Monday, August 27, 2007

टेलिलिटिगेशन और समाज


क्या टीवी अदालती फैसलों को प्रभावित कर रहा है।
क्या टीवी पर बार बार दिखने वाले चेहरे अपराधी की परिभाणा अपनी छवि से बदल रहे है।
क्या टीवी ने हर नामी गिरामी पर दिए जाने वाले फैसले पर सहानुभूति बटोरना शुरू कर दिया है।
क्या टीवी फैसलों में अदालती बराबरी को हैसियत वालों के हिसाब से देख रहा है।


ऐसे तमाम सवाल है जो बीते दिनों संजय दत्त और सलमान खान को दिए गए फैसलों की छांव में खड़े किए जा सकते है।

ये सवाल कोई भी आम आदमी उठा सकता है। इसके लिए पत्रकारिता की लाठी थामे हाथों की जरूरत नहीं है। पत्रकार को खबर और खबर बनने वाले के बीच की फासला बड़ा करना होगा। नहीं तो वो खबर वाले की छवि में खबर को खो बैठेगा। कुछ ऐसा ही हो रहा है।

बीते दिनों कई बड़ी हस्तियों की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हुए है। चाहे गवाह के साथ बचाव पक्ष का वकील का साठ गांठ हो या मुंबई में वारंट की खरीद फरोख्त का मसला हो। टीवी ने कही न कही हर खबर से एक नया दायरा खड़ा कर दिया है। सोच को पक्ष में करने का दायरा।

संजय दत्त या हो सलमान खान दोनों को दिए गए फैसलों में टीवी ने उनके जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों और मार्केट,यानि बालीबुड पर असर को बढ़ा चढ़ाकर दिखाया। सलमान को तो मानो शुक्रवार को सजा देना ही गलत था। संजय दत्त की मुन्नाभाई छवि और बीते दिनों सलमान की चित्रकार की इमेज के दायरे में पेश की गई हर खबर के मायने आम आदमी के सहानुभूति पैदा कर रहे थे।

अमेरिका में एक मामले में इसे लेकर बड़ी जोरदार चर्चा है कि टीवी पर होने वाली ट्रायल के क्या असर है। वहां के इतिहास में अब तक की सबसे चर्चित मीडिया ट्रायल को लेकर अब किताब भी आ गई है। और इस टीवी ट्रायल को टीवी लिटिगेशन का नाम दिया गया है।

टीवी लिटिगेशन। यानि टीवी के जरिए एक ऐसी हस्तक्षेप जो जाहिर है समाज में होने वाले किसी भी किस्म के अपराध और अपराधी के पक्ष में चलाया जा रहा अभियान ही समझा जा सकता है।

ये एक नए तरह की अदालत है। जहां जनभावनाओं के अनुकूल ही फैसलों के लिए राय बनाई जाती है। राय भी ऐसी जो एक झटके में को सही लगती है। लेकिन जिसके परिणाम किसी भी समाज में एक आदर्श मिसाल नहीं बन सकते।

मिसाल बनाने वाला टीवी अब रहा भी नहीं। फौरी खबरों के लिए फौरी तैयारियों के बीच खबर पेश करने की जो कला, या कहें कि विकृति टीवी ने पैदा की है, वो जाहिर है किसी भी देश में मिसाल को नहीं ही बना सकती।

टीवी ने स्वरूप बदला। खबर के चेहरा बदला। दर्शक की सोच बदली। समाज की रूख बदला। और अब ये बदल रहा है एक देश की संस्कृति को। इसे किसी तरह की तैयारी नहीं करनी। क्योंकि आप खरीदार है। और बेचना ही, फैल चुकी लोकप्रिय संस्कृति की निशानी है।


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Sunday, August 26, 2007

Media Law and Ethics

In the era of media the most vulnerable term is Media Ethics. Ideally media has to always try to portray the truth of the society, but practically it is not visible. This is the common reaction of channel and newspaper heads that there is some sort of market interference, which succumb us to live in paparazzi and trivial issues. This is the play ground where all bad traits of journalism prosper in the name of market and livelihood. So what is the future? Every human who work for society in the name of journalist is little confused and want to take a breath.

This breath is come into the shape of writing and analysis. Television folks are always cursing print folks for not understanding the ground realities of television journalism. And television folks always busy in leg pulling of print for their style and traditionalism. This is the river, which has two corners. Both are shaping society, but not along with a common view. That’s why you saw a big gap between news paper and television news.

In the light of a new book, Media Law & Ethics: Reading in Communication regulation, Edited by: Kiran Parasad, the issues are more discussable for the mass communication student, journalist and for the civil society intellectuals. The book is published in two volumes, Volume 1 covers: Section 1(THEORITICAL FOUNDATIONS OF COMMUNICATION REGULATION) Freedom , Regulation and Ethics: Market, State and Media Accountability System- Claude-Jean Bertrand, Communication and Values- Kiran Parasad, A theory of Media Ethics: Foundation and Key Issues- Kiran Prasad, Satellite Broadcasting Regulation and Cultural Exception: An Arab Islamic View of Communication- Basyouni Ibrahim Hamada , Section 2 (PRESS AND BROADCASTING REGULATIONS) Law and Regulations Governing Press Freedom in India-P E Thomas, Laws and Regulations in Indian Broadcasting- G Nagamallika, Foreign Direct Investment in Print Media: Legal and Ethical Issues- Roy Mathew, Freedom, Individualsim and Ethical Behaviour: A Comparative Study of Print and Electronic Media Journalist- Kiran Parasad, Electronic New Media and Emerging Ethical Issues- Bhavya Srivastava.

