, वे आगे जाकर एक शब्द से बंधे नजर आते है। जुगाड़ और जान पहचान। सबसे बड़ी बात है जान पहचान होना। ये एक तरह की रेफरल पालिसी जैसा है, जो एक जुबान या संबंध से आगे बढ़ती है। पत्रकार होना भी सीए जैसा है। पहले का सीए ही नए सीए को जन्म देता है। उसी तरह पुराने पत्रकार की सिफारिश से ही नई नौकरी मिलती है।

और ज्यादा खरा ये कि पत्रकारिता अब पैशन नहीं पेशा है। पत्रकारिता अब जूनुन नहीं नौकरी है। और इसे दिलाने के लिए कोई भी योग्यता काफी नहीं है। मैने देखा है कि किस तरह एक बड़े व्यवसायी के बेटे बेटी को माइक थमा दिया जाता है। और किसी के मां बाप पत्रकार हो को जुगाड़ बना दिया जाता है।


सो वे आएं पत्रकार बनने जो ये जानते हो कि ये पेशे में तब्दील हो रहा है। और बाजार में सामान बेचने के लिए कोई भी तरकीब सही मानी जाती है।

Soochak
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3 comments:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

बहुत ज्यादा हताशा दिखती है आपके लेखों में। इस सूचना से तो इस क्षेत्र में आने वाले नए लड़कों को तो आप डरा ही देंगे। मुझे तो नहीं लगता कि हालात इतने खराब है। मेहनती और काम जानने वालों लोगों के लिए काम की कमी नहीं है। वैसे टीसीआर नोट करने का काम भी छोटा नहीं है। अगर शुरू में ही किसी काम को छोटा मान लेंगे तो जाहिर है घऱ जाने की बस पकड़नी ही पड़ेगी। दूसरी एक बुराई ये है कि सब लोग टेलीविजन में ही आना चाहते हैं। अखबार की ओर क्यों नहीं। शुरुआती दौर में अखबार में जरूर काम करना चाहिए। काम मिल भी जाता है। अखबार आपको भाषा की तमीज देता है, news sense डेवलप करने में मदद करता है और अनुशासन भी सिखाता है। हालात उतने निराशाजनक नहीं है बशर्ते काबिलियत हो।

Anonymous said...

Sach to hatash karata hi hai. kitane akhbaron mein naukari milati hai. thoda ye to sochiye. sthiti isase bhi buri hai . jab naukari khojen to pata chalata hai.
Aditya

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

यह सच है कि मीडिया में स्थितियाँ ख़राब हैं. लेकिन सवाल यह है कि अच्छी कहाँ हैं? पुनश्च, स्थितियाँ उनके ही लिए ख़राब हैं जो शॉर्टकट की तलाश में हैं. जिन्हे खुद पर भरोसा है वे हताश होने के बजाय कोई समझौता किए बग़ैर धैर्यपूर्वक काम कर रहे हैं . यह सच है कि वे कम फायदे में हैं, लेकिन चुनने की स्वतन्त्रता तो आपको है ही. चाहें तो आत्मसम्मान चुन लें और नहीं तो चाटुकारिता के दम पर सुविधाएं चुनने से कौन रोक सकता है?