This is not the all that the volumes cater, the whole dilemma facing by mass media and the booming new media is also covered in depth, in two books. The most fascinating thing the arena it covers. From Print to Television, Communication to Market, Law to Democracy, Individualism to mass media.

Media is as diverse as this country is. We must understand the limitations in which the news and content is present. The medium is the message, and when the message is clear it shapes society. Overall we have to live in a society, which created leader and dominates the values.

Media Ethics is always everywhere, in every newsroom, there is a veteran, who is anguish about the drama and press the PRESS button.



Bhavya Srivatava
Producer
Star News


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Sunday, August 19, 2007

सरोकार से शोर की पत्रकारिता

आउटलुक हिंदी देखी। चैनलों की गलाकाट प्रतियोगिता, या कहें कि विध्वंस प्रस्तुति को लेकर कवर स्टोरी छपी है। देखकर अजीब लगा। प्रासंगिक है। लेकिन क्या सरकार की एक मुहिम की छांव में चैनलों की हकीकत बताना जायज है।

समाचार चैनलों पर क्या दिखाया जाएगा, ये तय करना समाज का काम है। लेकिन भारत जैसे देश में समाज की सहमति को लेकर ही कई तरह के भ्रम जनसंचार माध्यमों में नजर आते है। पत्रिका में जो विमर्श है, वो समाज में नहीं दिखता। एक बड़े पत्रकार ने लिखा कि किसको बता रहें है कि जो दिखाया जा रहा है, वो सही नहीं है। जो टीवी देखता है, वो आम आदमी हो या खास, वो अपनी व्यस्तता के बाद ही इस चौखटे के सामने बैठता है। और इसी व्यस्तता की थकान मिटाने को टीवी चैनलों ने इस चौखटे को मनोरंजन का माध्यम बना रखा है।

सिनेमा को लेकर यहीं निष्कर्ष निकाला जाता है आदमी को वो दिखाओ जिससे वो सिनेमाहाल में अपनी निजी जिंदगी को भुला बैठे। यानि एक तरह की माया। जिसमें आप अपनी पहचान भुला बैठें। तो क्या टीवी ने भी आपको अपनी पहचान भूलने पर मजबूर कर दिया है।

गाहे बगाहे आप अपने अखबार में टीवी की खबरों के चुनाव और असर को लेकर लेख पढ़ते रहते है। इसकी प्रासंगिकता भी खबर को भूलने तक रहती है। क्या इसे दौर कहना उचित होगा, जब एक जल्दीबाजी में टीवी मीडिया खबर और मनोरंजन के बीच की रेखा को भुला बैठा है। क्या खबर को देखने का दिन कोई और होगा।

अनुभव यहीं बताते है कि तकनीकी और समय के साथ मीडिया के विषय उतने ही सीमित होते जाते है, जितनी उनका असर। एक खबर आपको कब तक बांध सकती है। अधिकतम एक दिन। तो फिर कैसे सोचा जाए कि मीडिया का असर लम्बा रहेगा। समाज बदलने की हद तक।

आज विकसित देशों में हर तरह की मीडिया पर नजर रखने के लिए हर तरह के संगठन और तमाम विकल्प मौजूद है। लेकिन क्या इससे किसी देश में सरकार और समाज के बीच मीडिया खड़ा है। क्या वो पुल है। जिससे गुजरकर सूचना समाज के लिए खबर बन जाती है। किसी भी देश में देख लीजिए। बड़े मीडिया समूह पर किसी न किसी घराने का कब्जा है। और यहीं खबर पर कब्जे की वजह है।

विकासशील देशों के हाल और भी नाजुक है। यहां पहले तो मीडिया विकसित सोच की अवस्था में नहीं है, और अगर एक दो देशों में है भी तो वहां दिशा और दशा तय करने वाले कारक उसे प्रभावित करते रहते है।

भारत में पत्रकारिता के आयाम राजनीति, समाज और समय के साथ अर्थ रहे है। सरोकार से शोर की पत्रकारिता आज मौजूद तो है, लेकिन उसका चेहरा बदल सा गया है। आज खबर लहरी है तो साथ में वार्ता फलक भी है। आज द हिंदू है तो टाईम्स आफ इंडिया भी है। आज एनडीटीवी इंडिया है तो स्टार न्यूज़ भी है।

दो चेहरों के बीच खबर ने स्वरूप और सामर्थ दोनों खो दिया है। बचा है तो केवल एक विश्वास कि एक दिन केवल पत्रकारिता के लिए पत्रकार होगा और खबर के लिए हायतौबा।

सूचक
soochak@gmail.com


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Monday, August 13, 2007

ब्लाग्स पर 'मीडिया' के लेख

पत्रकार और मीडिया का नाता श्वास और जिंदगी का है। दोनों के लिए एक उद्देश्य होने पर ही समाज का हित होता है। लेकिन वक्त बदलता गया और दोनों ने अलग अलग राह धर ली। आज पत्रकार एक शून्य में जीता है और पत्रकारिता बाजार में। खैर हमने जब चिट्ठाजगत को खंगाला तो बीते दिनों में ये लेख हमें भाएं।

आप भी पढ़ें....

पत्रकारों पर हमला : एकजुट होइए या फिर पिटते रहिए

दबी , दबती , दब गई जन पत्रकारिता

पत्रकारिता जनता से दूर होती जा रही है : पी साईनाथ

एक पत्रकार की दुखद मौत, हमारी श्रद्धांजलि

विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन से आगे - आलोचनाओं में छुपा है नये रास्‍तों का सफर न्‍यूयार्क से लौटकर :- पवन जैन

मीडिया का गिद्धभोज

श्श्श्श्श… मुस्लिम

एक अच्‍छी बाढ़ सबको पसंद है

मेरे लिए पत्रकारिता की पाठशाला हैं पी साईनाथ

खबर क्या है?

गिरफ्तारी से मालामाल हुआ हनीफ

ये पत्रकारिता का स्‍वर्णकाल है

हिन्दी टीवी पत्रकारिता और पाकिस्तान में फ़र्क है


हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल

आज कौन तय कर रहा है पत्रकारिता का मक़सद?

स्टाक एक्सचेंज और अच्छी पत्रकारिता का संबंध

टीवी पत्रकारिता का सबसे शर्मिंदा वक्‍त

पत्रकारिता का भटियारापन और वैज्ञानिक का भटकता मन

कब था पत्रकारिता का स्‍वर्ण काल?


पत्रकारिता को ज़िंदा रखने वाले लोग


भूमंडलीकरण और पत्रकारिता

राजा साहब का थोबड़ा टी.वी. में.


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Monday, August 06, 2007

न हंसिए न रोइए, केवल खुद को बचाईए

ब्राडकास्टिंग सर्विसेज रेग्युलेशन एक्ट 2007 के प्रारूप में नजर डालने पर आदर्श और व्यावहारिकता के बीच का फासला नजर आने लगता है। ये पत्रकारिता पढाने वाली संस्थाओं के निकले छात्र और काम करने वाले युवाओं के अनुभव से बेहतर समझा जा सकता है। चौथे पन्ने पर न्यूज एण्ड करेंट अफेयर्स चैनल की परिभाषा देख कर समझा जा सकता है कि खबर के जिस पहलू को हम आज समाचार चैनलों पर देखते है, वो न तो आदर्श में सही है न ही व्यावहारिकता में। मसलन परिभाषा में, एक चैनल को हालिया घटनाओं की रिपोर्ट, बहस, विचार, जनता के बड़े हिस्से की रूचि को दिखाने वाली खबरों, ऐसे व्यक्ति और संस्थाओं को, जो राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक तौर पर जुड़े हो, की खबरें दिखाता हो। ये उस कागज पर लिखा है, जो आने वाले दिनों में हर चैनल के चेहरे पर चिपका होगा।

तो क्या चैनल इसे अपनाने को तैयार है। नहीं। वे स्वयं पर खुद नियंत्रण वाले मूड में है। यानि सेल्फ रेग्युलेशन। नया शब्द नहीं है। पर चैनल चलाने वाले खर्चो के आगे किसी तरह की रेग्युलेशन नहीं पहचानते। वक्त बदला है। लाइव का तमाशा है। इमोशनल खबरों की पूछ है। लो सोसाइटी के विजुअल की इलक नहीं है। शहरों की खबरे है। अपराध की बाढ़ है। और है कुछ मिनट के विजुअल पर घण्टों खेलने का माद्दा।

जरा अपने बच्चे से पूछ कर देखिए क्या वो काण्डोम या एड्स के बीच के संबंध को जानता है। पर वो सेक्स और सेक्सी के अंतर को समझने लगा है। एक हालिया फिल्म में बच्ची नाम सेक्सी पुकारा जाता है।

शिक्षा के दूर जाते चैनल अब आसानी से मिल जाने वाली दोयम दर्जे की खबरों को दिखा दिखा कर समाज को समझा रहे है कि यहीं खबर है। इसे ही देखिए। यही है। पारिवारिक मूल्यों की नींव अब अपराध और नाजायज संबंधों ने हिला दी है। अब केवल समाज में बलात्कार ही नही होता। होता है खुलेआम आवासीय मुहल्लो से देह व्यापार, जिसे स्टिंग आपरेशन से दिखाया जाता है आपको।

रोकना था किसी न किसी को। नागरिक समाज की चेतना को कौड़ी के भाव मानने वाले समाचार चैनलों के स्वयंभू प्रवक्ता अब दिशाहीन नाव के सवार है। एक स्थापित प्रिंट जर्नलिज्म की चीखोपुकार को वे हताशा बताते है। नौकरी पाने की हताशा।

आने वाले दिनों में आप टीवी पर जो देखेंगे वो आपको आपकी आने वाली कई पीढ़ियों तक व्यवहार और आचार में देखना पड़ेगा। किसी दिन किसी तमाशे के किरदार आप होंगे और उस दिन आप न हंस सकेंगे न रो।

http://mib.nic.in/informationb/POLICY/Bill200707.pdf

Soochak
soochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Thursday, August 02, 2007

Good drought to Magsaysay Award.

Palagummi Sainath. A name of a dedicated Indian. We know him by Everybody Loves A Good Drought.. Sainath gets 2007 Ramon Magsaysay award for Journalism, Literature, and Creative Communication Arts.


This is a moment of accredition. We got a current interview of Sainath on India Together.

Have a look on the Bharat, he thinks.

"Invisible India is the elephant in your bedroom"

MediaYug


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Monday, July 30, 2007

पंद्रह लाख का नम्बर और मीडिया

ये मेरा शौक है। मैं पूरी दुनिया में फेमस होना चाहता था। लोग मुझे फोन कर रहे है। मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया। और इस तरह एक व्यक्ति मीडिया की बदौलत हो जाता है मशहूर। एक नम्बर। जिसमें जुड़े है सात शून्य। इसे खरीदा गया पंद्रह लाख में। और खरीदार बन जाता है खबर।

खबर। हर उत्पाद की खबर। एक सनक की खबर। एक शौक की खबर। क्या यहीं खबर है। किसी के पास पैसे हो, तो वो कुछ भी फालतू करें। और मीडिया इसे पेश करके समाज में एक आर्टिफिशियल एस्पिरेशन पैदा करें।

आर्टिफिशियल एस्पिरेशन। जी हां। जिस शौक ने एक युवक को पंद्रह लाख खर्चने पर मजबूर किया। वो शौक आज हर शहर में लोगों की जुबान पर है। खरीदार ने एक दिन की शोहरत बटोर ली है। पर जिसे सचमें फायदा होगा वो है फोन कंपनी।

समाज में इस खबर से जो असर गया है, वो आने वाले दिनों में युवको, पैसे वालों और सपनों में जीते मध्यमवर्गीय लोगों को लोलुप करेगा, कि वे ऐसे शौक को पूरा करें। यानि अब एक नया तरह का लालच पैदा होगा। जो सही गलत नहीं पहचानेगा।

मीडिया को इस खबर में जो दिखा वो क्या था, ये समझना मुश्किल नहीं। पहला कि शौक और पैसे के बीच जो रिश्ता है, वो साफ दिखा। दूसरा एक व्यक्ति खबर बना सकता है। वो सक्षम है तो। एक अनोखा कारनामा खबर बन सकती है। एक शौक की हद कुछ नहीं। और हर हद के बाद एक खबर छुपी है।

जाहिर है मीडिया, अखबार से लेकर टीवी तक, अब खबरों के असर को देखना समझना छोड़ चुके है। इसी वजह से वो खरीदार की लालसा को बढ़ाते रहते है। किसी भी अखबार को ले लीजिए। हर हफ्ते वो पर्यटन, आवास, वाहन और शौक से जुड़ी खबरों को रंगीन साचे ढांचे में पेश करता है। टीवी इससे एक कदम आगे है। वो रोजाना इस रंगीनी का एक डोज देता है। उसके ग्राहक तय है।

समाज में जो असर देखा जाता है, वो व्यवहार और बदलाव दोनों तौर है। किसी के हाथ में मोबाईल है तो किसी के मुंह में सिगरेट। ये जरूरत से ज्यादा स्टेटमेंट है।

आर्टिफिशियल एस्पिरेशन यानि छलावे वाली चाहतें पैदा करने वाला मीडिया को इन खबरों से जो बाजार मूल्य मिलता है, वो उसके पीछे भागता है। पर इन खबरों के असर से समाज में जो भागमभाग चल रही है, वो केवल अवसाद और पलायन की ओर ले जाने वाली है।

किसी भी जनसंचार माध्यम से ये अपेक्षा कि वो समाज को एक दिशा देगा, कोई गैरजरूरी मांग नहीं है। क्या टीवी इस खबर के जनक को हतोत्साहित नहीं कर सकती, या क्या उसे इस खबर को दिखाने से परहेज नहीं करना चाहिए। अखबार के लिए भी रोचकता क्या मानक है।

किसी भी उत्पाद के लिए ग्राहक की सोच तो समझना जरूरी होता है। भारतीय शहरी मानस अब मोल तोल से ऊपर उठकर शौक और स्टेटमेंट में जीने लगा है। आने वाले दिनों में ईगो की जगह शौक ले लेगा। और समाज में लड़ाई शौक के लिए होगी। इस दौरान मीडिया के लिए शौक होगा हर सनक और अनोखी खबर। इंतजार है किसी रईस के घर के शानोशौकत की खबर का। या किसी के नायाब शौक की हद का।

Soochak
soochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Friday, July 27, 2007

मीडियायुग पर 'मीडिया'

हमारे सरोकारों ने हमें मीडिया की सुध लेने का जज्बा दे रखा है। हम अपने स्तर से इसे करते भी आ रहे है। बीच बीच में हमें अपने चिट्ठाजगत में कई लेख देखने को मिलते हैं, जो मीडिया पर केन्द्रित होते है। देखकर खुशी होती है। हमारी आगे से ये कोशिश होगी कि इनके लिंक आपको मीडियायुग पर एक जगह मिले। हमारी लेखक साथियों से भी गुजारिश है कि अपने मीडियालेखों से हमें परिचित कराते रहें।

आज मिले लेख...

कथित न्यूज़ चैनल बॉलीवुड से कुछ सीखें

एक भगोड़े मीडियाकर्मी का बयान

मीडिया और रामू का गधा

मीडिया का बाजार

मीडिया विमर्श के वेब मीडिया अंक का विमोचन

शाबास कैराली टीवी

मीडिया पर दोष


क्या हो गया है भारतीय मीडिया को?

पूजा के प्रतिरोध मे मीडिया की नग्नता


MediaYug

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Thursday, July 26, 2007

शून्य में जीते हम आप

क्या आपको पता है देश में एक ऐसा कानून बनने जा रहा है जो गर्भवती महिलाओं की संख्या का हिसाब रखेगा।

क्या आपको पता है कि देश में के वन कानून में बड़ा बदलाव किया जा चुका है।

क्या आपको पता है कि आईआईएम में अब सरकार निदेशकों के पद भरेगी। इसके विज्ञापन भी निकाले जा चुके है। इससे पहले ये वहां की गवर्निंग बॉडी का काम था।

क्या आपको पता है कि देश में बाल श्रम को लेकर जो कानून लागू है, उसके अनुसार आपको जेल और जुर्माना दोनो हो सकता है।

क्या आपको पता है जंतर मंतर पर आप पांच हजार से ज्यादा की संख्या में धरना नहीं दे सकते है।

क्या आपको पता है कि देश की राजनीति में क्या हो रहा है। और केवल राजनीति ही नहीं जिन नीतियों को राजनेता बनाते है या पेश करते है, वे आपको किस तरह से प्रभावित करने वाली है।

देश में जो हो रहा है, उसका एक चेहरा दिखाने वाली मीडिया अब देश को राजनैतिक, सामाजिक तौर पर जागरूक करने वाला नहीं रहा। ये एक ऐसा वक्त है जब आप देश की राजनैतिक गतिविधियों के हिस्सेदार नहीं है। क्या ये वक्त की जरूरत है या ये अर्थ के प्रभावी होने का प्रभाव है।

क्या फर्क पड़ता है कि हम न जाने कि हमारे लिए कौन सी नीतियां बनाई जा रही हैं। क्या ये मायने रखता है कि हम ये जाने कि सामाजिक विकास की कौन सी कड़िया हम खोते जा रहे हैं।

जनसंचार माध्यमों की भूमिका के मद्देनजर ये उनका कर्तव्य रहा है कि वे वक्त के आगे और पीछे को जोड़कर पेश करें। मतलब कि खबर से जुड़े सभी सरोकारो को पेश करना उनका काम है। लेकिन यहीं पन्ना अब वर्तमान में सिमटता जा रहा है।

देश के राजनैतिक फलक पर होने वाली घटनाओं में केवल चुनाव, सदन स्थगन, दल-बदल और नेताओं की रार ही नहीं होती। हर दिन किसी न किसी नई नीति पर विचार विमर्श चलता रहता है। जो अगले संसद काल में पेश की जानी होती है। जाहिर है हर नीति आपसे जुड़ी होती है। और इससे जुड़ा होता है समाज। तो अगर टीवी या रेडियो, एक अंश में अखबार ने थोड़ी गंभीरता बनाए रखी है, इन नीतियों को पेश न करें तो आप कैसे जानेंगे कि आने वाले दिनों में आपको टीवी रखने पर भी सालाना टैक्स देना होगा।

माना जाता है कि जिस देश की जनता उसके राजनैतिक प्रक्रिया की हिस्सेदार नहीं, वो एक तरह के शून्य में जी रही है। और ऐसा शून्य आपके जीवन को अंधेरे में रखने जैसा है।

हमारे जनसंचार माध्यम, खासकर टीवी को केवल सामाजिक तमाशे को पेश करने की बजाए ये देखना ज्यादा जरूरी है कि वो सामाजिक ताने बाने को पेश करें। राजनैतिक रस्साकशी के ज्यादा राजनीतिक पहल से बनने वाली नीतियों को आगे लाए। और देश के आवाम को ये बताए कि फला कदम आपको यहां ले जाएगा।

देश के एकाध गंभीर अखबार और टीवी चैनलों को ये देखना और भी जरूरी है कि वो अपनी तारतम्यता बनाए रखे। खबरों के बीच एक हार्ड डोज देकर। आपकी चेतना पर जो पर्दा है, उसे केवल आर्डर आर्डर ही दूर न करें। आप खुद भी शिकायती तेवर दिखाकर ये मांग सकते है कि हमें ये देखना है। ये बड़ी बात नहीं है। आप के पास चैनलों के ईमेल, या पते पर अपनी बात लिख सकते है। जब आपके एसएमएस से चैनल किसी को लोकप्रिय या अलोकप्रिया बना सकते है तो आपकी राय की बाढ़ से क्या वे जरा भी नहीं सोचेंगे। सोचिए।

बहरहाल। देश में रहने के लिए संविधान ने आपको कई अधिकार दे रखे हैं। इनमे से किनको कितना इस्तेमाल करना है ये आप पर है। लेकिन देश को जानने के लिए उसकी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक धड़कन से जुड़ना जरूरी है।

सूचकsoochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Saturday, July 21, 2007

हरिया के देश में हैरी पॉटर की जिंदगी

जिस देश में आबादी का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी के ख्वाब देखता है, करोड़ो खर्च करके अंग्रेज बनना चाहता है. वहां हैरी पॉटर जिंदा रहेगा या मरेगा कितना बड़ा सवाल है। आज सुबह ये रहस्य टूटा कि वो जिंदा रहेगा।

टीवी चैनलों के आम दर्शक के लिए मिथक बन चुका ये फिक्शनल किरदार आज चाचा चौधरी और हमारे बिल्लू, पिंकी, नागराज, ध्रुव और किवदंती सरीखी रचनाओं से बहुत आगे है। चंद्रकांता संतति या किसी अलाद्दीन तो इसके आगे पीछे नहीं है। ये हम नहीं हमारी टीवी कहती है। एक अनुमान के मुताबिक हर खबरिया चैनल ने बीते दिनों में रोजाना आधा घंटा हैरी पॉटर को दिया है। मानो पूरा देश हैरी के बचने की प्रार्थना कर रहा हो।

क्या इसे उदारीकरण कह सकते है। नहीं। क्योकि एकपक्षीय आयातित किरदार का मायाजाल है। जिसे हम आप अब समझ कर भी अंजान है।

टीवी चैनलों को बालक और युवा होते वर्ग को अपने से जोड़ने के लिए इस मायाजाल में अपनी मौजूदगी दिखाना जरूरी है। बाजार में आठ सौ की किताब वो खरीद सकता है, जो इस बाजार के लिए बना है।

अरबों के व्यापार वाली किताबें और अंग्रेजी। क्या हम दिन प्रतिदिन अपनी समझ से कटते जा रहे है। जिस देश में कुछ करोड़ लोग अंग्रेजी के साथ जीते है, वे ही इंडिया है। हरिया को भूल चुके भारत में हैरी ही बचेगा और बिकेगा।

हमें बहलाने और डराने वाले खबरिया चैनलों के सामने जो दिक्कतें है वो समझ के बाहर है। लेकिन क्या बहुप्रचारित और बहुप्रतीक्षित उत्पादों को अपनाने के लिए केवल जनउन्माद ही काफी होंगे।

हैरी को जिंदा किवदंती बनाने वाली जे के राउलिंग के सामने इतिहास में हमेशा मौजूद रखने की चुनौती थी। और आज के टू मिनट मीडिया ग्लेयर का दुनिया में ऐसा सम्मानजनक अंत के साथ किया जा सकता है। सो उन्होने इसे सात किताबों में सिमटा दिया। ताकि आगे कोई हैरी पॉटर पर सीक्वेल भी न लिख सके।

देश को खबरों से आगाह कराने वाले खबरिया चैनलो को ये देखना जरूरी है कि हरिया की मौत के बाद भी उसकी बरसी वो करते रहे। ये हैरी की दुनिया में फिट नहीं बैठता। उसका मायाजाल हमारी कथाओं से बड़ा नहीं है। लेकिन जिस बाजार में वो बिक रहा है,वो हमारी आकांक्षाओं से बहुत बड़ा है।

सूचक
soochak@gmail.com


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Tuesday, July 17, 2007

नहीं पता कैसे बचेगी हिंदी

आसपास हिंदी है। बातचीत हिंदी है। माध्यम हिंदी है। और हर जनसंचार माध्यम के साथ हिंदी है। तो क्या माना जाए कि हिंदी, जो कि अब ब्लाग के हजारों पन्नो पर मौजूद है, इतनी लोकप्रिय हो चली है कि उसे रोजाना खबर बनाना जरूरी नहीं है। लगता कुछ ऐसा ही है।

आठ बार हो चुके विश्व हिंदी सम्मेलन के फायदे क्या है। इस बार के हिंदी सम्मेलन में नामधन्य लोग नहीं गए। कहा कि फिजूल है। वहां तो फला विचारधारा का कब्जा है।

तो क्या हिंदी विचारधारा में फंसी भाषा है। वो भारतीय नहीं है। वो किसी लेखक और प्रचारक की मोहताज है।

विदेश मंत्रालय तो इसे हर साल फैलाए जा रहा है। लोग तीन दिनों में इसकी सुध भी ले लेते है। लेकिन क्या हिंदी जनसंचार माध्यमों से फैल रही है। नहीं।

जिस हिंदी की बात इन सम्मेलनों में होती है वो कही किताबों और इतिहास में दर्ज है। आज वैश्वीकरण की जिस तरीके को हिंदी ने ढाला है, वो अनोखी है, क्रियात्मक है।

लेकिन हमारा सरोकार क्या है। टीवी इसे देखता नहीं, रेडियो को गाना बजाने से फुरसत नहीं। पेपरों में कुछ सौ शब्दो में हिंदी की कहना संभव नहीं। तो कैसे बचे हिंदी।

मेरा लिखना केवल लिखना भर है। मैं विचार के तौर पर जानता हूं कि हिंदी को समय और काल ने घेर रखा है। उसे अपनाना हीनता का भाव लाता है। उससे दूर रहना उच्चता है।

टीवी से हिंदी को समय देना अब केवल सपना भर है। रेडियो के विकास ने हिंग्लिश को पनपा रखा है। अखबारों में अंग्रेजी भाषा के शब्द घुस रहे है। तो कैसे बचे हिंदी।

नहीं पता कैसे बचेगी हिंदी।

सूचक
soochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Saturday, July 14, 2007

A journalist is always a journalist!

What is the cost of real journalism. Threat or Thumb. A journalist is always a journalist. Vinod kumar Prajapat proves it, he earn for his family and yearn for his past. But fate is tough to him. He gave a strong thumb in the face of Security Gaurd! We can help him....

MediaYug

Controversial report costs reporter his job at Indian newspaper

Dubai: An Indian journalist who quit his job back home after a
controversial story got him in trouble is working today as a security
guard at a Dubai company.

The story earned Vinod Kumar Prajapat, 39, a front page byline in a
Hindi language newspaper in the North Indian city of Jaipur.

"The story was about an elderly woman who was thrown out when she went
to give a petition to an Indian minister. That story made headlines
and I was congratulated by the public, as well as fellow journalists,"
he said.

But his report was termed as a "packful of lies" by the politician and
he was asked to prove its authenticity. More than 350 eyewitnesses
stood by his story.

Credibility
---------------------------------------

"I had to really work to prove my credibility. I realised that a
journalist has to tread carefully when it comes to influential people
who want to keep the truth from coming out,"said Prajapat.

He came to the UAE 15 months ago through an agent after undertaking
weeks of training as a security guard. He reads the Gulf News when he
gets some time out for himself and from his job of standing guard at
the company gates. He is married with two children. Prajapat has also
worked as researcher with a district newspaper in Jaipur.

He earns Dh900 as a 24 hour security guard and his meals are simple:
four parathas [baked Indian flat bread] which he relishes with bites
of onions and green chillies.

His aim is to save enough and get back home.

He says that his mother feared for his life and the family after the
controversy.

Threats

She wanted me to join my younger brother who runs a watch repair shop, he said.

"My mother got very scared. Bullies used to turn up at our door
looking for me,"
he said. After working as a watch technician in his
family-owned shop in Jaipur for a couple of months, Prajapat also
worked as a supervisor at a construction site in Jamnagar in the
Indian state of Gujarat.

But he soon was looking for greener pastures and a job that would help
him save enough to buy a video camera.

"I still long to go back to journalism, but this time I would like to
work in the electronic media. My English language skills are very poor
and so I buy a copy of the Gulf News and try to read it.


"I want to learn to speak in English and get a job as a news reporter
in one of the English news television channels in India. My adverse
circumstances at home got me here. My first love is journalism," he
said.


Courtesy: Gulf News
By Sunita Menon, Staff Reporter
Published: July 14, 2007, 00:04

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Friday, July 13, 2007

एक सचाई: कैसे मिले मीडिया में नौकरी - दी एंड

इंटर्नशिप के दौरान

आप पाते है कि आप अपने सपने के पास खड़े है। पहले दिन आपकी सज्जनता पूरे उफान पर होती है। ये एक वक्त होता है, जब आपको लगता है कि जग जीतने की सारी काबिलियतें आपके पास है और यहीं मौका वो सब आपको दे देगा। चैनल या अखबार में हर किसी को सर कहते हुए आप कुछ ही दिनों में फ्रस्टेट हो जाते है। आपको या को फीड के टीसीआर नोट करने का काम मिल जाता है या किसी डेस्क पर अनुवाद का घसिटाना काम। आपके सपने टूटने से लगते है। लेकिन इसी प्रक्रिया में पत्रकार बनने का एक गुण आप सीख लेते है। चाटुकारिता।

दो महीने बाद

इंटर्नशिप करने वाले अस्सी फीसदी लोगों को दो महीने बाद एक दिन घर जाने की बस पकड़ लेनी होती है। और कईयों को कई रास्ते दिखने लगते है। जो बीस फीसदी बते रहते है वे किसी न किसी तरह के अपमान के बाद नौकरी के पहले पायदान को पाते है। ट्रेनी के तौर पर पत्रकार पैदा होने लगता है। अपवादों के लिए हमेशा जगह होती है। इसलिए सौ में से एक पत्रकार अपनी सही काबिलियत के बल पर भी मौके पाता है। और कुछ साल में वो अपनी जगह भी बना लेता है।

एक सचाई

पत्रकार बनाने वाली सारी संस्थाओं में नौकरी नहीं निकलती है। ज्यादातर संस्थान जो अखबारों में विग्यापन निकालते भी है, वे आगे जाकर एक शब्द से बंधे नजर आते है। जुगाड़ और जान पहचान। सबसे बड़ी बात है जान पहचान होना। ये एक तरह की रेफरल पालिसी जैसा है, जो एक जुबान या संबंध से आगे बढ़ती है। पत्रकार होना भी सीए जैसा है। पहले का सीए ही नए सीए को जन्म देता है। उसी तरह पुराने पत्रकार की सिफारिश से ही नई नौकरी मिलती है।

और ज्यादा खरा ये कि पत्रकारिता अब पैशन नहीं पेशा है। पत्रकारिता अब जूनुन नहीं नौकरी है। और इसे दिलाने के लिए कोई भी योग्यता काफी नहीं है। मैने देखा है कि किस तरह एक बड़े व्यवसायी के बेटे बेटी को माइक थमा दिया जाता है। और किसी के मां बाप पत्रकार हो को जुगाड़ बना दिया जाता है।


सो वे आएं पत्रकार बनने जो ये जानते हो कि ये पेशे में तब्दील हो रहा है। और बाजार में सामान बेचने के लिए कोई भी तरकीब सही मानी जाती है।

Soochak
soochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

एक सचाई: कैसे मिले मीडिया में नौकरी - दी एंड

इंटर्नशिप के दौरान
आप पाते है कि आप अपने सपने के पास खड़े है। पहले दिन आपकी सज्जनता पूरे उफान पर होती है। ये एक वक्त होता है, जब आपको लगता है कि जग जीतने की सारी काबिलियतें आपके पास है और यहीं मौका वो सब आपको दे देगा। चैनल या अखबार में हर किसी को सर कहते हुए आप कुछ ही दिनों में फ्रस्टेट हो जाते है। आपको या को फीड के टीसीआर नोट करने का काम मिल जाता है या किसी डेस्क पर अनुवाद का घसिटाना काम। आपके सपने टूटने से लगते है। लेकिन इसी प्रक्रिया में पत्रकार बनने का एक गुण आप सीख लेते है। चाटुकारिता।

दो महीने बाद

इंटर्नशिप करने वाले अस्सी फीसदी लोगों को दो महीने बाद एक दिन घर जाने की बस पकड़ लेनी होती है। और कईयों को कई रास्ते दिखने लगते है। जो बीस फीसदी बते रहते है वे किसी न किसी तरह के अपमान के बाद नौकरी के पहले पायदान को पाते है। ट्रेनी के तौर पर पत्रकार पैदा होने लगता है। अपवादों के लिए हमेशा जगह होती है। इसलिए सौ में से एक पत्रकार अपनी सही काबिलियत के बल पर भी मौके पाता है। और कुछ साल में वो अपनी जगह भी बना लेता है।

एक सचाई

पत्रकार बनाने वाली सारी संस्थाओं में नौकरी नहीं नितलती है। ज्यादातर संस्थान जो अखबारों में विग्यापन निकालते भी है, वे आगे जाकर एक शब्द से बंधे नजर आते है। जुगाड़ और जान पहचान। सबसे बड़ी बात है जान पहचान होना। ये एक तरह की रेफरल पालिसी जैसा है, जो एक जुबान या संबंध से आगे बढ़ती है। पत्रकार होना भी सीए जैसा है। पहले का सीए ही नए सीए को जन्म देता है। उसी तरह पुराने पत्रकार की सिफारिश से ही नई नौकरी मिलती है।

और ज्यादा खरा ये कि पत्रकारिता अब पैशन नहीं पेशा है। पत्रकारिता अब जूनुन नहीं नौकरी है। और इसे दिलाने के लिए कोई भी योग्यता काफी नहीं है। मैने देखा है कि किस तरह एक बड़े व्यवसायी के बेटे बेटी को माइक थमा दिया जाता है। और किसी के मां बाप पत्रकार हो को जुगाड़ बना दिया जाता है।


सो वे आएं पत्रकार बनने जो ये जानते हो कि ये पेशे में तब्दील हो रहा है। और बाजार में सामान बेचने के लिए कोई भी तरकीब सही मानी जाती है।

Soochak
soochak@gmail.com

Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354

Thursday, July 12, 2007

एक सचाई: कैसे मिले मीडिया में नौकरी - भाग दो

दूसरे पड़ाव के पहले

आप जब अपने शहर से चलते है तो किस्मत कहें या कर्म, आपको कुछ लोगों के नाम और संस्थान पता होते है। ये बात आप भी आम आदमियों की तरह जानते है कि फला किस चैनल में है। यानि आप जानते है जिसे हर कोई जानता है। कभी कभी आप किसी माध्यम से जान जाते है कि नौकरी देने वाली डिपार्टमेंट होता है एचआर। और इस समय फलां पत्रकारिता संस्थान की एचआर के हेड हैं फलां।

तीसरा पड़ाव

हर दिन गुजरता जाता है। आपकी सीवी एक गार्ड से दूसरे गार्ड के पास जाती जाती है। और आप को अखरने लगता है कि आपके पत्रकार को कोई समझ क्यूं नहीं पाता। इसी मशक्कत के दौरान किसी न किसी दिन आपको किसी बड़े संस्थान का कोई बड़ा चेहरा आते जाते मिल जाता है। आपकी खुशी का ठिकाना नहीं होता। आप उससे चलते चलते या सिगरेट के कश लगाते किसी बड़े पत्रकार को ये समझाते है कि आप ही हैं भविष्य के पत्रकार। वो कश जल्दी जल्दी लेने लगता है। और अंत में अपने नाम की एक ईमेल आईडी आपको देता है। सीवी भेज देना, देखते है। आप किस्मती हुए तो आपको वो अपना मोबाइल नम्बर भी दे देता है। आप भागे भागे किसी साइबर कैफे से अपनी सीवी कुछ सुधार कर उसे भेजते है। थोड़ी देर इंतजार करते है। फिर हिम्मत जुटाकर एसएमएस करते है। या आपमें पत्रकार है तो फोन ही कर देते है। फोन नहीं उठाया जाता है। या उठता है तो परिचय समझने के बाद वो कहता है देख लेंगें। एक हफ्ते बाद फोन करना।

एक हफ्ते बाद

ये बीचे के दिन आपकी बेकरारी के सबसे बड़े लम्हे होते है। आप बेसब्री से हर दिन को गुजारते है। घर पर फोन पर आप बताते है कि किस तरह आप फलां से मिल आए है। आपने उससे बात भी की और आपको उसने एक हफ्ते का वक्त भी दिया है। एक हफ्ता। बीत जाता है। आप सुबह सुबह फोन करते है। कई बार करने के बाद फोन उठता है। आप बताते है। और वो झल्ला कर कहता है कि दोपहर में करो। आप घर से बाहर होते है। आपको लगता है कि आज ही आप नौकरी पा जाएंगे। फिर दोपहर हो आती है। आप फोन करते है। फोन उठने पर आप को कहा जाता है कि यार देखो जगह नहीं है। एक महीने बाद फोन करना। अगला आपको हताश नहीं करता। उसे अपना नाम खराब नहीं करना। वो टीवी का युगपुरूष जो है।

अचानक एक दिन

एक दिन आप पाते है कि एक नम्बर से फोन आ रहा है। ये नम्बर जाना पहचाना है। आवाज आती है कि हमारे यहां इंटर्नशिप के लिए आपका सेलेक्शन किया गया है। आप बल्ले बल्ले। और उसी दिन से आप हो जाते है घर के लाडले। लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान हजारों युवक युवतियां या तो घर लौट जाते हैं या किसी और फील्ड से जुड़कर हल्के प्रयास करते है। पत्रकार की मौत हो जाती है।


आगे जारी रहेगा......


Soochak
soochak@gmail.com


Send your write-ups on any media on "mediayug@gmail.com"
For Advertise 'SMS' us on: +91-9911940354